बिजनेस स्टैंडर्ड - फंसे कर्ज की समस्या और बैड बैंक
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फंसे कर्ज की समस्या और बैड बैंक

श्याम पोनप्पा /  March 06, 2018

फंसे हुए कर्ज को लेकर दो धारणाओं को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहले तो बैंकों के बारे में मौजूदा धारणाओं को समझना होगा। उदाहरण के लिए यह धारणा कि फंसे हुए कर्ज के लिए प्राय: बड़े कर्जदार उत्तरदायी हैं। छोटे कर्जदार बहुत कम डिफॉल्ट करते हैं। निजीकरण करने से फंसे हुए कर्ज और धोखाधड़ी को रोकने में मदद मिलेगी वगैरह, वगैरह। दूसरा यह कि फंसे हुए कर्ज के हल सरकार द्वारा धनराशि मुहैया कराने तक सीमित हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि इनकी बदौलत निजात मिल जाएगी। 

 

सबसे पहले इस बिंदु पर चर्चा करते हैं कि बड़े कर्ज ही अधिकांश फंसे हुए कर्ज के लिए जिम्मेदार हैं। कुल 10,14,916 करोड़ रुपये के फंसे हुए कर्ज में से 12 बड़े कर्ज का आकार 2,53,729 करोड़ रुपये है। 100 अन्य देनदारी चूकने वालों पर 25-25 लाख रुपये से अधिक का कर्ज है और वे 74,019.64 करोड़ रुपये के साथ कुल कर्ज में 7.3 फीसदी के हिस्सेदार हैं। 

यह सारी राशि कुल फंसे हुए कर्ज का एक तिहाई है जबकि शेष दो तिहाई हिस्सा छोटे कर्ज से बना है। आवास ऋण के फंसे कर्ज में सबसे बड़ी तादाद 2 लाख रुपये से कम के कर्ज की है। कुल 13,08,900 करोड़ रुपये के कर्ज में 1,36,126 करोड़ रुपये के साथ 10.4 फीसदी का हिस्सेदार है। यह दर बीते पांच साल में बड़े ऋण से दोगुना से अधिक है। न्यूनतम फंसा हुआ कर्ज 25 लाख रुपये से ऊपर की श्रेणी में है जो 0.9 फीसदी है। कुल फंसे हुए कर्ज में आवास ऋण की हिस्सेदारी 13.4 फीसदी है। इसमें शीर्ष 12 कर्जदारों की हिस्सेदारी 25 फीसदी है। ऐसे में यानी इसके लिए हर स्तर पर कर्जदार जिम्मेदार हैं, न कि केवल बड़े डिफॉल्टर। दूसरी बात, अर्थव्यवस्था में फंसे हुए कर्ज की बाबत गत वर्ष की आर्थिक समीक्षा में कहा गया था: तमाम फंसा हुआ कर्ज उच्च वृद्घि के दौर के बाद नकदी की सरल उपलब्धता से भी संबंधित है। कॉर्पोरेट घरानों ने लंबी अवधि की परियोजनाओं में निवेश के लिए डेट का इस्तेमाल किया। इनमें बिजली, खनन और धातु, स्पेक्ट्रम, कोयला नीलामी आदि शामिल रहे। इसमें सरकार का भी प्रोत्साहन रहा। वर्ष 2004-05 से 2007-08 तक निवेश-जीडीपी अनुपात बढ़कर 27 फीसदी से 38 फीसदी हो गया। इस अवधि में बैंक ऋण भी दोगुना हो गया। उसके बाद लागत बढ़ी तथा जमीन और पर्यावरण मंजूरी में कठिनाई सामने आने लगी। आयात मूल्य 2010 से 2014 के बीच 2.4 गुना बढ़ गया। रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले तेजी से घटी और विदेशी ऋण की लागत बढ़ी। घरेलू ऋण की लागत भी ब्याज दर के साथ बढ़ी। 

सन 2013 तक करीब एक तिहाई भारतीय कंपनियों के पास 1 से भी कम ब्याज कवर (ईसी1) था। जबकि बिना ब्याज और कर उनकी सालाना आय ब्याज से कम थी। सन 2015 तक करीब 40 फीसदी इसी स्तर पर थीं। वर्ष 2012 से 2015 के मध्य तक ईसी1 कंपनियों की आय करीब 25,000 करोड़ रुपये प्रति तिमाही रही। सन 2015 के अंत तक आय गिरकर 20,000 करोड़ रुपये रह गई। नकदी की आवक इतनी नहीं थी कि वर्ष 2014 से ऋण का निपटान किया जा सके। इसके चलते कर्ज का स्तर तेजी से बढ़ा। वर्ष 2018 में सितंबर माह तक यह बढ़कर 11.1 फीसदी हो सकता है। 

ज्यादा चिंता की बात यह है कि धोखाधड़ी और अनुचित व्यवहार मसलन स्विफ्ट सिस्टम को अंदरूनी व्यवस्था से जोडऩा और फंसे हुए कर्ज को कम दिखाने जैसी बातों पर नियंत्रण नहीं हो सका है। हमें तंत्र को सही तरीके से डिजाइन करना होगा।

बहरहाल फंसे हुए कर्ज की समस्या को हल की आवश्यकता है। बैंकिंग सुधारों का सबसे बढिय़ा मॉडल स्वीडन ने दिया। यह था निजीकरण और वसूली।

सन 1991-92 के बैंकिंग संकट के बाद स्वीडन का कायापलट जबरदस्त रहा। उसका पुराना अनुभव कुछ हद तक हमसे मेल खाता है। हालांकि इसमें आकार, विकास अवस्था, कौशल, आबादी आदि कारक रहे हैं जो उन्हें एक दूसरे से अलग बनाते हैं। कई सालों तक स्वीडन एक कमजोर प्रदर्शन वाली अर्थव्यवस्था रहा। उसकी वास्तविक वृद्धि दर कम थी जबकि मुद्रास्फीति और ऋण ज्यादा। उसके बाद तेज वृद्धि और ऋण विस्तार के चलते अचल संपत्ति की कीमतों में बेपनाह इजाफा हुआ और अंतत: वे ढह गईं। आवास कीमतों में 25 फीसदी तक की गिरावट आई और वाणिज्यिक अचल संपत्ति की कीमतें सन 1990 से 1995 के बीच 42 फीसदी गिरी। सभी बैंकों (सारे निजी बैंक) फंसा हुआ कर्ज 5 फीसदी से बढ़कर करीब 50 फीसदी हो गया। दिवालिया होने के प्रकरण बढऩे लगे। इस संकट के बीच समूचे राजनीतिक नेतृत्व ने इन समस्याओं के हल के लिए एकजुट होने की ठानी। उन्होंने परदे के पीछे झगडऩे के बावजूद सार्वजनिक रूप से एकजुटता दिखाई।

वहां की मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी सरकार और सोशल डेमोक्रेटिक विपक्ष ने मिलकर संकटग्रस्त बैंकों के सरकारी मालिकाने की वकालत की और बैंक अंशधारकों के अलावा सभी जमाकर्ताओं और कर्जदारों की गारंटी दी। इससे विश्वास बहाल हुआ। एक बैड बैंक (ऐसा बैंक जो दूसरे बैंकों के फंसे हुए कर्ज वाली परिसंपत्ति खरीदता है) की स्थापना की गई और फंसे हुए कर्ज का आकलन किया गया। फंसी परिसंपत्ति के निवारण के लिए एक स्वतंत्र इकाई गठित की गई। स्वीडन का बैंकिंग तंत्र बच गया।
हमारे मामले में उन क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश है जहां दिक्कत नकदी प्रवाह की है। मिसाल के तौर पर उन बिजली परियोजनाओं की तरह जो मांग में कमी अथवा कच्चे माल की लागत में इजाफे की वजह से संकटग्रस्त हो गई थीं। एक विशेषज्ञ समूह द्वारा फंसे हुए कर्ज का निष्पक्ष आकलन आवश्यक है। ताकि यह देखा जा सके कि कहां सुधार की गुंजाइश है। लब्बोलुआब यह है कि भारत इस समस्या से निपटने के लिए सांस्कृतिक और रस्मी तौर पर तैयार नहीं है। फिर भी अगर हम स्वीडन के अनुभव से सीखें तो हमें काफी फायदा हो सकता है। निजी परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियां प्रभावी नहीं साबित हुई हैं।

इस दिशा में पहली जरूरत है राजनीतिक एकता। बिना इसके कुछ नहीं हो पाएगा। एक ऐसी स्वतंत्र संस्था प्रभावी साबित हो सकती है जो राजनीतिक विचारों से कतई प्रभावित न हो। अमेरिका के 2008 के संकट की स्वीडन के अनुभव से तुलना करके देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। अमेरिका में लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी राजस्व मंत्री के 700 अरब डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज पर राजी हो गई थी लेकिन मतदान से ऐन पहले उसने इसकी निंदा कर दी। रिपब्लिकन पार्टी ने अपनी खुद की योजना खारिज कर दी और बाजार में उथलपुथल मच गई। आखिरकार एक सप्ताह बाद विधेयक पारित हुआ और अनुमान से काफी कम लागत पर खराब परिसंपत्तियों का निपटारा हो सका। परंतु इससे सुधार की प्रक्रिया धीमी रही और अलोकप्रिय भी। जापान का अनुभव भी ऐसा ही रहा। क्या भारत के राजनीतिक दल स्वीडन के उदाहरण को अमल में ला पाएंगे?
Keyword: फंसे कर्ज, कर्जदार, डिफॉल्ट,
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