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पड़ोसी मुल्क चीन के उदय के अंत का आरंभ

नितिन पई /  March 12, 2018

चीन में राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा राष्ट्रपति पद के कार्यकाल की अवधि सीमा समाप्त करने के प्रस्ताव के बाद जिन शब्दावलियों को सेंसर कर दिया गया उनमें 'मैं असहमत हूं' भी शामिल है। यानी शी चिनफिंग राष्ट्रपति पद पर बने रहने के लिए जन समर्थन जुटाने के क्रम में इस हद तक जा सकते हैं। चीन में नैशनल पीपुल्स कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने रविवार को पेइचिंग में अपनी सालाना बैठक की जिसमें संविधान संशोधनों को मंजूरी दी गई। ये संशोधन शी चिनफिंग को उस स्थिति में पहुंचा देंगे जिसमें एक समय माओ त्से तुंग थे और जिसमें रहना तंग श्याओ फिंग को गवारा नहीं था या जिससे वह बचते रहे।

 

उसके साथ ही तंग श्याओ फिंग का दौर आधिकारिक तौर पर समाप्त हो जाएगा। शायद तब चीन के उदय के अंत की शुरुआत की आशंका भी पहले की तुलना में ज्यादा होगी। चीन के उदय के अंत को लेकर समय-समय पर लिखा भी गया है और गलत भी साबित हुआ है लेकिन चाहे जो भी इन लेखों ने गॉर्डन चांग जैसे चीन विरोधी अमेरिकी स्तंभकारों को प्रसिद्धि भी दी है और अमीर भी बनाया है। बहरहाल, मैं यहां कोई अनुमान नहीं प्रस्तुत कर रहा हूं। बल्कि मेरा लक्ष्य है आपको चीन के पराभव के बढ़ते जोखिम से अवगत कराना।

चीन की जबरदस्त राजनीतिक प्रगति और भूराजनैतिक उभार के धीमे पडऩे या उसके पराभव की आशंका की सबसे बड़ी वजह यह है कि शी चिनफिंग तंग श्याओ फिंग की सफलता के सूत्रों से नाता तोड़कर उन नीतियों को अपना रहे हैं जिनमें माओ त्से तुंग नाकाम रहे थे। नेतृत्व परिवर्तन की संस्थागत प्रक्रिया का त्याग करना उसी कड़ी का सबसे नवीनतम उदाहरण है।

तंग के इतिहास के पाठ और माओ की त्रासद शासन शैली, जिसके कारण चीन को भयंकर कष्ट सहना पड़ा, करीब 3 करोड़ लोगों की मौत हुई और चीन का प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से भी कम रहा, उन्हें अपनाने के क्रम में वह लोकतांत्रिक व्यवस्था और एक व्यक्ति के शासन में संतुलन कायम करने की जद्दोजहद में रह गए।

वह कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन चीन में एक दलीय शासन चाहते थे। सन 1989 में थ्येन आन मन चौक पर घटी घटना इसका उदाहरण है। परंतु इसके समांतर वह एक सामूहिक नेतृत्व के हिमायती थे जहां अधिकारों का बंटवारा हो और एक दूसरे के काम पर निगरानी रखते हुए संतुलन भी हो लेकिन हित और मानक साझा हों। सिंगापुर के नेता ली कुआन यू को वैटिकन की यह व्यवस्था पसंद थी जहां कार्डिनल यह तय करते थे कि कौन उन पदों पर आएगा और फिर उनमें से एक को पोप के रूप में चुन लिया जाता।

अन्य लोग व्यवस्था के बारे में चाहे जो भी सोचें लेकिन चीन के लिए यह सन 1979 से 2010 तक कारगर रही। यही वह दौर था जब पार्टी के पहले ऐसे महासचिव को चुनने को लेकर भयंकर आंतरिक संघर्ष हुआ जिसे तंग द्वारा नहीं चुना गया था। जिन लोगों ने परिवार के मुखिया के निधन के बाद वहां छिडऩे वाले पारिवारिक विवादों को करीब से देखा होगा उनके अंदाजा होगा कि यह कैसे होता है। यहां फर्क बस इतना है कि इस मामले में पारिवारिक साम्राज्य का विभाजन संभव नहीं था। 

शी चिनफिंग ने इस कांपती हुई व्यवस्था को संभालने और सहारा देने के बजाय इसे ध्वस्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने यह काम जिस ढंग से किया वह भी माओ की याद दिलाता है न कि तंग की। कठोर नियंत्रण, शीर्ष पार्टी नेताओं को बंदी बनाना और उनके परिवार के सदस्यों पर अत्याचार करना ऐसे ही कुछ तरीके हैं। 

फोर्डम लॉ स्कूल के प्रोफेसर कार्ल मिंज्नर की एक नई किताब में कहा गया है कि चीन के आर्थिक सुधार को परिभाषित करने वाले तमाम संकेतक अब गिरावट पर हैं। ये हैं स्थिरता, संस्थागत पार्टी शासन, उच्च आर्थिक वृद्घि और शेष विश्व के प्रति खुलापन। 

उनके नजरिये में चीन एक सुधार विरोधी युग में प्रवेश कर रहा है जहां राजनीतिक शक्ति एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित है, अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर धीमी हो रही है और परिसंपत्ति वर्ग में उतार-चढ़ाव का दौर है और सुधारों की जगह एक जातीय-राष्ट्रवादी बहस ने ले ली है। श्री मिंज्नर कहते हैं कि संभव है चीन किसी चौराहे पर न हो। बल्कि वह गिरावट के चक्र का शिकार भी नजर आ सकता है। नरम अधिनायकवादी शासन आगे चलकर धीरे-धीरे कहीं अधिक कठोर अधिनायकवादी शासन में तब्दील हो सकता है। यह आगे चलकर लोकलुभावन राष्ट्रवाद का रूप भी ले सकता है। 

चीन के उदय का अंत, आवश्यक नहीं कि चीन के पराभव की भी शुरुआत हो। अगर चीन के प्रदर्शन में पूरी तरह गिरावट नहीं आती है तो भी यह तय है कि अनुकूल बाहरी परिस्थितियां अब पहले जैसी नहीं रहेंगी। मिसाल के तौर पर पश्चिमी देशों ने चीन के उदय में जमकर निवेश किया था। उन्हें उम्मीद थी कि इससे चीन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में लाने में मदद मिलेगी। ट्रंप की संरक्षणवादी कारोबारी नीतियां और राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे में इस क्षेत्र को लेकर उत्साह चीन के दबदबे को संतुलित करने का प्रयास है जो चीन की नीतिगत गुंजाइश को सीमित करेगा। 

इस बीच घरेलू सामाजिक हालात पर धीमी वृद्घि दर का प्रभाव पड़ेगा। विनिर्माण, निर्माण, अचल संपत्ति और बुनियादी ढांचा उद्योग पहले की तरह तेजी से नहीं विकसित हो रहे। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन अपनी निर्यात आधारित वृद्घि के चरम तक पहुंच चुका है और अब वह आंतरिक खपत पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है वह भी बिना वृद्घि को कम किए। 

इससे रोजगार और सामाजिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा अधिकारविहीन वामपंथी दलों के धड़े भी समाप्त नहीं होंगे। वे गुप्त रूप से काम करेंगे। इतना ही नहीं ऑनलाइन राष्ट्रवाद जो एक व्यापक आबादी से जुड़ा हो वह नेतृत्व को उतनी सहजता नहीं देगा कि वह जातीय अल्पसंख्यकों, क्षेत्रीय विवादों या विदेशी मामलों से जुड़े मुद्दों को सहजता से हल कर सके। चीन से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं। चीन में कारोबार करने वालों को भी अप्रत्याशित हालात के लिए तैयार रहना चाहिए। वहां श्रमिक अशांति से लेकर स्वामित्वहरण और राष्ट्रवादी उभार तक तमाम बातें सामने आ रही हैं। व्यापारिक संघर्ष और अवांछित सैन्य संघर्ष भी देखने को मिल सकते हैं। 
Keyword: चीन, राष्ट्रपति, शी चिनफिंग, राष्ट्रपति पद,
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