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एक साथ दो मोर्चों पर जंग और रक्षा तैयारी का मिथक

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  March 18, 2018

वित्त वर्ष 2018-19 के लिए रक्षा बजट में की गई मामूली बढ़ोतरी देश की सामरिक आकांक्षाओं और उनके लिए वाजिब फंड मुहैया कराने की हमारी सीमित क्षमताओं के बीच असंतुलन को दर्शाती है। अगले साल समूचा रक्षा आवंटन 4.04 लाख करोड़ रुपये रहेगा जो मौजूदा वित्त वर्ष के 3.74 लाख करोड़ रुपये से महज 8.1 फीसदी अधिक है। लोगों को डर सता रहा है कि यह बजट भारत की 'वाजिब सुरक्षा जरूरतों' को पूरा करने के लिए नाकाफी होगा। लेकिन ये लोग इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि पिछले दो दशकों में आई सरकारों के बीच इस पर सहमति रही है कि रक्षा मद में कितना खर्च किया जा सकता है? तत्कालीन संप्रग सरकार ने वर्ष 2009 से 2014 के बीच अपने बजटों में कुल वार्षिक व्यय का 16-17 फीसदी हिस्सा रक्षा मद में आवंटित किया था। मौजूदा सरकार ने उसी सिलसिले को जारी रखा है।

 
इसके बावजूद भारतीय नीति नियंताओं और सुरक्षा जानकारों ने हमारे रक्षा उद्देश्यों को बेहद अवास्तविक और विस्तारित संदर्भों में पेश करना जारी रखा है। उनका कहना है कि हमारी सेना को एक साथ दो मोर्चों पर जंग लडऩे और जीतने के लिए तैयार रहना चाहिए। पाकिस्तान को मात देने के अलावा चीन को रोक कर रख पाने की क्षमता भी अर्जित करनी होगी। कुछ ने एक साथ ढाई मोर्चों पर खतरा होने की अवधारणा पर भी जोर देना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान और चीन के साथ जम्मू कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी भी भारत के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। ऐसा होने पर भारतीय सेना का बड़ा अमला रसद और कुमुक की सुरक्षा में ही लगाना पड़ेगा। साथ ही भारतीय नौसेना को हिंद महासागर पर दबदबा भी कायम रखना होगा। 
 
अगर हमारी सुरक्षा की दरकती इमारत को इन जिम्मेदारियों के बोझ के चलते गिरने से बचाना है तो हमें अपने रक्षा लक्ष्यों को नए सिरे से निर्धारित करना होगा। रक्षा व्यय को जीडीपी के 2.18 फीसदी से बढ़ाकर तीन फीसदी तक पहुंचाने की सामरिक विशेषज्ञों की मांग को पूरा कर पाना भी हमारे राजनीतिक परिवेश में संभव नहीं है। ऐसे में अगर हम तीन तात्कालिक बदलाव करें तो फायदा हो सकता है। 
 
पहला, हमें अपने सुरक्षा लक्ष्यों को वास्तविकता के आधार पर तय करना चाहिए। ढाई मोर्चों पर युद्ध सैद्धांतिक तौर पर भले ही संभव है लेकिन यह हमारी रक्षा तैयारियों का आधार नहीं हो सकता है। यह केवल एक बदतर उथल-पुथल भरी स्थिति ही होगी जिससे निपटने के लिए हमारी नाभिकीय प्रतिरोध क्षमता काफी होगी। भले ही सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने सेना को विभिन्न मोर्चों पर जंग के लिए तैयार रहने को कहा है लेकिन जमीनी स्तर पर सेना की कमान संभाल रहे दो कमांडरों ने एकसाथ दो मोर्चों पर लड़ाई की सोच को लेकर सजग किया है। पश्चिमी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सुरिंदर सिंह ने कहा है कि दो मोर्चों पर जंग लडऩा कभी भी चतुराई भरा विचार नहीं हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के साथ रिश्तों को चतुराई से साधा जाए तो पाकिस्तान के साथ समीकरण बेहतर करने में मदद मिलेगी। शिमला स्थित प्रशिक्षण कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एम एम नरवाने ने भी कहा है कि नियंत्रण रेखा पर हालात शांत करने के लिए कौशलता दिखाने की जरूरत है। कश्मीर में तैनात अन्य कमांडर भी कह चुके हैं कि अलगाववादियों समेत सभी पक्षों के बीच समग्र वार्ता से कश्मीर घाटी में माहौल शांत हो सकता है।
 
असल में ढाई मोर्चों पर लड़ाई की स्थिति हमारी रक्षा रणनीति, कूटनीति, सीमा प्रबंधन और अंदरूनी राजनीतिक प्रबंधन की समवेत और समेकित नाकामी को बयां करेगी। केवल बहुत समृद्ध देश ही इतनी बुरी स्थिति के लिए खुद को तैयार करने का बोझ उठा सकते हैं। ऐसे में ढाई मोर्चे पर जंग को मानदंड मानना हमारी रक्षा तैयारी, वित्तीय इंतजाम, सैन्य तैनाती और कूटनीति की दिशा को भटका सकता है। हमें तो यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमें कभी भी कई मोर्चों पर युद्ध का सामना ही नहीं करना पड़े। 
 
दूसरा बदलाव सेना की कार्मिक नीति में व्यापक स्तर पर सुधार से संबंधित है। हमारे रक्षा बजट का आधे से भी अधिक हिस्सा जवानों के वेतन एवं पेंशन पर खर्च हो जाता है और एक चौथाई से भी कम बजट सेना के आधुनिकीकरण के लिए बचता है। थल सेना में 15 लाख से अधिक जवान हैं जबकि नौसेना और वायुसेना में भी मिलकर 2.38 लाख जवान हैं। अधिकांश जवान 17-19 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उन्हें आजीवन पेंशन मिलता रहता है। 
 
हमने शायद ही इस पर गौर किया है कि हमें पर्वतीय सीमाओं की सुरक्षा के लिए इतना खर्च क्यों करना पड़ता है? इन सीमाओं पर तैनात जवान अक्सर मैदानी इलाकों के निवासी होते हैं और उन्हें वहां के भौगोलिक परिवेश के बारे में बहुत जानकारी नहीं होती है। सेना सीमावर्ती इलाकों के जवानों को भर्ती करने की दिशा में शायद ही प्रयास करती है। वैसे स्थानीय निवासियों से बनी लद्दाख स्काउट जैसी टुकडिय़ां काफी कारगर साबित हुई हैं। 'नैशनल गाड्र्स' की टुकडिय़ां बनाने के लिए हमें यही तरीका अपनाना होगा जिनमें स्थानीय इलाकों के जवान 5-7 साल तक के लिए भर्ती किए जाएंगे और उन्हें पेंशन भी नहीं देनी होगी। पेंशन दायित्व कम करने के लिए सेना के अन्य अंगों में भी 'शॉर्ट सर्विस' मॉडल को अपनाना चाहिए।
 
तीसरे और अंतिम बदलाव के बारे में तो कई समितियां सुझाव दे चुकी हैं। उनका कहना है कि सरकार को सेना के विभिन्न अंगों के मुख्यालयों को रक्षा मंत्रालय के साथ संबद्ध कर देना चाहिए। अभी तक इन मुख्यालयों में तैनात सैन्य अधिकारियों को हरेक छोटी-बड़ी बात के लिए रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लेनी पड़ती है। लोक सेवकों के  वर्चस्व वाले वित्त मंत्रालय और सैन्य मुख्यालयों के बीच संस्थागत वैमनस्य देखा जाता रहा है। एकीकरण से दोनों ही एक दूसरे की क्षमताओं से परिचित हो सकेंगे और फैसलों में होने वाली देरी भी कम होगी।
Keyword: defense, military, budget,,
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