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श्रमशक्ति में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ाना आसान नहीं

श्यामल मजूमदार /  March 13, 2018

पूरी दुनिया ने पिछले ही सप्ताह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया है। इसी दौरान भारत के लिए एक अच्छी खबर सामने आई। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बाल विवाह की जद में आने वाली लड़कियों की संख्या पिछले दशक में काफी कम हुई है। 

 

पिछले10 वर्षों में बाल विवाह की घटनाओं में सर्वाधिक कमी दक्षिण एशिया में देखी गई है। भारत के बड़े इलाकों में प्रगति होने से 18 साल से कम उम्र में लड़कियों की शादी के मामले एक तिहाई से भी कम हो चुके हैं। वैसे यह सच है कि अब भी भारत में 27 फीसदी लड़कियों की शादी वयस्क होने से पहले ही हो जाती है लेकिन एक दशक पहले के 47 फीसदी अनुपात को देखते हुए यह बड़ी गिरावट कही जाएगी।

दूसरी अच्छी खबर मॉन्स्टर वेतन सूचकांक (एमएसआई) के रूप में सामने आई। इसके मुताबिक भारत में पुरुष एवं महिला कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन का अंतर वर्ष 2017 में पांच फीसदी तक कम हुआ जबकि 2016 में यह फासला 24.8 फीसदी तक था। 

दोनों ही खबरें काफी अच्छी हैं और उनमें उम्मीद की किरण भी नजर आती है। लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर थोड़ी धुंधली हो जाती है। मसलन, एमएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुभवी कर्मचारियों के मामले में पुरुष एवं महिला के आधार पर वेतन का फर्क काफी बढ़ चुका है। हालत यह है कि 11 साल से अधिक अनुभव रखने वाले पुरुष एवं महिला कर्मचारियों के वेतन में 25 फीसदी का अंतर देखा जाता है। 

दो साल तक का अनुभव रखने वाले पुरुष कर्मचारी समकक्ष महिला कर्मचारियों की तुलना में 7.8 फीसदी अधिक वेतन पाते हैं और छह से 10 साल तक का अनुभव रखने वाले कर्मचारियों के मामले में यह अंतर 15.3 फीसदी का है। लैंगिक आधार पर होने वाले इस भेदभाव की वजह से पुरुष अपने घरों से बाहर निकलकर वेतनभोगी कर्मचारी बनना पसंद करते हैं जबकि महिलाओं के लिए यह घरों के भीतर रहकर घरेलू कामकाज करने का कारक बन सकता है।

जहां तक नाबालिग लड़कियों की शादी में गिरावट का जिक्र करने वाली यूनिसेफ रिपोर्ट का सवाल है तो वह विश्व आर्थिक मंच की 'वैश्विक लिंग-अंतराल रिपोर्ट 2017' की तुलना में हमें जमीनी सच्चाई से परे ले जाती है। विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में भारत को 144 देशों में से 108वें स्थान पर रखा गया है जबकि 2016 में भारत लिंग के आधार पर फर्क के मामले में 87वें स्थान पर मौजूद था। 

कुल श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद सबसे खराब स्थिति में है। अर्थव्यवस्था बढऩे से महिलाओं के लिए अतिरिक्त रोजगार अवसर सृजित होने के बजाय भारत में महिला रोजगार पीछे की तरफ जा रहा है। वर्ष 2017 में 15 साल से अधिक उम्र वाली श्रमशक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी 27 फीसदी पर आ गई जबकि दो दशक पहले 
यह अनुपात 35 फीसदी हुआ करता था।

राष्ट्रीय नमूना सर्वे (एनएसएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि श्रमशक्ति में 25-54 वर्ष उम्र वाली महिलाओं की भागीदारी शहरी इलाकों में 26-28 फीसदी के दायरे में स्थिर हो गई है जबकि ग्रामीण इलाकों में इस समूह की हिस्सेदारी 2011 में घटकर 44 फीसदी हो गई थी जो 1987 में 57 फीसदी हुआ करती थी। विभिन्न उम्र समूहों या विभिन्न सर्वेक्षणों में कमोबेश यही कहानी सामने आ रही है।

भारत सरकार की वार्षिक आर्थिक समीक्षा में भी मां-बाप के बीच 'बेटे को प्राथमिकता' संबंधी धारणा का जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक भारतीय दंपती अपने परिवार में बेटों की मनचाही संख्या पूरी होने तक बच्चे पैदा करना जारी रखते हैं। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक भारत में 25 साल तक की उम्र वाली करीब 2.1 करोड़ अनचाही लड़कियां हैं। इसकी वजह यह है कि उनके माता-पिता ने बेटे की चाह में अनचाही बेटियों को पैदा करना जारी रखा। 

भले ही सर्वे में कहा गया है कि पिछले डेढ़ दशक में भारत की स्थिति 17 में से 14 मानदंडों में बेहतर हुई है। महिला सशक्तीकरण की स्थिति का जायजा लेने के लिए ये मानदंड तय किए गए हैं। सच तो यह है कि लड़कियों की तुलना में लड़कों को तरजीह देने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक मानक, महिलाओं की आवाजाही पर रोक लगाने वाले पितृसत्तात्मक मूल्य और महिलाओं को काम करने से रोकने वाली लैंगिक सोच के चलते भारत में लिंग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा मिलता है।

यह एक ऐसी समस्या है जो भारत के कॉर्पोरेट जगत में शीर्ष स्तर पर भी देखी जाती है। कंपनियां भले ही इसे स्वीकार न करें लेकिन सच तो यही है कि वे महिलाओं को नौकरी देने पर लगने वाली लागत का पूरा ध्यान रखती हैं। खास बात यह है कि पुरुष कर्मचारियों को नौकरी देते समय कंपनियां लागत पर इस कदर ध्यान नहीं देती हैं। इसकी मूल वजह वह मान्यता है कि अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए महिलाएं बीच में ही नौकरी छोड़ देंगी। कंपनियों का मानना है कि बीच में ही नौकरी छोडऩे से इन महिला कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर किए गए निवेश का उन्हें पूरा प्रतिफल नहीं मिल पाता है। इतना ही नहीं, कंपनी को उस महिला कर्मचारी की जगह नए कर्मचारी को नौकरी पर रखने का खर्च भी उठाना पड़ता है। कंपनियां इस प्रवृत्ति को 'मॉमी ट्रैक' कहकर पुकारती हैं। 

यही कारण है कि बच्चे के जन्म एवं देखभाल के लिए स्वीकृत मातृत्व अवकाश की अवधि समाप्त होने के बाद जब बढिय़ा प्रदर्शन करने वाली महिला कर्मचारी भी दोबारा काम पर लौटना चाहती हैं तो उनकी राह कहीं अधिक दुश्वार हो चुकी होती है। दरअसल उनके अनुभव के हिसाब से नौकरियां कम होती हैं और उन्हें मिलने वाला वेतन भी तुलनात्मक रूप से कम होता है।
Keyword: अंतरराष्ट्रीय, महिला दिवस, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, यूनिसेफ,
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