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सत्ता के दो केंद्रों की लड़ाई में फंसा पड़ोसी मुल्क श्रीलंका

आदिति फडणीस /  March 09, 2018

श्रीलंका के विपक्षी नेता और 2005-2015 के बीच राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे इन दिनों काफी खुश होंगे। राजपक्षे और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज होने तथा कई मामलों में जेल की सजा सुनाए जाने के बावजूद राजपक्षे की पार्टी ने श्रीलंका में पिछले महीने संपन्न निकाय चुनावों में शानदार जीत दर्ज की है। इस जीत ने राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की अगुआई वाले धड़े को मुश्किल में डाल दिया है। दोनों नेेता अपने साझा दुश्मन पर हमला करने के बजाय आपस में ही उलझ गए हैं और देश में सरकार सही मायने में नदारद हो गई है। 

 

 

विक्रमसिंघे ने 26 फरवरी को कानून  व्यवस्था की स्थिति सुधारने के नाम पर अपने मंत्रियों के विभाग बदल दिए और उसके कुछ दिन बाद ही अल्पसंख्यक मुस्लिमों और सिंहल बौद्धों के बीच धार्मिक हिंसा का नया दौर शुरू हो गया। 'दबाव' में आकर राष्ट्रपति श्रीसेना ने देश में आपातकाल लागू कर दिया जिसके चलते उनके अपने प्रधानमंत्री ही निष्प्रभावी हो गए हैं। राष्ट्रपति के आदेश के बाद अब प्रधानमंत्री से कानून व्यवस्था संभालने का काम भी छिन गया है। 

श्रीलंका में जातीय हिंसा का मौजूदा दौर इसी पृष्ठभूमि में घटित हो रहा है। सिंहल-मुस्लिम दंगों का पहला दौर 1915 में चला था और उसकी मुख्य वजह जमीन पर कब्जा था। बाद में तमिल राष्ट्रवाद का उभार होने से पूर्वी श्रीलंका में तमिलों के बीच रहने वाले मुस्लिम समुदाय ने सिंहल समुदाय का ही साथ देना शुरू कर दिया था। यहां तक कि उन्होंने सिरिमाओ भंडारनायके के 'केवल सिंहली' भाषा वाले कानून का भी साथ दिया।

अलग देश की मांग को लेकर जारी तमिल आंदोलन को कुचलने वाला सैन्य अभियान 2009 में राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते समय ही चला था। इसके अलावा उन्होंने सिंहली बौद्धों की राष्ट्रवादी भावनाओं को पुष्ट करने का काम भी किया। उसी से 'बोदू बाला सेना' (बीबीएस) के गठन का आधार तैयार हुआ। इस समूह में शामिल बौद्ध भिक्षुओं को 'बोदू जन परामुन' भी कहा जाता है। बीबीएस भी राजनीतिक बौद्धï दर्शन की उग्रवादी शाखा के तौर पर सामने आया है। वर्ष 2013 में बीबीएस ने मुस्लिम समुदाय की कुछ परंपराओं-हलाल और महिलाओं के नकाब को लेकर एतराज जताया था। वर्ष 2014 में मुस्लिमों और राष्ट्रवादी सिंहली बौद्धों के बीच अलुतगामा में फिर दंगा हो गया था जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस दंगे के चलते सैकड़ों लोगों को बेघर भी होना पड़ा था। 

उस घटना के बाद करीब आधे दर्जन देशों के राजनयिकों ने परामुन की राजनीति की खुलकर आलोचना की थी। हालांकि 2015 के चुनाव में बीबीएस को 0.18 फीसदी मत ही मिले थे लेकिन राजपक्षे ने विपक्ष में अपनी पैठ बनाए रखने के लिए इस संगठन को बढ़ावा देना जारी रखा है।

मुस्लिम आबादी श्रीलंका की कुल जनसंख्या का महज 10 फीसदी ही है जबकि सिंहली बौद्ध मतावलंबियों की संख्या करीब 75 फीसदी है। इसके बावजूद श्रीलंका की कारोबारी एवं व्यापारिक गतिविधियों में मुसलमानों का पहले से ही दखल रहा है। बीबीएस ने अपने राजनीतिक बयानों में मुस्लिमों की कारोबारी रवायतों की आलोचना जारी रखी है। उसका कहना है कि मुस्लिम समुदाय कारोबार में लालच और कंजूसी दिखाता है और हजार साल के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को भी नजरअंदाज करता है। 

उसने यह भी कहा है कि श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस के नेता एमएचएम अशरफ हरेक राजनीतिक सभा की शुरुआत 'अल्लाहु अकबर' के साथ करते हैं। इन बयानों ने श्रीलंका में नफरत की सियासत के बीज बो दिए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों का भी कहना है कि ऐसी हालत में मालदीव से सटा होने के नाते श्रीलंका में इस्लामी कट्टïरपंथ के प्रसार का डर बना हुआ है।

श्रीसेना सिंहली बौद्ध राष्ट्रवादी समूह के साथ राजपक्षे के इस रिश्ते का खुलासा करना चाहेंगे। लेकिन वह बौद्ध भिक्षुओं के साथ ही खड़े दिखना चाहेंगे ताकि बड़ी आबादी का साथ मिले। विक्रमसिंघे ने तमिलों के वर्चस्व वाले उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में शानदार चुनावी जीत हासिल की हैं। उनके लिए श्रीलंका के ये इलाके चुनावी जीत और हार के बीच फर्क पैदा करते हैं। 

विक्रमसिंघे ने इन मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए हाल ही में गुमशुदा लोगों की जानकारी रखने वाले कार्यालय में कुछ सदस्यों की नियुक्ति की है। करीब तीन दशकों तक चले गृहयुद्ध के बाद सिंहल बौद्ध बहुसंख्यकों और तमिल अल्पसंख्यकों के बीच मेलमिलाप के हिस्से के तौर पर यह कार्यालय गठित किया गया है।

लेकिन इसकी राह में चुनौतियां उनकी अपनी पार्टी के भीतर से ही खड़ी हो रही हैं। पूर्व राष्ट्रपति के बेटे सजीत प्रेमदासा इन विरोधियों में से एक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डी सेनानायके के प्रपौत्र एवं उप विदेश मंत्री वसंत सेनानायके का कहना है कि विक्रमसिंघे पार्टी के युवा सदस्यों की बात नहीं सुनते हैं। बहरहाल राजपक्षे का गुट जोश से भरपूर है। आपातकाल लगाने के राष्ट्रपति श्रीसेना के कदम को इस दावे के तौर पर देखा जा रहा है कि विक्रमसिंघे के नेतृत्व में श्रीलंका का सामाजिक एवं आर्थिक भविष्य डांवाडोल है। 

इसकी पुष्टि के लिए यह गुट पूर्व वित्त मंत्री रवि करुणानायके पर लगे भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी के आरोपों के संदर्भ में विक्रमसिंघे से भी पूछताछ किए जाने की मांग कर रहा है। मौजूदा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अविश्वास की खाई गहरी होने से नए समझौते की संभावना भी कम नजर आ रही है। अधिक संंभावना यही लग रही है कि श्रीसेना आने वाले दिनों में अपने अगले कदम के बारे में विक्रमसिंघे और राजपक्षे दोनों को ही 2020 के चुनाव तक अटकलें लगाने देंगे और उन्हें हमेशा कसौटी पर कसते रहेंगे। इस बीच नौकरशाही ने सत्ता के दोनों केंद्रों के बीच तनातनी होने से उपजे भ्रम को देखते हुए चुप्पी साध ली है। श्रीलंका में हालात कभी भी आसान नहीं होते हैं।
Keyword: श्रीलंका, राष्ट्रपति, महिंदा राजपक्षे, मैत्रीपाल श्रीसेना,
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