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कृत्रिम बुद्धिमत्ता को व्यापक पैमाने पर अपनाने का वक्त

अमिताभ कांत /  March 15, 2018

समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को अपनाए जाने के तीन कारक रहे हैं। व्यापक स्तर पर समानांतर अभिकलन संसाधनों की उपलब्धता, एआई की गतिविधि से सामंजस्य बिठाने वाली बेहतर कंप्यूटर प्रणाली का विकास और इंटरनेट से संबंधित प्रचुर आंकड़ों की उपलब्धता का एआई के तीव्र विकास में खास योगदान रहा है। इनके सम्मिलित असर से इमेज लेबलिंग में त्रुटि की दर 2010 के 28.5 फीसदी से घटकर महज 2.5 फीसदी पर आ चुकी है। 

पीडब्ल्यूसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक विश्व अर्थव्यवस्था में एआई का योगदान 15.7 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा जो चीन एवं भारत के मौजूदा साझा आउटपुट से भी अधिक होगा। वहीं एक्सेंचर की रिपोर्ट 'रीवायर फॉर ग्रोथ' में कहा गया है कि एआई के चलते भारत की वार्षिक वृद्धि दर में वर्ष 2035 तक 1.3 फीसदी की उछाल आ सकती है। इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में 957 अरब डॉलर की अतिरिक्त रकम आ जाएगी जो भारत के मौजूदा सकल मूल्य संवद्र्धन का 15 फीसदी होगा। 


विकासशील देशों में भारत एआई का अधिकतम लाभ उठा पाने की स्थिति में है। तकनीक के मोर्चे पर हमारी मजबूत स्थिति, अनुकूल जनांकिकीय परिदृश्य और समुन्नत आंकड़ों की उपलब्धता में संरचनात्मक लाभ होने से भारत एआई के लिए कहीं बेहतर तैयार है। दरअसल वैश्विक एआई उपयोगकर्ताओं के लिए भारत के संदर्भ में आंकड़ों की विविधता एक बड़ी बाधा रही है क्योंकि एआई की मौजूदा गणना-पद्धतियों को ईंधन देने का काम आंकड़े ही करते हैं। एआई-आधारित इस्तेमाल सरकारी स्तर पर खास उपयोगी हैं क्योंकि वहां आंकड़ों की बहुलता होने के साथ गुणवत्ता भी सुनिश्चित करनी होती है।

भारत एआई-आधारित स्टार्टअप की संख्या के मामले में वर्ष 2016 में जी-20 देशों के बीच तीसरे स्थान पर था। इस तरह के स्टार्टअप भी वैश्विक स्तर से अधिक वर्ष 2011 के बाद 86 फीसदी बढ़ गए थे। हालांकि यह क्षेत्र प्राथमिक रूप से एक्सेंचर, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी अमेरिकी कंपनियों के दबदबे में रहा है। इन कंपनियों के नवोन्मेष केंद्र भारत में भी मौजूद हैं।

दरअसल एआई के मामले में नवोन्मेष और उद्यमशीलता को बढ़ावा देना काफी अहम है। ऐसा नहीं होने पर घरेलू समाधान एवं स्थानीय उद्यमी लगातार बढ़ते अवरोधों का सामना नहीं कर पाएंगे। बड़े नेटवर्कों के सार्वभौम प्रतिरूप होने से कोई भी एआई ऐप्लिकेशन उतना ही अच्छा साबित होता है जितना बेहतर उसका डाटा होता है। लेकिन मौजूदा दौर में डाटा की उपलब्धता कुछ ही कंपनियों के हाथों में केंद्रित होती जा रही है। फेसबुक के सक्रिय मासिक उपभोक्ताओं की संख्या करीब दो अरब है। इसी तरह गूगल इंटरनेट पर होने वाले करीब 90 फीसदी तलाश का माध्यम बना हुआ है।

हालांकि यूपीआई और आधार जैसे नवाचार और मोबाइल फस्र्ट उपयोग के चलते अब हमारे पास बहुत सारे विशिष्ट आंकड़े भी मौजूद हैं। हमारी जरूरतें भी खास तरह की हैं। हमें निजता के संदर्भ में नया नजरिया अपनाना चाहिए ताकि कूटबद्ध बहुपक्षीय गणना जैसी मशीनी सीख को संरक्षित रखा जा सके।

नमओपनमाइंड डॉट ऑर्ग एक ऐसा ही प्रोजेक्ट है जो प्रशिक्षण उद्देश्यों के लिए कूटबद्ध एवं अनाम आंकड़ों के इस्तेमाल का जरूरी टूल बनाने में लगा है। इस तरह निजी आंकड़े पूरी तरह निजी बने रहेंगे लेकिन मशीनी गणना पद्धति उनसे सबक हासिल कर सकेगी। एआई को अक्सर सरकारें 'सुदूर भविष्य' वाली तकनीक की तरह देखती हैं। सरकारों के अनुसंधान प्रभागों पर ही एआई का जिम्मा छोड़ दिया जाता है। सरकारें कई बार कोई बड़ी पहल करती हैं लेकिन उन योजनाओं को स्थानीय लोगों की जरूरतों के हिसाब से बनाया ही नहीं गया होता है। इस प्रवृत्ति को बदलने की जरूरत है।

तर्कसंगत मुद्दा यह है कि गुणवत्तापरक प्रशिक्षण डाटा शामिल करने से किसी भी एआई ऐप्लिकेशन की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में एआई के इस पहलू को समाहित करने लायक बदलाव बौद्धिक संपदा कानूनों में भी करने होंगे। विकासशील देशों को एआई का उपयोग जरूर बढ़ाना चाहिए। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और अन्य क्षेत्रों में तो एआई का अधिक उपयोग जरूर करना चाहिए। 

नीति आयोग इस तरह के कई प्रोजेक्ट चला रहा है। पहला, आयोग इसरो और आईबीएम के साथ मिलकर फसलों की उपज बढ़ाने और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर करने में एआई समाधान तलाशने की कोशिश कर रहा है। उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों और सरकार के पास उपलब्ध अन्य आंकड़ों की मदद से यह किया जा रहा है। इसके असर और सटीकता को जांचने के लिए शुरुआत में इसे देश के 25 जिलों में लागू किया जाएगा। एआई-आधारित जानकारी को किसानों के साथ साझा किया जाएगा ताकि वे जरूरी कदम उठा सकें। आंकड़ों को ई-नाम मंडियों से भी जोड़ा जाएगा जिससे किसानों को फसल का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।

दूसरा, नीति आयोग उद्यमियों और डेवलपरों के लिए क्षेत्रीय भाषा की एआई-निरपेक्ष भाषा प्रसंस्करण लाइब्रेरी बनाने में भी लगा है। प्रधानमंत्री 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' का आह्वïान कर चुके हैं। लोगों के बीच संवाद को बढ़ावा देने के साथ ही भाषाई विविधता को संरक्षित रखना भी इसका उद्देश्य है। आयोग एक राष्ट्रीय भाषा प्रसंस्करण प्लेटफॉर्म बनाने की संभावनाएं भी तलाश रहा है। 

यह प्लेटफॉर्म एआई ऐप्लिकेशन को देसी भाषाओं पर आधारित पहचान और अस्तित्व निष्कर्ष जैसे काम के लायक बनाने में मददगार होगा। इससे एआई डेवलपर स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने वाली समूची आबादी तक पहुंच बना सकेंगे और उन्हें अलग भाषाओं के लिए अलग मॉडल भी नहीं तैयार करने होंगे।

तीसरा, आयोग तस्वीरों का एक 'बायोबैंक' बनाने के लिए विभिन्न चिकित्सा संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है। यह बायोबैंक सीटी स्कैन, एमआरआई, अल्ट्रासाउंड और एक्सरे परीक्षणों के दौरान मिली तस्वीरों का संकलन होगा और इसके इस्तेमाल से डॉक्टर बीमारियों का जल्द पता लगा सकेंगे।

ऐसी विशेषज्ञता सुपर-स्पेशिएलिटी अस्पतालों में ही मिल पाती हैं। किसी तस्वीर का स्वत: विश्लेषण करने से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) स्तर पर ही गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकेगी। पीएचसी अस्पतालों में बीमारियों के परीक्षण की सुविधाएं काफी कम हैं। बायोबैंक बनने से भारत में रोगों की पहचान और विश्लेषण की क्षमता रखने वाले केंद्र विकसित होंगे जिससे सरकार को भी क्षेत्रीय स्तर पर स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी योजनाएं चलाने में सहूलियत होगी।

चौथा, नीति आयोग सुरक्षित ब्लॉकचेन के इस्तेमाल से इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (ईएमआर) तैयार करने का खाका पहले ही बना चुका है। इससे मरीज की निजता बनी रहेगी और लोग अपने मोबाइल फोन पर ही इसे देख सकेंगे। ब्लॉकचेन पर साझा किया जा सकने वाला ईएमआर स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार को कई गुना बढ़ा सकता है। इससे स्वास्थ्य एवं जीवन बीमा का दायरा बढ़ाने, बीमा संबंधी धोखाधड़ी को न्यूनतम करने और सरकारी सब्सिडी में गड़बड़ी को खत्म किया जा सकेगा। कूटबद्ध ईएमआर डाटा को एआई समाधान से जोड़कर महामारी की आशंका और किसी इलाके में ऐंटी-माइक्रोबायल प्रतिरोध की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकेगा। इस तरह भारत के अलग राज्यों और इलाकों की जरूरतों के आधार पर खास कार्यक्रम चलाए जा सकेंगे। 

पांचवां, हम अदालतों में लंबित मामलों की बड़ी संख्या कम करने के लिए भी एआई के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं। नीति आयोग अदालतों के फैसलों के विश्लेषण का एक एआई मॉडल तैयार कर रहे हैं जिससे न्यायाधीशों को मौजूदा मामलों के बारे में अंतज्र्ञान मिल सकेगा। अदालतों में तीन करोड़ से भी अधिक मामले लंबित हैं और कारोबारी सुगमता की रैंकिंग भी इससे प्रभावित हो रही है। एआई एक बुनियादी नवाचार है। यह आगे चलकर इंटरनेट या बिजली के उपयोग से कहीं अधिक बड़ा होगा। यह हरेक उद्योग और क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लेकर आएगा। भारत को अपनी पूरी क्षमता से इसे अपनाना चाहिए।
Keyword: वैश्विक अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एआई, इंटरनेट,
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