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'राष्ट्र' का पतन

संपादकीय /  March 16, 2018

चीन के उत्थान को रफ्तार देने की राह में खड़ी समस्या पर केंद्रित सैकड़ों किताबें और लाखों लेख लिखे जा चुके हैं। इस समय की कहीं अधिक बड़ी समस्या अमेरिका के पतन को रोकने की लगती है। चीन को विश्व व्यवस्था के लिए एक खतरे के तौर पर पेश किया जाता रहा है। उसकी व्याख्या एक ऐसे देश के तौर पर की गई है जो घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय नियमों के हिसाब से नहीं चलता है। इसीलिए एक सदी पहले जर्मनी के उभार को संभाल पाने की नाकामी और उसके दुष्प्रभावों को भी इतिहास के एक खास प्रिज्म से देखने की कोशिश की जाती रही है।

 

अब समूचे हालात को अलग नजरिये से देखने का वक्त आ चुका है। हमारे सामने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दबदबे वाली महाशक्ति है जो पतन के दौर से गुजर रही है। हालांकि यह पतन महज सापेक्षिक है। चीन से मिली सीमित चुनौती के बाद उसकी हालत वही बन गई है जो पहले खुद चीन के बारे में कही जाती थी। वह देश भी विश्व व्यवस्था के लिए खतरा, व्यापार एवं जलवायु संबंधी नियमों का पालन नहीं करने वाला और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से बेपरवाह हो चुका है। 

वह 'असाधारण' देश अपने आचरण, खासकर निर्वाचन व्यवहार के मामलों में  चिंताजनक रूप से अविश्वसनीय हो चुका है। इसी का नतीजा है कि आज सत्ता के केंद्र में एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो शीर्ष पद के लिए बना ही नहीं है और अपने समझदार सलाहकारों से छुटकारा पाने के लिए उनका 'सरकलम कर देने का फरमान' सुनाने वाली रेड क्वीन की तरह बरताव करता है। जब वह ऐसा नहीं कर पाता है तो वह व्यवस्था से पैदा होने वाले अवरोधों को ही हटाने में लग जाता है। किसी को भी नहीं पता होता है कि वह उत्तर कोरिया या मैक्सिको के मामले में आगे क्या करेगा? 

कामयाबी हासिल करने से कहीं अधिक मुश्किल पतन को थामना होता है। कंपनियों को खुद को समेटना पड़ता है, कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ती है और लागत कम करनी पड़ती है, नहीं तो उन्हें दिवालिया होना पड़ता है। लेकिन समूची अर्थव्यवस्था ही पतनशील हो तो क्या होगा? घरेलू तौर पर हानि का बोझ (अमेरिका के संदर्भ में विनिर्माण क्षेत्र) हमेशा ही अनुचित तरीके से पैदा होता है जिससे सामाजिक एवं राजनीतिक दबाव पैदा होते हैं जो खांचे को तोड़ते हैं और नए सवाल खड़े करते हैं। इस दौरान अगर अच्छे जवाब मिल जाते हैं तो पूरी प्रणाली में संतुलन आ जाता है। लेकिन अगर ऐसा न हो तो? फिर हमें डॉनल्ड ट्रंप मिलते हैं। आर्थिक तौर पर व्यवस्था को बनाए रखने की चाहत से ही पुराने बुरे विचारों का पुनर्जन्म होता है। 

वहीं अंतरराष्ट्रीय रूप में नियंत्रण का अभाव होने लगता है। अगर आज की बात करें तो पतन होने से रूस जैसे दावेदारों का उत्साह बढ़ता है। गलतियों के ही चलते हालात यहां तक पहुंच गए हैं। चीन को एक ऐसा देश समझने में गलती की गई कि वह समृद्धि हासिल करने और मध्य वर्ग के उदय के बाद सामान्य (यानी लोकतांत्रिक) हो जाएगा। उसी धारणा के चलते चीन को व्यापार में ऐसी रियायतें दी गईं जो अब अमेरिका को ही परेशान करने लगी हैं। चीन ने बहुत ही चतुराई दिखाते हुए अपने 'शांतिपूर्ण' उदय का वादा किया था लेकिन अब उसका व्यवहार किसी भी अन्य प्रभुत्वकारी शक्ति की तरह हो चुका है। 

यह उस सामान्यीकरण से एकदम अलग है जिसकी उम्मीद की गई थी। इसी तरह ईरान को एक ऐसा देश बताया गया था जो अपने मकसद को पहले रखता है। इसके चलते उसके साथ बदसलूकी भी होती रही। इराक का तो बुरा हाल कर दिया गया। अगर पश्चिमी देशों ने रूस के साथ चौथाई सदी पहले हुए समझौते का सम्मान किया होता या उसे थोड़ी जगह दी होती तो आज रूस भी उनके प्रति अधिक सहयोग का रवैया अपनाता। 

ऐसा नहीं है कि केवल अमेरिका ही पतन के दौर से गुजर रहा है। सऊदी अरब जैसे उसके कुछ अहम सहयोगी भी इसका सामना कर रहे हैं। सऊदी अरब का तेल बाजार पर दबदबा खत्म हो चुका है और उसे ईरान के उभार से उपजे जोखिम का भी सामना करना पड़ रहा है। हालात को काबू में करने के लिए सऊदी अरब ने तेल उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई लेकिन वह भी कारगर नहीं रही। तेल की जरूरत तकनीकी प्रगति के चलते कम होने के आसार हैं जिससे उसकी संपन्नता खतरे में पड़ सकती है। हालांकि अब वह घरेलू स्तर पर कुछ सुधार कर रहा है लेकिन उसका तरीका संस्थागत न होकर व्यक्तिगत ही है। सोवियत संघ के पतन के समय गोर्बाचॉफ को भी यही अहसास हुआ कि सुधारों के सफल होने की कोई गारंटी नहीं है।
Keyword: चीन, विश्व व्यवस्था, चीन, आचरण, निर्वाचन,
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