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शुरुआत का वक्त

संपादकीय /  March 20, 2018

सरकारी बैंक लगातार देश के नीति निर्माताओं के लिए समस्या का सबब बने हुए हैं। उनकी धीमी ऋण वृद्घि जहां निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार की गति को धीमा कर रही है, वहीं हाल में सामने आए आभूषण कारोबारी नीरव मोदी को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी करने संबंधी घोटाले ने इन बैंकों के संचालन से जुड़ी समस्या को एक बार फिर उजागर किया है। गौरतलब है कि निजी निवेश में सुधार देश की आर्थिक वृद्घि में सुधार से सीधे तौर पर संबंधित है। देश के बैंकिंग जगत के इतने बड़े हिस्से के सरकार के नियंत्रण में बने रहने देने के पक्ष में अब कोई व्यावहारिक या सैद्घांतिक दलील नहीं दी जा सकती है। तमाम उपाय किए जाने के बावजूद इन बैंकों के कामकाज में कतई सुधार नहीं हुआ है। इन बैंकों में ऋण को लेकर धोखाधड़ी या खराब निर्णय करने का सिलसिला जारी है। बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए ताजातरीन उपाय बैंक बोर्ड ब्यूरो के रूप में अपनाया गया लेकिन इस संकट की घड़ी में वह कमोबेश अनुपस्थित नजर आ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार ने संभवत: उसे गंभीरता से लेना ही बंद कर दिया है। अब यह कमोबेश स्पष्टï हो चुका है कि सरकारी बैंकों का निजीकरण ही एकमात्र उचित उपाय है। 

 
हालांकि बैंकों के निजीकरण की राह में कई बाधाएं हैं। मिसाल के तौर पर किसी भी सरकार के लिए इसके साथ ढेर सारा राजनीतिक जोखिम जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त बैंक खुद भी निजी क्षेत्र के लिए अधिग्रहण की दृष्टिï से कोई आकर्षक लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से कई फंसे हुए कर्ज की समस्या से जूझ रहे हैं। इससे उनका मूल्यांकन कमजोर होता है। सरकार स्वाभाविक तौर पर इनकी अच्छी कीमत नहीं पाएगी और राजनीतिक मोर्चे पर विपक्ष सरकार पर हमला करेगा। कुछ बैंकों की तो मामूली कीमत भी मिल जाए तो गनीमत होगी। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि कई बैंकों में कर्मचारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा है या फिर कर्मचारी अयोग्य हैं। अधिग्रहण करने वालों के लिए इन अतिरिक्त कर्मचारियों की छंटनी करना आसान नहीं होगा। बैंक यूनियन ताकतवर हैं और उनका विरोध जारी है। उनका राजनीतिक प्रभाव भी है। अगर बड़े पैमाने पर निजीकरण किया गया तो हमें कम मूल्यांकन देखने को मिलेगा, खरीदारों की संख्या कम होगी और बैंक कर्मचारी संगठन तथा विपक्षी दल इसका विरोध करेंगे। यही वजह है कि हाल के दिनों में करदाताओं की मदद से सरकारी बैंकों को उबारने के कई प्रयास अवश्य हुए हैं लेकिन निजीकरण की दिशा में कोई पहल देखने को नहीं मिली है।
 
हालांकि इस गतिरोध को तोडऩे का एक तरीका है। सरकार अपने सबसे कमजोर बैंकों में से एक को निजीकरण के प्रयोग के लिए चुन सकती है। हकीकत में इसे एक ऐसे सरकारी बैंक के निजीकरण के रूप में सामने रखा जा सकता है जो बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहा। चूंकि यह एक विशिष्टï मामला होगा इसलिए राजनीतिक विरोध को भी खामोश किया जा सकता है। अगर यह बैंक बेहतर प्रदर्शन करता है तो इस सकारात्मक उदाहरण की मदद से भविष्य में निजीकरण की राह आसान की जा सकती है। संभावित अधिग्रहणकर्ता सरकारी बैंकों के अधिग्रहण के लिए सामने आ सकते हैं और उनकी बेहतर कीमत मिल सकती है। हर नया निजीकृत होता बैंक इस दलील को मजबूत बनाएगा। इससे विरोध कम होगा और मांग बढ़ेगी। किसी छोटे और कमजोर प्रदर्शन वाले सरकारी बैंक के निजीकरण के साथ इसकी शुरुआत की जा सकती है। सरकार को इस काम में अब और अधिक देरी नहीं करनी चाहिए। चरणबद्घ रूप में ही सही लेकिन इस प्रक्रिया की शुरुआत अब हो जानी चाहिए। 
Keyword: nirav modi, bank, loan, debt, PNB, fraud,,
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