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मिलीजुली तस्वीर

संपादकीय /  March 18, 2018

गत सप्ताह के आरंभ में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दो-दो खुशियां आईं। दो प्रमुख वृहद आर्थिक संकेतकों ने बदलाव के संकेत दिए। आंकड़ों से पता चलता है कि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) द्वारा आकलित औद्योगिक गतिविधियों में जनवरी में लगातार तीसरे महीने 7.5 फीसदी की दर से मजबूत वृद्धि देखने को मिली। इससे पिछले महीने यह दर 7.1 फीसदी थी। यह मजबूती व्यापक थी क्योंकि 23 उद्योगों में से 16 में वृद्धि दर्ज की गई। विनिर्माण की वृद्धि करीब 9 फीसदी हो गई। टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में 8 फीसदी की वृद्धि देखने को मिली जबकि पिछले माह यह बमुश्किल 1.4 फीसदी थी।

 
दूसरी अच्छी खबर मुद्रास्फीति के मोर्चे पर मिली। खुदरा महंगाई पर आधारित महंगाई दर फरवरी में 4.4 फीसदी के साथ चार महीने के निचले स्तर पर आ गई। यह गिरावट मोटे तौर पर खाद्य और ईंधन आदि क्षेत्रों की वजह से आई। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक जो दिसंबर में करीब 5 फीसदी के स्तर पर था, उसमें नाटकीय गिरावट आई और फरवरी में यह 3.26 फीसदी रह गई। हालांकि बिना खाद्य और ईंधन के मूल महंगाई दर ऊंची बनी रही लेकिन शीर्ष मुद्रास्फीति दर आरबीआई द्वारा मार्च तिमाही के लिए जताए गए अनुमान की तुलना में कमतर रही। पिछली मौद्रिक नीति में आरबीआई ने मार्च तिमाही के खुदरा महंगाई संबंधी अनुमान को बढ़ाकर 5.1 फीसदी कर दिया था और अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में मुद्रास्फीति के 5.1 से 5.6 फीसदी के दायरे में रहने का अनुमान जताया था। फरवरी माह में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई में भी कमी आई और यह 2.48 फीसदी रह गई। 
 
नवंबर महीने में आठ महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद यह बहुत तेज गिरावट है। इसके पीछे भी समान वजह उत्तरदायी रहीं। इसके अलावा भी राहत कई मोर्चों से आई। जनवरी तक प्रत्यक्ष कर संग्रह जहां 19.3 फीसदी की उल्लेखनीय दर से बढ़ा, वहीं जीएसटी से आने वाला राजस्व भी स्थिर होता नजर आया। हालांकि भारतीय मौसम विभाग ने अब तक आधिकारिक अनुमान जाहिर नहीं किए हैं लेकिन शुरुआती संकेतक बताते हैं कि इस साल भी मॉनसूनी बारिश अच्छी रहेगी। यह बात भी उद्योग जगत के लिए सकारात्मक है। यद्यपि तस्वीर हर ओर गुलाबी भी नहीं है। सप्ताह का अंत निर्यात के मोर्चे पर बुरी खबर के साथ हुआ। फरवरी के आंकड़ों से पता चला कि विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाले प्रमुख क्षेत्रों मसलन कपड़ा और इंजीनियरिंग वस्तुओं के कारोबार में कमजोरी आई। फरवरी में निर्यात महज 4.5 फीसदी की दर से बढ़ा। नवंबर में 30.5 फीसदी की वृद्धि के बाद यह लगातार तीसरा महीना है जब इसमें तेज गिरावट आई है। आश्चर्य नहीं कि व्यापार घाटा पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा रहा। चालू वित्त वर्ष में ऋण में वृद्धि की दर भी अत्यंत कम रही। हालांकि आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक फरवरी के अंत में इसमें अचानक तेज वृद्धि देखने को मिली।
 
देश की मजबूत समेकित वृद्धि की मजबूती से जुड़ी एक और आशंका सरकारी क्षेत्र के उद्यमों से जुड़ी जवाबदेहियों से संबंधित है। खबरों में कहा गया है कि सरकारी क्षेत्र की कंपनी पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन का 11.4 फीसदी ऋण दिवालिया प्रक्रिया में जा सकता है। इसी प्रकार एक अन्य सरकारी उपक्रम स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन (एसटीसी) के कई खातों को गैर निष्पादित परिसंपत्ति घोषित कर दिया गया है क्योंकि इन ऋणों पर ब्याज नहीं मिल रहा था। अब जबकि आरबीआई फंसे हुए कर्ज और दिवालिया प्रक्रिया के लिए कहीं अधिक कड़े और पारदर्शी मानक लेकर आया है। तो ऐसे में स्वाभाविक है कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों को सरकार से अधिक मदद की आवश्यकता होगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में सतत सुधार अभी अनिश्चित है। 
Keyword: IIP, growth, STC,,
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