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राजनीतिक वाम खत्म मगर आर्थिक विचार कायम

शेखर गुप्ता /  March 11, 2018

भारतीय वामपंथ के साथ अपनी पहली मुलाकात को याद करूं तो उसकी तुलना क्रिकेट में पहली गेंद पर शून्य पर आउट होने से की जा सकती है। सन 1975 में जब मैं पत्रकारिता का छात्र था, तब मैं एक कॉमरेड के साथ बहस में उलझ गया। बहस इस विषय पर हो रही थी कि ईएमएस नंबूदिरीपाद जिंदा हैं या मृत। मैं शर्त में 10 रुपये हार गया। 

 

बहुत बाद में जब मैं रमेश मेनन के साथ केरल में अपनी पहली स्टोरी कर रहा था तब मेरा सामना पहली बार माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ईएमएस से हुआ। वह खबर वामपंथी सरकार के साक्षरता कार्यक्रम पर थी। मैंने उन्हें उस हारी हुई शर्त के बारे में बताया। इस पर उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाकर कहा, 'आप मेरी नब्ज क्यों नहीं जांचते? हो सकता है आप सही हों और आपको आपका पैसा वापस मिल जाए।' इसके बाद हम सब हंस पड़े। बतौर पत्रकारिता छात्र भी मैं वाम को लेकर इतना अनभिज्ञ इसलिए था क्योंकि पंजाब के छोटे कस्बों के स्कूलों और कॉलेजों में और बाद में हरियाणा में भी बहुत ज्यादा राजनीति नहीं देखने को मिलती थी। वहां कोई यूनियन नहीं थीं और वाम की तो बिल्कुल भी नहीं। 

हालांकि कुछ शिक्षकों को कॉमरेड कहकर पुकारा जाना पसंद था। यानी मुझे भारतीय राजनीति के वाम धड़े के बारे में जानकारी बतौर पत्रकार अपनी नौकरी के दौरान मिली। मैं वाम की कठोर आलोचना करता हुआ परिपक्व हुआ। खासतौर पर उसकी आर्थिक नीतियों की आलोचना तथा उसके सामाजिक-राजनीतिक पाखंड को उजागर करते हुए। आखिर एक ऐसी विचारधारा जो अधिनायकवाद से शक्ति हासिल करती हो वह खुद को लोकतांत्रिक कैसे कह सकती है। इसके अलावा एक ऐसा नेतृत्व जिस पर उच्चवर्ण के भद्रलोक का नियंत्रण हो वह समता और कमजोर वर्ग के हितों की बात कैसे करता रह सकता है।

इन दशकों के दौरान ऐसा कोई मौका नहीं आया जब मैंने खुद को वाम की राजनीति के साथ पाया हो। मुझे उनके बौद्घिक और दार्शनिक दंभ से भी निराशा हुई। मानो अगर आप उनके साथ नहीं हैं तो आप अनैतिक और पूंजीवादियों के तलवे चाटने वाले हैं। बुर्जुआ शब्द तो समय के साथ अस्तित्व में आया उसके बाद नव उदारवाद शब्द सामने आया। वहीं यह भी सच है कि सन 1989-1993 के बीच जब पंजाब में आतंकवाद का तीसरा और अंतिम लेकिन सबसे निर्मम दौर चल रहा था तब इकलौती राजनीतिक शक्ति जिसके लोग राज्य में रुके रहने, काम करने और उग्रवादियों द्वारा आजाद घोषित सीमावर्ती जिलों में अपने प्राण बलिदान करने को तैयार थे, वे वामपंथी दलों के ही थे। पुलिस ने उन्हें हथियार भी दिए थे। एक घटना जो हमने दर्ज की उसमें तो एक युवा महिला कॉमरेड ने अपने घर की रक्षा के लिए छत पर लाइट मशीनगन तैनात कर रखी थी। 

उसके परिवार के कई सदस्य मारे गए थे। पंजाब के उस दौर को छोड़ दिया जाए तो मुझे वाम के बारे में कोई बात उत्साहित नहीं करती। मैं उस समय झुंझला गया था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ए बी वर्धन ने सन 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के अप्रत्याशित रूप से चुनाव हारने पर कहा था कि भाड़ में गया विनिवेश। जब मनमोहन सिंह ने परमाणु समझौते के मुद्दे पर विश्वास मत जीता था तब मुझे प्रसन्नता हुई थी। उस वक्त वाम दलों ने उन लोगों का साथ दिया था जिन्हें वे सांप्रदायिक, जातिवादी और प्रतिक्रियावादी कहते रहे। इनमें भाजपा और मायावती शामिल थे। बाद में जब ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में उन्हें सत्ताच्युत किया तब यह स्पष्टï हो गया था कि भारत में राजनीतिक वाम का किस्सा अब समाप्त है। पूर्व और मध्य भारत में मौजूदा चरमपंथी वाम भी उसी दिशा में बढ़ रहा था।

उनके बारे में एक अच्छी बात मैं यह कहूंगा कि व्यक्तिगत तौर पर भारतीय वाम के नेता कहीं अधिक आसानी से पहुंच वाले, खुले और बड़े दिल के तथा स्नेहिल स्वभाव के हुए। ईएमएस से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत और अब सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ऐसे ही नेता हैं। माणिक सरकार हमारे वक्त के सबसे सहज नेताओं में से हैं। परंतु इन बातों से वाम राजनीति को लेकर मेरा नजरिया नहीं बदलता। ऐसे में आप मुझसे यह आशा नहीं करेंगे कि मैं लेनिन की मूर्ति टूटने का विरोध करूं। मैं इसका विरोध अलग वजह से करता हूं। हर किसी को अपना देवता चुनने का अधिकार है। जबकि उन्हें तोडऩे का अधिकार किसी को नहीं।

सन 1980 के दशक के आखिर में सोवियत संघ का विभाजन हो रहा था। वह अफगानिस्तान में हार चुका था, गोर्बाचॉफ पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त की नीति ले आए थे। तंग श्याओ फिंग चीन की अर्थव्यवस्था को खोल रहे थे। मैं कोलकाता में भारतीय वाम की न बदलने की प्रवृत्ति पर काम कर रहा था। माकपा के तत्कालीन राज्य सचिव सरोज मुखर्जी अपने कार्यालय में लेनिन, स्टालिन और माक्र्स की विशाल तस्वीरों के नीचे बैठे थे। मैंने उनसे पूछा कि गोर्बाचॉफ और तंग बदल रहे हैं तो आप क्यों नहीं बदल रहे? जवाब में उन्होंने पूरे यकीन के साथ कहा कि उनका वामपंथ तंग और गोर्बाचॉफ से अधिक शुद्ध है।

दो वर्ष बाद मैं मॉस्को में था और सोवियत संघ को टूटता देख रहा था। बुखारेस्ट में टैंक अब भी सड़कों पर थे लेकिन उनकी नली में ट्यूलिप के फूल थे। जिस जगह रोमानियन वामपंथी तानाशाह निकोलई चाउसेस्कू को मारा गया था, वहां लोग आते शाप देते और थूकते। इसके कुछ ही सप्ताह पहले भारतीय वाम का एक प्रतिनिधिमंडल रोमानिया के वामपंथी दल की राष्ट्रीय कांग्रेस से लौटा था और उसके कुछ सदस्यों ने लेख लिखकर कहा था कि चाउसेस्कू के अत्याचारों और उनकी लडख़ड़ाती सत्ता की तमाम खबरें पश्चिम का दुष्प्रचार हैं। प्रमाण में उन्होंने कहा कि जब चाउसेस्कू ने कांग्रेस में अपना भाषण समाप्त किया तो घंटों तक तालियां बजती रहीं।

उसी साल आठ महीने बाद मैं दोबारा मॉस्को में था और देख रहा था कि कैसे वामपंथी प्रतीक ढहाए जा रहे थे। बहुत कम लोग इस पर खेद जता रहे थे। साफ था कि अगर विचारधारा खत्म हो गई है तो उसके तानाशाहों के प्रतीक भी समाप्त हो जाने चाहिए। वामपंथ के 34 साल के शासन में पश्चिम बंगाल बरबाद हो गया। उसने लोकतंत्र और उदारवाद की बात की लेकिन विपक्ष को पनपने नहीं दिया। केरल में वाम और कांग्रेस बारी-बारी से सत्ता में आए और कुछ संतुलन कायम रहा। बाकी देश में वाम दल गायब ही हो गए। पंजाब से महाराष्ट्र और बिहार से असम तक। सन 2004 में लोकसभा में उन्हें 59 सीट मिली थीं लेकिन वह मौका भी गंवा दिया। 

तब से उनका पराभव जारी है। परंतु उनकी राजनीतिक शक्ति भले कम होती गई लेकिन देश की आर्थिक नीति पर उनकी छाप बरकरार है। यहां तक कि आज के ध्रुवीकृत माहौल में भाजपा और कांग्रेस समेत सभी दल जिस बात पर सहमत होंगे वह है समाजवादी अर्थव्यवस्था और गरीबों की राजनीति। वाम का पतन हो रहा है। उसके प्रतीक ढहाए जा रहे हैं लेकिन उसकी आर्थिक विचारधारा कायम है। नरेंद्र मोदी उसके नवीतनतम और इंदिरा गांधी के बाद सबसे ताकतवर ध्वज वाहक हैं।
प्राग में जहां वास्लाव हावेल की मखमल क्रांति में वामपंथ विफल हो चुका था वहां मेरा टैक्सी चालक एक बेरोजगार कंप्यूटर इंजीनियर था जो एक परमाणु प्रयोगशाला में काम करता था। 

उससे मेरी बातचीत वामपंथ की विफलता पर केंद्रित थी। उसका सवाल था कि भारत में अभी भी समाजवाद लोकप्रिय क्यों है और अहम राज्यों में वामपंथी जीत कैसे जाते हैं? आखिर में उसने कहा कि हमारा समाजवाद उसके समाजवाद से अलग है। उसके समाजवाद ने जहां राजनीतिक और आर्थिक आजादी छीन ली, वहीं भारत में ऐसा नहीं हुआ। आपातकाल में जब यह आजादी छीनी गई तो हम उसे लड़कर वापस लेने में सफल रहे। उसने कहा कि चूंकि हमने कभी आर्थिक आजादी का स्वाद नहीं चखा इसलिए हमें पता ही नहीं कि हम क्या गंवा चुके हैं। 

उसका कहना सही था। हमारे यहां यह सामाजिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था गहरे जड़ जमा चुकी है। एक दल वाम का एक किला ढहने का जश्न मना रहा है और उस क्रम में उसके कार्यकर्ताओं ने लेनिन की एक मूर्ति तोड़ दी। लेकिन उन्हें नहीं पता कि लेनिन जिनका निधन 1924 में हुआ, उनके अपने देश ने 1990 में उस विचारधारा को विदा कह दिया लेकिन भारत में यह अब भी जिंदा है।
Keyword: वामपंथ, पत्रकारिता, कम्युनिस्ट, पार्टी, महासचिव,
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