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कुछ ज्यादा ही सख्त

संपादकीय /  March 14, 2018

ऐसा लगता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीरव मोदी घोटाले के चलते कुछ ज्यादा ही सख्ती दिखाते हुए बैंकों को गारंटी पत्र (एलओयू) और सुविधा पत्र (एलओसी) जारी करने से रोक दिया है। इस तरह आरबीआई बुरी स्थिति से निपटने के चक्कर में अच्छी चीजों को भी गंवाता हुआ नजर आ रहा है। कड़ी प्रतिद्वंद्विता वाले वैश्विक बाजार में मामूली मार्जिन पर कारोबार करने वाले निर्यातकों के लिए एलओयू और एलओसी सस्ती एवं गतिशील कार्यशील पूंजी जुटाने का जरिया साबित होते रहे हैं। 

 

खासकर उच्च ब्याज दर एवं जटिल प्रक्रियाओं वाली भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में यह निर्यातकों के लिए काफी मददगार रहे हैं। समुचित मार्जिन रकम होने और बैंकों की औपचारिक लेनदेन रिकॉर्डिंग प्रणाली में बैंक गारंटी दर्ज होने जैसे वैध तरीकों वाला एलओयू साख पत्र (एलसी) की तुलना में कारोबारी फंड जुटाने का अधिक सुविधाजनक स्रोत रहा है। 

अनगढ़ एवं कच्चे हीरों के आयात में इस्तेमाल किए जाने वाले इन साधनों को विदेशी बाजारों में कारोबार चक्र की एक अवधि (सामान्यत: 90 दिन) के लिए लाइबोर के 40-50 आधार अंकों पर सीमित किया जा सकता था। इससे निर्यातकों को महज दो फीसदी की सालाना दर पर वित्त मिल सकता था। निष्कर्षत: एलओयू का इस्तेमाल रोके जाने का निर्यातकों पर विपरीत असर पड़ेगा जो आगे चलकर अर्थव्यवस्था को भी कई तरह से प्रभावित करेगा।

पहला असर, अनुमान है कि इससे उधारी की लागत 0.5 और एक फीसदी अंक के बीच बढ़ जाएगी। दूसरा, निर्यातक फंड जुटाने के लिए डॉलर बाजार में जाने के लिए बाध्य होंगे। कच्चे तेल के भाव चढऩे से इसका असर आखिरकार रुपये पर ही पड़ेगा। तीसरा, यह रोक ऐसे समय लगी है जब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन से मची उथलपुथल अभी तक शांत नहीं हो पाई है। तमाम निर्यातक एकीकृत जीएसटी में से अपना हिस्सा पाने के लिए कई महीनों से इंतजार कर रहे हैं।

कार्यशील पूंजी जुटाने की राह में इन तमाम अवरोधों के खड़े होने से निर्यातक भी अपने विदेशी खरीदारों को ठीक से सेवा नहीं दे पा रहे हैं। लंबी आर्थिक सुस्ती से उबर रहे वैश्विक बाजार में भारतीय निर्यातकों का इस हाल में होना बेहद निराशाजनक है। भारत के कुल निर्यात में करीब 16 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला और 50 लाख रोजगार देने वाला रत्न एवं आभूषण क्षेत्र खास तौर पर इस पाबंदी का शिकार बन सकता है। हालांकि केवल पांच फीसदी आभूषण-निर्माता ही एलओयू एवं एलओसी का इस्तेमाल फंड जुटाने के लिए करते हैं लेकिन वे देश के बड़े निर्यातक होते हैं। भारत के परिष्कृत हीरे का सबसे बड़ा निर्यातक होने से इसकी अहमियत को समझा जा सकता है।

दूसरी तरफ पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी ने 127 अरब रुपये की जो धोखाधड़ी की, वह कोर बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) में बड़े लेनदेन को रिकॉर्ड करने वाली प्रणाली के दुरुस्त नहीं होने और मार्जिन रकम की जरूरत हटाने का नतीजा थी। अगर बैंक की सीबीएस प्रणाली को विश्वव्यापी स्विफ्ट प्रणाली के साथ एकीकृत किया गया होता तो यह धोखाधड़ी इतने बड़े स्तर तक नहीं पहुंच पाई रहती। 

असल में, देश के दूसरे बड़े सार्वजनिक बैंक ने लेनदेन का रिकॉर्ड रखने वाले अपने दो प्लेटफॉर्म का एकीकरण बहुत समय पहले नहीं किया है। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को वित्त मुहैया कराने वाले सभी बैंकों के लेनदेन प्लेटफॉर्म का एकीकरण आरबीआई की चिंता का विषय होना चाहिए था। 

ऐसा होने से निर्यातक के लेनदेन का खुलासा किसी बैंक कर्मचारी की निष्ठा पर निर्भर न होकर संस्थागत हो जाएगा। निर्यातकों के संगठन ने कहा भी है कि एलओयू या एलसी जैसा कोई भी साधन सौ फीसदी सुरक्षित नहीं माना जा सकता है लिहाजा इस पर रोक लगाना गंभीर परीक्षण का विषय है।
Keyword: आरबीआई, नीरव मोदी, एलओयू, साख पत्र,
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