बिजनेस स्टैंडर्ड - बेहतर जल प्रबंधन से
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, July 22, 2018 06:22 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बेहतर जल प्रबंधन से

अरुणाभ घोष /  March 07, 2018

सिंचाई देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। फिर भी देश के लाखों किसानों को यह सेवा सही ढंग से नहीं मिल पाती। कुल बुआई रकबे के एक तिहाई में ही बेहतर और मध्यम प्रकृति की सिंचाई हो पाती है। वर्ष 2011-12 में सिंचाई कुल संभव क्षमता से 23 फीसदी कम रही। क्या किसान सिंचाई के क्षेत्र में बेहतर सेवाओं की उम्मीद कर सकते हैं? क्या आर्थिक सक्षमता को सामाजिक समानता से सामंजस्य भरा बनाया जा सकता है? 

 

सन 1995 से ही एक्सिलरेटेड इरीगेशन बेनीफिट्स प्रोग्राम ने सिंचाई क्षमता में पूंजी निवेश बढ़ाया। कमजोर रखरखाव और सेवा का अर्थ यह था कि बड़े पैमाने पर सिंचाई क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा था। किसान लगातार भूजल पर निर्भर बने रहे। देश में सिंचाई की कुल जरूरतों का 60 फीसदी अभी भी भूजल से पूरा होता है।

भारत इस वक्त स्थायित्व और समता की जरूरत के संकट का शिकार है। भारत सालाना 251 अरब घन मीटर भूजल का दोहन करता है। जिसमें से अधिकांश का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है। जबकि चीन और अमेरिका में यह 112 अरब घन मीटर ही है। उत्तर भारत, पश्चिमोत्तर भारत और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में सालाना जितना भूजल रिचार्ज नहीं होता, उससे ज्यादा निकाल लिया जाता है। 

परंतु भूजल तक पहुंच में एक कोण समता का भी है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए भूजल सिंचाई का एक तैयार स्रोत है क्योंकि सतह पर बनी नहरों से पानी कभी मिलता है तो कभी नहीं मिलता है। इससे कहीं अधिक बेहतर खेती की पृष्ठïभूमि बनती है। किसान साल में कई फसल बो पाते हैं। नहरों का बुनियादी ढांचा कमजोर होने से उसमें जो लीकेज होता है वह भी भूजल रिचार्ज में मदद करता है। ऐसे में हालांकि नहरों का ढांचा निवेश पर कम प्रतिफल देता है लेकिन किसानों ने भूजल आधारित कृषि व्यवस्था ही अपना रखी है। यह समता संयोगवश है, न कि योजनाबद्घ। 

इस बीच बड़े पैमाने पर सिंचाई की बात करें तो उस क्षेत्र में परिचालन और रखरखाव में कम निवेश समस्या बना हुआ है। इस क्षेत्र में परिचालन और रखरखाव के लिए 1,175 रुपये प्रति हेक्टेयर का स्पष्टï मानक है, जबकि वास्तविक व्यय 5,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक होता है। चाहे जो भी हो लेकिन रखरखाव और परिचालन पूंजीगत व्यय से कदमताल नहीं कर सका है। वर्ष 2010 के मूल्यों के अनुसार देखें तो पूंजीगत व्यय सन 1995-96 के 126 अरब रुपये से बढ़कर 2011-12 में 312 अरब रुपये हो गया था जबकि परिचालन और रखरखाव में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ और यह 110 अरब रुपये से बढ़कर केवल 172 अरब रुपये ही हुआ। 

कुल परिचालन और रखरखाव व्यय में सुधार का व्यय घटकर केवल 2 फीसदी रह गया। जबकि 10वीं योजना के अंत तक अन्य व्यय बढ़कर 73 फीसदी हो गए। कुछ भारतीय राज्यों में किसानों से पानी के लिए कोई शुल्क वसूल नहीं किया जाता। बाकी के राज्यों में से भी अधिकांश ने पिछली बार इनमें संशोधन 2005 के आसपास किया था। जबकि इनमें हर पांच साल में संशोधन करने की अनुशंसा पहले से है। औसतन देखें तो उपभोक्ता शुल्क से परिचालन और रखरखाव पर होने वाले व्यय का बमुश्किल 20 फीसदी ही वापस मिलता है। 

अगर बुनियादी ढांचे का रखरखाव ही खराब ढंग से किया गया हो तो उसका परिणाम भी कमजोर सेवाओं के रूप में ही सामने आता है। इतना ही नहीं इसके चलते कमजोर प्रतिफल और कमतर आय का एक दुष्चक्र बन जाता है और किसान भी अविश्वसनीय सेवाओं के लिए किसी भी तरह का भुगतान करने से बचते हैं। पानी से लाभ कमाने की कोशिश करने के बजाय भारत का सबसे विशाल सिंचाई तंत्र आर्थिक नुकसान का सबब बना हुआ है। 

इस चक्र को बदला जा सकता है। सबसे पहले, किसानों को केंद्र में रखकर सिंचाई सेवा आपूर्ति का आकलन करना होगा। केवल मुख्य नहर से वितरण नहर तक होने वाली जलापूर्ति की किफायत के बारे में विचार करने के बजाय पूरा ध्यान कृषि उत्पादकता का आकलन करने पर ध्यान देना चाहिए। यानी पानी की उपलब्धता के अनुपात में उत्पादन में अधिक से अधिक बढ़ोतरी करने का प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसा करने से किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इस रुख से कम से कम यह पता चलना चाहिए कि खराब व्यवस्था से होने वाले नुकसान से कैसे बचा जा सकता है। साथ ही इससे सतह और भूजल के बेहतर इस्तेमाल कैसे सुनिश्चित हो सकता है यह भी देखना होगा। 

प्रदर्शन के संकेतकों में सिंचाई की पर्याप्तता, विश्वसनीयता और समयबद्घता के साथ समता, आर्थिक उत्पादकता और पर्यावरण निरंतरता का स्थान होना चाहिए। इसके लिए कहीं अधिक सक्रिय प्रबंधन सूचना तंत्र की आवश्यकता है जहां परिसंपत्ति प्रबंधन की योजना के लिए डेटा मौजूद हो, बजाय कि केवल सतह पर बह रही नहरों के। 

दूसरा, परिचालन एवं रखरखाव का निर्धारण आकार, डिजाइन, स्थान, उपयोग के रुझान, तंत्र की उम्र, विनिर्माण गुणवत्ता आदि को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इंजीनियरिंग और विनिर्माण अनुबंधों को परिचालन एवं रखरखाव से पांच साल के लिए जोड़ा जाना चाहिए। इसकी लागत निकालने के लिए किसानों को इस प्रक्रिया में भागीदार बनाना होगा। अगर शुल्क शुरुआत में कम हों तो भी उनके संग्रह की उच्च लागत के साथ अनुबंधित व्यवस्था करने में उनका मूल्यवर्धन होता है। इससे सेवा के बदले भुगतान का माहौल बनता है। प्राप्त राजस्व को सिंचाई व्यवस्था में दोबारा निवेश करना चाहिए, बजाय कि उसे सब्सिडी के रूप में वापस करने के। 

तीसरी बात, संस्थानों का डिजाइन काम करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। सिंचाई व्यवस्था को कौन तैयार करता है, इसका स्वामित्व किसके पास है और इसका नियमन किसके पास है ये सारी बातें मायने रखती हैं। जरूरी नहीं कि एक ही एजेंसी के पास यह सारा कौशल हो। यह निरंतर एक चुनौती बनी रही है। सिंचाई विभागों में इंजीनियरिंग और प्रबंधन के मिलेजुले लोगों की आवश्यकता है। कृषि जल प्रबंधन को भी एकल से विविध गतिविधियों वाला बनाना होगा। 

इसी प्रकार जल उपभोग संगठन जहां किसानों को सशक्त बनाते हैं वहीं वे रातोरात पूरी व्यवस्था के प्रबंधन की दृष्टिï से प्रभावी नहीं हो सकते। उनकी जवाबदेही का दायरा बढ़ाने में जोखिम है। कृषक शिक्षा और पहुंच एक विवादित विषय बना हुआ है। जल प्रबंधन प्राधिकरण का यह अर्थ नहीं कि सरकार पूरी तरह हाथ खींच ले। उसकी भूमिका बरकरार रहेगी। 

खराब जल प्रबंधन और कमजोर प्रतिफल देश की कृषि समस्या के मूल में हो सकते हें। अगर व्यापक सिंचाई तंत्र नहीं बना तो किसान भूजल से भी रहित हो जाएंगे। प्रोत्साहन के आधार पर कहीं अधिक व्यवस्थित रुख अपनाया जा सकता है। इसमें किसानों की आय बढ़ाने, बेहतर सेवा देने वाले सिंचाई अधिकारियों को पुरस्कृत करने और जल उपभोग संघों को प्रभावी अधिकार देना शामिल है।
Keyword: सिंचाई, देश, कृषि, अर्थव्यवस्था,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ट्रांसपोर्टरों का हड़ताल पर जाना है वाजिब?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.