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अवसर का लाभ

संपादकीय /  March 07, 2018

भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को लगातार छठे दिन गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स और निफ्टी वर्ष के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। इसके लिए कुछ हद तक वैश्विक रुझानों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि पश्चिमी दुनिया में कारोबारी जंग का माहौल बना हुआ है। घरेलू बाजार में सबसे बड़ी चिंता बैंकिंग क्षेत्र को लेकर है, खासतौर पर सरकारी बैंक। निफ्टी के सरकारी बैंक सूचकांक बुधवार को 3.57 फीसदी गिरे। आंध्रा बैंक, केनरा बैंक और इलाहाबाद बैंक को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा। बैंकिंग शेयरों की चिंता का बड़ा हिस्सा नीरव मोदी-पंजाब नैशनल बैंक के 127 अरब रुपये के घोटाले से उपजा है। इस बीच आशंका है कि ऐसे तमाम अन्य मामले भी सामने आ सकते हैं।

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इस घोटाले के लिए इससे बुरा वक्त नहीं हो सकता था। भारतीय बैंकिंग जगत, खासतौर पर सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज की समस्या बहुत बड़ी है। भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों की नई चिंता के कारण अब इनके सामने विश्वसनीयता का नया संकट उत्पन्न हो गया है। आर्थिक वृद्घि में फिलहाल सुधार नजर आ रहा है। राष्ट्रीय आय के ताजातरीन आंकड़ों से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में निवेश व्यय में सुधार नजर आ रहा है। यही वक्त है जब निवेशकों को स्वस्थ बैंकों की जरूरत है जो सामने आकर आर्थिक क्षेत्र की वित्तीय गतिविधियों की मदद करें। बहरहाल बैंकिंग क्षेत्र की मौजूदा गड़बड़ी के बीच, खासतौर पर सरकारी क्षेत्र के बैंक जो देश की कुल बैंकिंग में 70 फीसदी के हिस्सेदार हैं, उनके लिए नए ऋण को किफायती ढंग से अंजाम देना मुश्किल है। 

अब वक्त आ गया है कि सरकार इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा में दिए गए मशविरे को सुने। मशविरे में कहा गया है कि बैंकिग क्षेत्र को चार 'आर' का सहारा लेना चाहिए। ये चार आर हैं- रिकग्नीशन यानी पहचान, रीकैपिटलाइजेशन यानी पुनर्पूंजीकरण, रिजॉल्युशन यानी निस्तारण और रिफॉर्म यानी सुधार। बीते चार वर्ष में सरकार और आरबीआई ने इस दिशा में आगे बढऩे का प्रयास किया है। अब फंसे हुए कर्ज की तत्काल पहचान की व्यवस्था कायम की जा चुकी है। सरकार पहले ही सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि मुहैया करा रही है। दिवालिया संहिता के साथ निस्तारण भी अब सुसंगत हो चुका है। बहरहाल, चौथा आर यानी सुधार पर अब तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका है। हालांकि सरकार ने हाल के दिनों में कुछ कदम उठाए हैं। इसमें सरकारी बैंकों से 50 करोड़ रुपये से अधिक के हर फंसे कर्ज की जांच करने और आर्थिक अपराध करके भागने वालों के खिलाफ नया कानून लाने का प्रस्ताव शामिल है। आरबीआई ने धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर एक विशेषज्ञ समिति का भी गठन किया है।

बहरहाल, तथ्य यही है कि बैंकों द्वारा ऋण देने के तरीकों में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। उसके बिना तो बाकी के तीनों आर बेकार ही साबित होंगे। भारत के सरकारी बैंक अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप के शिकार हैं और उनके शासन के मानक कमजोर हैं। निर्णय लेने वाले अपने लक्ष्यों को लेकर भ्रमित हैं क्योंकि बैंकों पर भी सरकार और आरबीआई का दोहरा नियमन है। सुझावों की कहीं कोई कमी नहीं है। 

सन 2014 में आई पी जे नायक समिति ने बताया था कि भारतीय बैंकों के कामकाज में कैसे सुधार लाया जा सकता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि भारत में कमजोर सुधारों को लेकर तगड़ी सहमति है। बैंकिंग क्षेत्र का मौजूदा संकट सरकार को यह अवसर देता है कि वह मौके का फायदा उठाए और सरकारी बैंकों में सुधार की दिशा में आक्रामक ढंग से आगे बढ़े। इसमें अव्यवहार्य बैकों का काम समेटने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने जैसी बातें शामिल हैं।
Keyword: शेयर बाजार, NSE, BSE, सेंसेक्स, निफ्टी,
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