बिजनेस स्टैंडर्ड - रिजर्व बैंक में कैसे हो क्षमता निर्माण?
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रिजर्व बैंक में कैसे हो क्षमता निर्माण?

अजय शाह /  March 08, 2018

फंसे हुए कर्ज (एनपीए) के संकट और पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में सामने आए घोटाले के बीच सबकी निगाहें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सुधारों पर टिकी हुई हैं। इस संबंध में मेरा मानना है कि हमें किसी को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहिए। हमें उन नियमों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिनके जरिये आरबीआई का गठन हुआ है। इन नियमों में संशोधन करने की आवश्यकता है। हमें यह याद रखना होगा कि आरबीआई की क्षमता बढ़ाने के लिए सुशासन की प्रक्रिया पर जोर देना होगा और ध्यान केंद्रित करना होगा।

 

बैंक जमाकर्ताओं से यह वादा करते हैं कि उनका पैसा ब्याज समेत लौटाया जाएगा। ऐसे में सूक्ष्म नियमन का उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि बैंक इस वादे पर खरे उतरें। बैंक नियमनों के लेखन और उनके प्रवर्तन के जरिये इसे अंजाम दिया जाता है। पीएनबी संकट और फंसे हुए कर्ज के संकट ने यह दिखाया है कि आरबीआई की निगरानी प्रक्रिया में ढीलापन है। जनता के खरबों रुपये दांव पर लगे हैं और ऐसे में आरबीआई सुधारों की सख्त आवश्यकता है। 

बैंकिंग नियमन की जरूरतों के उदाहरण के लिए एनपीए की समस्या पर बात करते हैं। नियमन इस प्रकार के होने चाहिए कि बैंकों को अपने डिफॉल्ट ऋण के जल्द से जल्द निर्धारण में मदद मिले। इन घाटों को तत्काल आय और व्यय के दस्तावेज में दर्शाना चाहिए। बाद में दिवालिया संहिता के अधीन होने वाली वसूली सीधे इक्विटी पूंजी में जाएगी। इन नियमन के साथ ऐसे कायदे भी होने चाहिए जो इक्विटी पूंजी की पर्याप्तता सुनिश्चित करें। एक बार इन नियमन के लागू होने के बाद हमें अनुपालन के बारे में सोचना होगा। पहला मसला तो यही है कि बैंक पर दबाव बनाया जाना चाहिए कि वह अधिक इक्विटी पूंजी लाए या जमा कम करे। 

इस विषय में झूठ बोलने वाला बैंक कहीं अधिक घातक होता है। अगर कोई बैंक दावा करता है कि उसका कोई फंसा हुआ कर्ज नहीं है जबकि ऐसा कर्ज है तो वह झूठ बोल रहा है। नियामक द्वारा चलाई जाने वाली अंकेक्षण की प्रक्रिया के जरिये बैंक के दावों को परखा जा सकता है। यह दो स्तरों पर कारगर होगा। पहला, नियामक अंकेक्षण की प्रक्रिया के सभी चरणों को देख्ेागा दूसरा नियामक इन दावों पर भरोसा न करते हुए अपने स्तर पर जांच करेगा। उदाहरण के लिए नियामक बैंक के 100 ऋण खातों को नमूने के रूप में इस्तेमाल कर सकता है और आंतरिक मूल्यांकन तथा बाजार मूल्य के बीच की निरंतरता का आकलन कर सकता है। ऐसे में उसे निष्पक्ष प्रतिपुष्टिï हासिल होगी कि बैंक में क्या चल रहा है। यह बैंक के अंकेक्षण से इतर होगा। 

भारत में हम जानते हैं कि नियमन तैयार करना और परीक्षण करना दोनों की अपनी कमियां हैं। आरबीआई की बात करें तो वह एक ऐसा संस्थान हैं जो भ्रष्टाचार से कोसों दूर है। सवाल यह है कि भ्रष्टïाचार के मामले में इतने अक्षुण्ण ईमानदारी वाला संस्थान अपने मूल्य लक्ष्य हासिल करने में इतना पीछे क्यों है? आरबीआई सुधार के मोर्चे पर विचार प्रकिया में खामी है। हमें बलि का बकरा तलाश करने के बजाय आरबीआई सुधार के मोर्चे पर सही सवाल पूछना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी प्रक्रिया हो और ऐसी कौन सी जांच परख हो जिसके तहत आरबीआई अपने नियमन को परिष्कृत करता रह सके और उच्च क्षमता हासिल कर सके। 

शुरुआत करते हैं नियमन के मसौदे से। फिलहाल आरबीआई के कर्मचारियों के पास नियमन को लेकर मनमाने अधिकार हैं। वे इनके लिए विशेषज्ञों या व्यवहार में इसे आजमाने वालों से चर्चा नहीं करते। इसका सीधा असर क्षमता पर पड़ता है और गलत नियमन सामने आते हैं।

नियम लिखने की मजबूत प्रक्रिया क्या हो सकती है? नियमन बनाने का काम बोर्ड को करना चाहिए। जिस समस्या को हल करना है उसे स्पष्टï रूप से व्याख्यायित किया जाना चाहिए और साथ ही यह प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि इस मामले में बाजार विफलता नजर आ रही है। न्यूनतम लागत वाले हस्तक्षेप की डिजाइन तैयार करनी चाहिए और यह दिखाया जाना चाहिए कि प्रस्तावित हस्तक्षेप से समस्या हल हो सकती है। नियमन तैयार किया जाना चाहिए। इन दस्तावेजों को सार्वजनिक चर्चा के लिए पेश किया जाना चाहिए। आने वाले टिप्पणियों के आधार पर इसमें जरूरी बदलाव किया जाना चाहिए। अंतिम बहस के लिए इसे दोबारा बोर्ड के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। नए नियमन को जारी करने का अधिकार केवल बोर्ड को हो। 

इस प्रक्रिया में मस्तिष्क का इस्तेमाल करना जरूरी है। इससे कर्मचारियों पर कड़ी मेहनत करने का दबाव बनेगा। तभी बौद्घिक क्षमता में इजाफा होगा और बेहतर नियमन सामने आएंगे। ऐसा करके हम एक ऐसा आरबीआई बना सकते हैं जो नियम बनाने में चूक न करे। 

कार्यपालिका पर भी यही बात लागू होती है। फिलहाल आरबीआई के पास मनमाने अधिकार हैं जिनके आधार पर वह निगरानी करता है। परंतु यह क्षमता पर्याप्त नहीं है। राज्य क्षमता में विस्तार के लिए औपचारिक प्रक्रिया को व्यवस्थित ढंग से आगे ले जाना होगा। बोर्ड को इस प्रक्रिया का नेतृत्व करना होगा। औपचारिक प्रक्रिया का मैनुअल बनाकर उसे सार्वजनिक बहस के लिए रखना चाहिए। आखिर में बैंक द्वारा उसे अधिकृत करना चाहिए। उदाहरण के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की वेबसाइट निगरानी के बारे में पूरी जानकारी देती है लेकिन आरबीआई की वेबसाइट में ऐसा नहीं होता। जाहिर है संगठन में बदलाव की आवश्यकता है। 

जब भी उल्लंघन के मामले सामने आते हैं तो दंडित करने की बात सामने आती है। फिलहाल इस मामले में भी आरबीआई के अधिकारियों को मनमाने अधिकार हैं। मनमाने अधिकार क्षमता को प्रभावित करते हैं। सेबी के पास बेहतर प्रावधान हैं। आरोपित की सुनवाई निष्पक्ष पक्षकार के सामने होनी चाहिए और वेबसाइट पर एक तार्किक आदेश प्रदर्शित होना चाहिए जिसमें दंड का ब्योरा हो। आरोपित सैट में अपील कर सकता है। इस पूरी प्रक्रिया की जटिलता कार्यपालिका को मजबूर करेगी कि वह उच्च क्षमता विकसित करे। सेबी के साथ भी ऐसा हुआ था और सैट की स्थापना की गई थी। 
आखिर में सवाल ध्यान केंद्रित करने का भी है। आरबीआई की समस्या बेतरतीब आदेश से भी है। सीमित क्षमता के साथ उसे कई लक्ष्यों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें समय और बोर्ड और शीर्ष प्रबंधन का ध्यान रखने की महती आवश्यकता है। अगर ध्यान केंद्रित किया जाए तो राज्य क्षमता में इजाफा होगा। आरबीआई का लक्ष्य दो बातों तक सीमित होना चाहिए: मुद्रास्फीति को लक्षित करना और बैंकिंग को मजबूत बनाना। 

केंद्रीय बैंक को क्षमता संपन्न बनाने के लिए सुशासन की प्रक्रिया को अपनाना होगा। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

फंसे हुए कर्ज (एनपीए) के संकट और पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में सामने आए घोटाले के बीच सबकी निगाहें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सुधारों पर टिकी हुई हैं। इस संबंध में मेरा मानना है कि हमें किसी को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहिए। हमें उन नियमों पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिनके जरिये आरबीआई का गठन हुआ है। इन नियमों में संशोधन करने की आवश्यकता है। हमें यह याद रखना होगा कि आरबीआई की क्षमता बढ़ाने के लिए सुशासन की प्रक्रिया पर जोर देना होगा और ध्यान केंद्रित करना होगा।

बैंक जमाकर्ताओं से यह वादा करते हैं कि उनका पैसा ब्याज समेत लौटाया जाएगा। ऐसे में सूक्ष्म नियमन का उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि बैंक इस वादे पर खरे उतरें। बैंक नियमनों के लेखन और उनके प्रवर्तन के जरिये इसे अंजाम दिया जाता है। पीएनबी संकट और फंसे हुए कर्ज के संकट ने यह दिखाया है कि आरबीआई की निगरानी प्रक्रिया में ढीलापन है। जनता के खरबों रुपये दांव पर लगे हैं और ऐसे में आरबीआई सुधारों की सख्त आवश्यकता है। 

बैंकिंग नियमन की जरूरतों के उदाहरण के लिए एनपीए की समस्या पर बात करते हैं। नियमन इस प्रकार के होने चाहिए कि बैंकों को अपने डिफॉल्ट ऋण के जल्द से जल्द निर्धारण में मदद मिले। इन घाटों को तत्काल आय और व्यय के दस्तावेज में दर्शाना चाहिए। बाद में दिवालिया संहिता के अधीन होने वाली वसूली सीधे इक्विटी पूंजी में जाएगी। इन नियमन के साथ ऐसे कायदे भी होने चाहिए जो इक्विटी पूंजी की पर्याप्तता सुनिश्चित करें। एक बार इन नियमन के लागू होने के बाद हमें अनुपालन के बारे में सोचना होगा। पहला मसला तो यही है कि बैंक पर दबाव बनाया जाना चाहिए कि वह अधिक इक्विटी पूंजी लाए या जमा कम करे। 

इस विषय में झूठ बोलने वाला बैंक कहीं अधिक घातक होता है। अगर कोई बैंक दावा करता है कि उसका कोई फंसा हुआ कर्ज नहीं है जबकि ऐसा कर्ज है तो वह झूठ बोल रहा है। नियामक द्वारा चलाई जाने वाली अंकेक्षण की प्रक्रिया के जरिये बैंक के दावों को परखा जा सकता है। यह दो स्तरों पर कारगर होगा। पहला, नियामक अंकेक्षण की प्रक्रिया के सभी चरणों को देखेगा दूसरा नियामक इन दावों पर भरोसा न करते हुए अपने स्तर पर जांच करेगा। उदाहरण के लिए नियामक बैंक के 100 ऋण खातों को नमूने के रूप में इस्तेमाल कर सकता है और आंतरिक मूल्यांकन तथा बाजार मूल्य के बीच की निरंतरता का आकलन कर सकता है। ऐसे में उसे निष्पक्ष प्रतिपुष्टि हासिल होगी कि बैंक में क्या चल रहा है। यह बैंक के अंकेक्षण से इतर होगा। 

भारत में हम जानते हैं कि नियमन तैयार करना और परीक्षण करना दोनों की अपनी कमियां हैं। आरबीआई की बात करें तो वह एक ऐसा संस्थान हैं जो भ्रष्टाचार से कोसों दूर है। सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में इतने अक्षुण्ण ईमानदारी वाला संस्थान अपने मूल्य लक्ष्य हासिल करने में इतना पीछे क्यों है? आरबीआई सुधार के मोर्चे पर विचार प्रकिया में खामी है। हमें बलि का बकरा तलाश करने के बजाय आरबीआई सुधार के मोर्चे पर सही सवाल पूछना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी प्रक्रिया हो और ऐसी कौन सी जांच परख हो जिसके तहत आरबीआई अपने नियमन को परिष्कृत करता रह सके और उच्च क्षमता हासिल कर सके। 

शुरुआत करते हैं नियमन के मसौदे से। फिलहाल आरबीआई के कर्मचारियों के पास नियमन को लेकर मनमाने अधिकार हैं। वे इनके लिए विशेषज्ञों या व्यवहार में इसे आजमाने वालों से चर्चा नहीं करते। इसका सीधा असर क्षमता पर पड़ता है और गलत नियमन सामने आते हैं।

नियम लिखने की मजबूत प्रक्रिया क्या हो सकती है? नियमन बनाने का काम बोर्ड को करना चाहिए। जिस समस्या को हल करना है उसे स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया जाना चाहिए और साथ ही यह प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि इस मामले में बाजार विफलता नजर आ रही है। न्यूनतम लागत वाले हस्तक्षेप की डिजाइन तैयार करनी चाहिए और यह दिखाया जाना चाहिए कि प्रस्तावित हस्तक्षेप से समस्या हल हो सकती है। नियमन तैयार किया जाना चाहिए। इन दस्तावेजों को सार्वजनिक चर्चा के लिए पेश किया जाना चाहिए। आने वाले टिप्पणियों के आधार पर इसमें जरूरी बदलाव किया जाना चाहिए। अंतिम बहस के लिए इसे दोबारा बोर्ड के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। नए नियमन को जारी करने का अधिकार केवल बोर्ड को हो। 

इस प्रक्रिया में मस्तिष्क का इस्तेमाल करना जरूरी है। इससे कर्मचारियों पर कड़ी मेहनत करने का दबाव बनेगा। तभी बौद्घिक क्षमता में इजाफा होगा और बेहतर नियमन सामने आएंगे। ऐसा करके हम एक ऐसा आरबीआई बना सकते हैं जो नियम बनाने में चूक न करे। 

कार्यपालिका पर भी यही बात लागू होती है। फिलहाल आरबीआई के पास मनमाने अधिकार हैं जिनके आधार पर वह निगरानी करता है। परंतु यह क्षमता पर्याप्त नहीं है। राज्य क्षमता में विस्तार के लिए औपचारिक प्रक्रिया को व्यवस्थित ढंग से आगे ले जाना होगा। बोर्ड को इस प्रक्रिया का नेतृत्व करना होगा। औपचारिक प्रक्रिया का मैनुअल बनाकर उसे सार्वजनिक बहस के लिए रखना चाहिए। आखिर में बैंक द्वारा उसे अधिकृत करना चाहिए। उदाहरण के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की वेबसाइट निगरानी के बारे में पूरी जानकारी देती है लेकिन आरबीआई की वेबसाइट में ऐसा नहीं होता। जाहिर है संगठन में बदलाव की आवश्यकता है। 

जब भी उल्लंघन के मामले सामने आते हैं तो दंडित करने की बात सामने आती है। फिलहाल इस मामले में भी आरबीआई के अधिकारियों को मनमाने अधिकार हैं। मनमाने अधिकार क्षमता को प्रभावित करते हैं। सेबी के पास बेहतर प्रावधान हैं। आरोपित की सुनवाई निष्पक्ष पक्षकार के सामने होनी चाहिए और वेबसाइट पर एक तार्किक आदेश प्रदर्शित होना चाहिए जिसमें दंड का ब्योरा हो। आरोपित सैट में अपील कर सकता है। इस पूरी प्रक्रिया की जटिलता कार्यपालिका को मजबूर करेगी कि वह उच्च क्षमता विकसित करे। सेबी के साथ भी ऐसा हुआ था और सैट की स्थापना की गई थी। 
आखिर में सवाल ध्यान केंद्रित करने का भी है। आरबीआई की समस्या बेतरतीब आदेश से भी है। सीमित क्षमता के साथ उसे कई लक्ष्यों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें समय और बोर्ड और शीर्ष प्रबंधन का ध्यान रखने की महती आवश्यकता है। अगर ध्यान केंद्रित किया जाए तो राज्य क्षमता में इजाफा होगा। आरबीआई का लक्ष्य दो बातों तक सीमित होना चाहिए: मुद्रास्फीति को लक्षित करना और बैंकिंग को मजबूत बनाना।
Keyword: एनपीए, पीएनबी, आरबीआई,
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