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बैंक घोटाले से उपजे संकट में छिपी सुधार की उम्मीद

सोमशेखर सुंदरेशन /  March 11, 2018

बैंकों के दरवाजे पर घोटालों की दस्तक से उपजे संकट का स्वागत किया जाना चाहिए। इन घोटालों में बैंकों में जमा आम जमाकर्ताओं के अरबों करोड़ रुपये और करदाताओं से मिली राशि (सरकार वक्त-वक्त पर इन बैंकों में करदाताओं का पैसा ही तो डालती है) भी शामिल है। फिर भी इस विपदा का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे बैंकिंग प्रणाली में लंबे समय से प्रतीक्षित सुधारों को लागू करने का संकेत मिलता है। 

 

चार साल पहले जब एक सरकार विदा होने वाली थी और नई सरकार कामकाज संभालने वाली थी तो भारतीय रिजर्व बैंक की बनाई पी जे नायक समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। उस समिति ने बैंकिंग क्षेत्र के बेहतर प्रशासन के लिए दीर्घावधि सुधार किए जाने की खास सिफारिश की थी। इन सिफारिशों में बैंकों की बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) पर काबू पाने पर विशेष जोर दिया गया था। (इस लेख का लेखक भी उस समिति का एक सदस्य था।)

उस रिपोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कामकाज में आई गिरावट का जिक्र था। इसके लिए इन बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने वाले पुराने कानून से ही इनके शासित होने को जिम्मेदार बताया गया था। इस कानून के पुराना होने की वजह यह है कि सभी कंपनियों को संचालित करने वाला नया कंपनी कानून बैंकों के राष्ट्रीयकरण के दौर से कई प्रकाश वर्ष आगे बढ़ चुका है। 

रिपोर्ट में इसका भी जिक्र किया गया था कि इन बैंकों के अंशधारक (भारत सरकार) के सघन व्यष्टि प्रबंधन के चलते उनका शासन न केवल निष्प्रभावी बल्कि हानिकारक भी साबित हुआ। बैंकों के निदेशक मंडल को उन मुद्दों पर ध्यान देने का कहा जाता था जो सरकार निर्देशित करती थी और वास्तविक मुद्दों की अनदेखी कर दी जाती थी। निदेशक मंडल की नियुक्ति के तौर-तरीके भी तय होते थे और उसमें पेशेवर चयन की अहमियत को नजरअंदाज किया जाता था। 

रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सरकार क्रमिक रूप से सार्वजनिक बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाते हुए अल्पांश हिस्सेदारी तक ही खुद को सीमित कर ले। एक प्रमुख सुझाव यह था कि सरकार पहले इन सभी सार्वजनिक बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को एक पूर्ण स्वामित्व वाली होल्डिंग कंपनी में स्थानांतरित करे और फिर समय के साथ होल्डिंग कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचते हुए अल्पांश शेयरधारक बन जाए। इस बीच सार्वजनिक बैंकों के निदेशकों एवं शीर्ष प्रबंधकों के चयन के लिए बैंक बोर्ड ब्यूरो के गठन का भी सुझाव दिया गया था। बैंक बोर्ड ब्यूरो भविष्य में गठित होने वाली होल्डिंग कंपनी के निदेशक मंडल का पूर्ववर्ती होगा।

रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर और नए प्रधानमंत्री के बीच हुई पहली बैठक में ही इस रिपोर्ट के सुझावों को लेकर चर्चा की गई थी। इन सुझावों को लेकर गर्माहट भरा माहौल दिखा था। इस वजह से ऐसी अपेक्षाएं पैदा हो गई थीं कि बहुमत से जीतकर आई सरकार आलोचना का विषय बनने वाले कुछ निर्णयों को भी आसानी से झेल सकती है। सरकार और बैंकिंग क्षेत्र के बीच संवाद के लिए 'ज्ञान संगम' आयोजित हुए जिससे सात-सूत्री सुधार कार्यक्रम 'इंद्रधनुष' का जन्म हुआ। 

बैंक बोर्ड ब्यूरो का भी गठन किया गया जिसके प्रमुख पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक विनोद राय बनाए गए। लेकिन इस ब्यूरो की भूमिका उन सुझावों के आसपास भी नहीं तय की गई थी जिसकी कल्पना नायक समिति ने की थी। नायक समिति चाहती थी कि इस ब्यूरो को बैंकिंग प्रणाली के भीतर की तमाम खामियों को दुरुस्त करने का अधिकार मिले।

इसके साथ ही सरकार की तरफ से सार्वजनिक बैंकों में उसकी हिस्सेदारी कम करने के कोई भी संकेत नहीं दिखाई दिए। सरकार इसके उलट दिशा में ही बढ़ती दिखी। इंद्रधनुष योजना के सात बिंदुओं में सार्वजनिक बैंकों में 700 अरब रुपये डालने का भी जिक्र है। वहीं होल्डिंग कंपनी के गठन का कोई संकेत ही नहीं दिखता है। मीडिया रिपोर्टों में सार्वजनिक क्षेत्र के हरेक बैंक के लिए एक होल्डिंग कंपनी का जिक्र आया था जो साफ संकेत है कि कहीं पर कुछ लोग इस विचार को ही खत्म करने में लगे हैं। वैसे नई सरकार से काफी उम्मीदें लगाई गई थीं। 

इसकी एक वजह यह भी थी कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पिछले कार्यकाल में सार्वजनिक बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को 33 फीसदी पर लाने संबंधी एक विधेयक संसद में पेश किया गया था लेकिन वह कानून नहीं बन पाया था। लेकिन राजग की मौजूदा सरकार ने उन सभी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है।

आज के समय एक-के-बाद एक बैंकिंग घोटाले सामने आते जा रहे हैं। दो महीने से भी कम समय में बैंकिंग क्षेत्र के सरकारी स्वामित्व वाले समूह के लिए नया साल भयावह साबित हो चुका है। ऐसे में बैंकिंग क्षेत्र में साहसिक सुधारों को लागू करने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अंशधारक की अपनी भूमिका में व्यष्टि-प्रबंधन के पेचीदा ढांचे में काफी हद तक निष्प्रभावी रही है और अब यह बात सबके सामने भी आ चुकी है। समय-सीमा समाप्त हो चुकी दवा का अधिक सेवन लंबे समय से चली आ रही बीमारी के इलाज में कभी भी कारगर नहीं हो सकती है।

पुराने ढर्रे से अलग हटकर सोचने का वक्त आ चुका है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के संचालन में गंभीर बदलाव लाने का समय आ चुका है। होल्डिंग कंपनी के मॉडल को तत्काल लागू करने की जरूरत है। सरकार को इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम करनी होगी और उसके लिए बैंकों में निजी इक्विटी का फंड डालना होगा। इससे बैंकों को अनुशासित एवं व्यवस्थित बनाया जा सकेगा। सेंचुरियन बैंक में लाए गए आमूलचूल बदलाव को हाल के बैंकिंग इतिहास में एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। हमें यह तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम घोटालों के चलते बैंकिंग प्रणाली में उपजे संकट को गंवाना नहीं होगा। 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं।)
Keyword: बैंक, एनपीए, दिवाला संहिता, आईबीसी,
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