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आम आदमी पार्टी का माफीनामा

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 18, 2018

आम आदमी पार्टी (आप) के जन्म के एकदम सटीक समय के बारे में बता पाना थोड़ा मुश्किल है। तकनीकी तौर पर इसका जन्म 4 अगस्त, 2012 को माना जाता है जब राजनीति को गंदा कहने और सभी नेताओं की लानत-मलानत करने के बाद इसके संस्थापकों ने खुद ही राजनीति में उतरने का ऐलान किया था। वैसे आप की उत्पत्ति की नींव वर्ष 2010 में ही रख दी गई थी। 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' अभियान उसी समय शुरू हुआ था और अन्ना हजारे के रूप में उसे अपना शुभंकर और ब्रांड ऐंबेसडर मिला था। लेकिन पूरे तामझाम के संचालक निस्संदेह युवा अरविंद केजरीवाल ही थे।

 
यह नई ताकत लंबे समय तक निराकार ही रही। जन लोकपाल के सिवाय कभी भी इसका कोई सुदृढ़ घोषणापत्र या एजेंडा नहीं था। उसके लिए जन लोकपाल भ्रष्टाचार से जुड़ी सभी बुराइयों के खात्मे का इकलौता हथियार था। उसकी कोई ठोस विचारधारा नहीं थी। लेकिन इसी बात ने समाज के सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों को उससे जुडऩे और एक मंच पर आने की सहूलियत भी दी। भ्रष्टाचार से लड़ाई के नाम पर ऐसे लोग भी साथ हो गए जो पूरी तरह अलग थे। स्वामी अग्निवेश और स्वामी रामदेव एक साथ मंच साझा कर सकते थे। वकील प्रशांत भूषण के लिए 'वाम' और कवि कुमार विश्वास के लिए 'दक्षिण'ं में जगह पाने की भी गुंजाइश बनी। मीडिया के कुछ सदाशयी लोगों को भी इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आदर्शवादी रुझान पसंद आया और वे उसके साथ आ गए। मनीष सिसोदिया, आशिष खेतान और आशुतोष जैसे कुछ नाम अहम हैं।
 
मेधा पाटकर और अखिल गोगोई से लेकर मयंक गांधी जैसे तमाम एक्टिविस्ट भी साथ आ गए। कई पेशेवर (मीरा सान्याल), सेवानिवृत्त नौकरशाह (अरुण भाटिया) और पूर्व न्यायाधीश (संतोष हेगड़े) भी खिंचे चले आए। योगेंद्र यादव जैसे वामपंथी रुझान वाले उदार बुद्धिजीवी भी इसका हिस्सा बने। उन दिनों आंदोलन की मंशा, तरीके और विश्वासों को लेकर कोई सवाल उठाने के लिए आपका थोड़ा पागल होना जरूरी था। हमने कुछ सवाल उठाए तो हमारी खूब आलोचना की गई थी। हमने यह पूछा था कि यह समूह किस मकसद के लिए लगा हुआ है? इस पर हमें केजरीवाल का लिखा संक्षिप्त घोषणापत्र पढऩे को कहा गया। उसे पढऩे से हमें यही लगा कि वह तो कुछ निराधार मान्यताओं का एक संकलन (अरविंद चित्र कथा) मात्र है। हमारा तर्क था कि किसी विचारधारा के बगैर केवल भ्रष्टाचार-विरोध के नाम पर लंबे समय तक राजनीति कैसे की जा सकती है? 
 
इस पर हमसे कहा गया कि यह सवाल अप्रासंगिक है। राजनीति में कभी उनकी रुचि नहीं होने के बारे में सवाल पूछने का साहस हम कैसे कर सकते थे? दरअसल 'मेरा नेता चोर है' जैसी सोच वाले लोगों की कोई राजनीतिक विचारधारा हो भी नहीं सकती थी। संसद को चोरों और डकैतों का ठिकाना बताया गया था। जन लोकपाल संस्था में खास तौर पर गैर-राजनीतिक शख्सियतों को ही तैनात किया जाना था। सीबीआई को नई संप्रभु शक्ति बनाया जाना था। इसका अपरिहार्य नतीजा यह हुआ कि व्यवस्था बदल पाने का कोई और रास्ता नहीं रह जाने से उन्होंने खुद ही नेता बनने का फैसला कर लिया। उस दिन पर्यवेक्षकों के आकलन का अनुमोदन हो गया।
 
यह लोकप्रिय आंदोलन एक राजनीतिक दल के रूप में तब्दील हो गया लेकिन उन्हें एकजुटता के मोर्चे पर बड़ी चुनौती मिली। एक मकसद के लिए साथ खड़े रहे लोग सत्ता आते ही दूर होने लगे। भ्रष्टाचार के खात्मे के बजाय अब उनका जोर स्वच्छ शासन के जरिये नजीर पेश करने पर था।  लेकिन यह सोच कभी भी कारगर नहीं होती है। असम के लोकप्रिय छात्र आंदोलन से बना राजनीतिक दल असम गण परिषद (अगप) भी दीर्घकालिक असर नहीं रख पाया। उस पार्टी ने 1985 में अपने पहले चुनाव में शानदार कामयाबी हासिल की थी लेकिन उसके बड़े नेता एक साथ नहीं रह सके। कई नेता आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में हैं। इनमें असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और उनके चर्चित मंत्री हिमंत विश्व शर्मा भी शामिल हैं। (निष्कर्ष: एक बार मकसद खत्म हो जाने और कोई विचारधारा नहीं होने से वह बाकी दलों की ही तरह हो गया।)
 
आप की भी हालत कमोबेश ऐसी ही है। इसके कई प्रमुख संस्थापक सदस्य अब उससे दूर जा चुके हैं। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने एक प्रतिद्वंद्वी दल बना लिया है। कुछ लोग हताशा का इजहार अलग तरह से कर रहे हैं। अन्ना अक्सर केजरीवाल को 'सत्ता का भूखा' बताते हैं। वे लोग भी केजरीवाल के खिलाफ ट्विटर पर गुस्सा निकालते रहते हैं जिन्हें मंत्री पद से हटाया जा चुका है। ताजा मामला पार्टी की पंजाब इकाई का है। एक साल पहले तक माना जा रहा था कि आप पंजाब में सरकार बनाकर खुद को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका।   
 
हालांकि आप में केजरीवाल के रूप में एक निर्विवाद नेता मौजूद है। केजरीवाल सत्ता की राजनीति में नरेंद्र मोदी की ही तरह निर्मम साबित हुए हैं। नतीजा यह हुआ है कि आप ने पुराने आदर्शवाद और युवा निष्कपटता को तिलांजलि दे दी है और एक व्यक्ति-केंद्रित पार्टी बन चुकी है।  जब भी केजरीवाल को कोई चुनौती देता है या उनके मुकाबले में खड़ा होता है तो वह मोदी की ही तरह 'जो हमसे टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा' के सिद्धांत पर चलते नजर आते हैं। पार्टी के भीतर और बाहर की चुनौतियों से निपटने के लिए केजरीवाल ने एक और तरकीब अपनाई है। केजरीवाल अपने प्रतिद्वंद्वी को भला-बुरा कहते हैं और आरोपों की बौछार करते हुए विरोधी की निष्ठा पर सवाल खड़ा कर देते हैं। वह कभी भी यह नहीं सोचते हैं कि आरोपों से संबंधित पुख्ता सबूत है या नहीं। 
 
आरोप लगाने की यह रणनीति तीन कारकों पर आधारित है। पहला, भ्रष्टाचार से बचे शख्स के तौर पर केजरीवाल की छवि उनके आरोपों को थोड़ी विश्वसनीयता देती है। दूसरा, निडर और बगावती तेवर वाले केजरीवाल के आरोपों को लोगों की तारीफ मिलती है जिससे उनके प्रतिद्वंद्वी का मनोबल टूट जाता है। तीसरा और अंतिम, अगर हमले की जद में आया ïव्यक्ति अदालत भी चला जाता है तो कानूनी कार्यवाही बहुत लंबी चलती है। इन कारणों से एक दुखद राजनीतिक विरोधाभास पैदा हुआ है। भारत की सबसे नई पार्टी पढ़े-लिखे नेताओं की भरमार होते हुए भी सबसे उजड्डï है।
 
लेकिन अब ये कारक बदल गए हैं। सत्ता में तीन साल रहते समय केजरीवाल को अपने कई मंत्रियों को ही भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण के आरोपों के चलते हटाना पड़ा है जिससे उनके भ्रष्टाचारी नहीं होने के प्रति भरोसा कम हुआ है। अरुण जेटली के मामले में जितनी तेजी से अदालती कार्यवाही चल रही है उससे खुद केजरीवाल भी आशंकित हो गए हैं। उन्हें बखूबी अहसास हो चुका है कि उन पर चल रहे 30 से अधिक मामलों में दम है और उनका पक्ष कमजोर है। आरोपों से उनके पीछे हटने की वजह यही है। लेकिन इससे दूसरों को अचंभित करने वाली उनकी राजनीति का दूसरा कारक यानी निडर बगावती छवि कमजोर हो जाती है।
 
आम आदमी पार्टी की राजनीतिक ताकत तीन साल पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। लेकिन पार्टी दिल्ली में अब भी एक ताकत है। अपनी लोकप्रियता और स्वयंसेवकों की मेहनत के चलते दिल्ली के गरीबों के बीच इसका मजबूत आधार बन चुका है। मध्यवर्ग ने भले ही आप का साथ छोड़ दिया है लेकिन दिल्ली में आज चुनाव होने पर वह दोबारा जीत सकती है। इस पार्टी का गठन व्यवस्था बदलने और देश बचाने की सोच के साथ हुआ था लेकिन अब वह खत्म हो चुका है। क्या वे खुद को दोबारा खड़ा कर सकते हैं? राजनीति में कभी भी किसी बात को नकारा नहीं जा सकता है। हम अब भी आप की वापसी देख सकते हैं लेकिन उम्मीद यही रहेगी कि अनाप-शनाप बातें करने वाली राजनीति न लौटे।
 
(द प्रिंट के साथ विशेष संयोजन के तहत प्रकाशित लेख)
Keyword: aap, arvind kejriwal, panjab,,
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