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आर्थिक वृद्धि में दिखने लगा सुधार मगर धारणा कमजोर

देवांग्शु दत्ता /  March 07, 2018

मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आंकड़ों से लगता है कि आर्थिक वृद्धि में कुछ हद तक सुधार हुआ है और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन से मची उथलपुथल कम हुई है। ऐसे में वर्ष 2018-19 में आर्थिक वृद्धि बेहतर रहने का अनुमान है। लेकिन कुछ आशंकाएं भी हैं। बैंकिंग प्रणाली गहरे तनाव का सामना कर रही है। राजकोषीय घाटा बढऩे के भी आसार हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने संभवत: ऐसा व्यापार युद्ध छेड़ दिया है जो वैश्विक वृद्धि की संभावनाओं पर गहरी चोट कर सकता है।

 

अक्टूबर-दिसंबर 2017 में जीडीपी की वृद्धि दर 7.2 फीसदी आंकी गई है। यह जुलाई-सितंबर 2016 तिमाही के बाद की सबसे तीव्र वृद्धि दर है। जुलाई-सितंबर 2017 की वृद्धि दर को भी संशोधित कर बढ़ाया गया है। इस तरह चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में जीडीपी वृद्धि दर 6.5 फीसदी रही है। इस तरह पूरे वित्त वर्ष की विकास दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान है। 

पहली आशंका अक्टूबर-दिसंबर 2016 में नोटबंदी के असर के चलते वृद्धि दर के 6.1 फीसदी पर लुढ़कने से उत्पन्न निम्न आधार प्रभाव की है। हालांकि इसके खिलाफ यह दलील दी जा सकती है कि तमाम आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में सुधार को वास्तविक बता रहे हैं। मसलन, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों की वृद्धि दर इस तिमाही में 6.7 फीसदी रही है, कंपनियों के नतीजों से भी बिक्री और मुनाफे में बढ़ोतरी नजर आई है और वाहनों की बिक्री भी बढ़ी है।

दैनिक उपभोग के उत्पाद (एफएमसीजी) क्षेत्र में आया सुधार भी दिखाता है कि निजी उपभोग पटरी पर लौटने लगा है। तीसरी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में 3.7 फीसदी की संतोषजनक तेजी देखी गई है। निर्माण क्षेत्र 6.8 फीसदी की तीव्र वृद्धि दर हासिल करने में सफल रहा है जिससे नया निवेश आने की उम्मीद बढ़ी है। सकल स्थायी पूंजी निर्माण में 12 फीसदी की वृद्धि होना इन संकेतों पर मुहर लगाता है।

इसके उलट भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ब्याज दरों में कमी करने के बजाय बढ़ोतरी के लिए तत्पर दिख रहा है। मुद्रास्फीति बढऩे से आरबीआई ब्याज दर बढ़ाने के लिए मजबूर हो सकता है। अच्छे वृद्धि आंकड़े रिजर्व बैंक को दरें बढ़ाने के लिए बाध्य कर सकते हैं। मॉनसून भी एक अहम अवयव होगा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भी महंगाई बढ़ सकती है।

किसी भी हाल में वाणिज्यिक दरों के अधिक रहने और बॉन्ड प्रतिफलों में मंदी की ही आशंका दिख रही है। ऐसी आशंका है कि राजकोषीय घाटा बढऩे से सरकारी उधारी बढ़ेगी और निजी क्षेत्र की उधारी में कमी आएगी। सेवा क्षेत्र का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) नकारात्मक हो जाना चौथी तिमाही के लिए भी खराब संकेत खराब रह सकता है। विनिर्माण क्षेत्र के पीएमआई में भी धीमी वृद्धि रही है।

घरेलू मुद्दों के अलावा अंतरराष्ट्रीय कारकों से रुपया भी दबाव में नजर आ रहा है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व जल्द ही दरें बढ़ाने का फैसला कर सकता है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) और बैंक ऑफ जापान (बीओजे) भी कुछ दिनों में इस पर अपना रुख साफ कर सकते हैं। अच्छी विकास दर को देखते हुए दोनों ही केंद्रीय बैंक अपने-अपने संख्यात्मक सरलीकरण कार्यक्रम में कटौती करने के बारे में सोच सकते हैं। इसके साथ ही दोनों केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने का विकल्प भी आजमा सकते हैं।
बाजार की आमराय यही है कि ईसीबी और बीओजे व्यापार युद्ध के असर को लेकर स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करेंगे। अमेरिका ने धातु आयात पर संरक्षणवादी शुल्क अवरोध लगाकर वैश्विक बाजार को सकते में डाल दिया है और यूरोपीय देश भी अमेरिकी उत्पादों पर आयात अवरोध लगाकर इसका बदला ले सकते हैं। ऐसा होने पर वैश्विक मुद्रास्फीति सूचकांकों में तेजी और वृद्धि में गिरावट आ सकती है।

भारत में पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) अलावा दूसरे बैंकिंग घोटाले भी अब सामने आ रहे हैं। यह कारोबारी धारणा के लिए खराब बात है। तीसरी तिमाही के खराब बैंक नतीजों और गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) की पहचान संबंधी मानक सख्त किए जाने से एनपीए की हालत और भी खराब होने के आसार हैं।

बैंक पुनर्पूंजीकरण की वास्तविक लागत करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये पहुंचने की संभावना है। दूसरी तरफ कंपनियों के बेहतर नतीजों से बकाया कर्जों के भुगतान की स्थिति सुधर भी सकती है। लेकिन सार्वजनिक बैंक 2018-19 की पहली छमाही में तो बड़े कर्ज देने से परहेज कर सकते हैं।
मौजूदा हालात के राजनीतिक प्रभाव भी देखे जा रहे हैं। आर्थिक अपराध कर विदेश भागने वालों की संपत्ति जब्त करने संबंधी विधेयक बेहद कड़ी प्रतिक्रिया लग रहा है। चिंता की बात यह है कि बाजार की धारणा काफी हद तक खराब बनी हुई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पूरे फरवरी में बिक्री की है और उन्होंने रुपये वाले ऋण बाजार में भी ऐसे सौदे किए हैं। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशक काफी हद तक सकारात्मक हैं। खुदरा निवेशक तो प्रत्यक्ष इक्विटी बाजार में बिकवाल ही बने रहे हैं  लेकिन म्युचुअल फंड में पैसे लगा रहे हैं। 

भाजपा सरकार अगले आम चुनाव में जीत हासिल कर सत्ता में वापसी के लिए लोकलुभावन नीतिगत कदम उठा सकती है और बाजार को यह पसंद नहीं आएगा। हालांकि भाजपा के सत्ता में न लौट पाने की आशंका निवेशकों को कहीं अधिक परेशान करेगी। भाजपा को कारोबारी जगत के लिए अधिक मुफीद माना जाता है। वैसे तकनीकी हालत ठीक नहीं है। शेयर बाजार में बिकवाली का दौर रहने से निफ्टी 10,275-10,350 अंक के स्तर पर जूझ रहा है। अगर निफ्टी उससे भी नीचे आ जाता है तो फिर उसका अगला स्तर 10,100 अंक तक हो सकता है। उससे भी नीचे आने का मतलब बिकवाली का लंबा दौर होने का संकेत होगा।
Keyword: सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी, आर्थिक वृद्धि, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,
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