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चिंता की बात

संपादकीय /  March 06, 2018

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस्पात और एल्युमीनियम के आयात पर शुल्क दरों में तीव्र बढ़ोतरी करने का निर्णय किया है। इससे समस्याएं हल होने के बजाय और बढ़ गई हैं। गत गुरुवार को आयोजित एक बैठक में ट्रंप ने कहा कि आयातित इस्पात पर 25 फीसदी और आयातित एल्युमीनियम पर 10 फीसदी शुल्क लगाया जाएगा। वह लंबे समय से यह कहते आ रहे थे कि अमेरिका के कारोबारी साझेदार उसका फायदा उठा रहे हैं, खासतौर पर चीन। परंतु इन कदमों के पीछे कोई ठोस नीति नहीं है। कई अन्य देशों की तरह अमेरिका की घरेलू खपत में भी चीन में बना इस्पात बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं होता। बल्कि इस कदम से ज्यादा नुकसान अमेरिका के अन्य साझेदारों मसलन जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ को होगा। वहीं एल्युमीनियम की शुल्क दरों में इजाफे से कनाडा को सबसे अधिक नुकसान होगा।

 

ट्रंप अमेरिका के औद्योगिक क्षेत्र में नई जान फूंकना चाहते हैं जिसे समझा जा सकता है। उनकी धारणा है कि वैश्वीकरण दुनिया के कई इलाकों में नाकाम साबित हो चुका है। फिर भी यह बात ध्यान देने लायक है कि शुल्क में इस बढ़ोतरी से न केवल अमेरिका के साझेदारों और कारोबारी सहयोगियों को नुकसान होगा बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी इसके नुकसानदेह प्रभाव से बच नहीं पाएगी। द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने हाल ही में एनईआरए इकनॉमिक कंसल्टिंग के अध्ययन की एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसके मुताबिक एल्युमीनियम के आयात शुल्क में इजाफा किए जाने से इस क्षेत्र में घरेलू रोजगार और उत्पादन में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है। परंतु एल्युमीनियम की बढ़ी हुई कीमतों के प्रभाव के चलते कई अन्य क्षेत्रों के रोजगारों में कई गुना गिरावट आ जाएगी। इसके अलावा इससे होने वाला आर्थिक नुकसान धातु परिशोधन क्षेत्र के वास्तविक उत्पादन को भी प्रभावित करेगा। संरक्षणवाद के साथ यह समस्या है कि वह चाहे जितनी अहम समस्याओं को हल करे लेकिन आखिर में इसका खमियाजा घरेलू अर्थव्यवस्था को ही उठाना पड़ता है।

भारत समेत शेष विश्व के लिए भी यह चिंता की बात है। ट्रंप ने शुल्क में इजाफे पर जो जोर दिया है वह दरअसल अमेरिका के साथ कारोबारी शर्तों की कड़ाई का पहला चरण है। यह चौंकाने वाला तो नहीं है लेकिन समस्या पैदा करने वाला अवश्य है। विश्व व्यापार की समस्या का संबंध चीन से भी है। चीन अपने उन वादों पर खरा नहीं उतरा है जो उसने इस सहस्राब्दी के आरंभ में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के दायरे में आते समय किए थे। उसने कहा था कि वह अपने घरेलू बाजार को उदार बनाएगा तथा नियामकीय और मेहनताने के मानकों में सुधार करेगा। शेष विश्व के साथ चीन का व्यापार अधिशेष आर्थिक और राजनीतिक रूप से उतना ही अस्थिर है जितना कि अमेरिका विश्व व्यापार घाटा। ट्रंप ने जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और भारत जैसे देशों के साथ व्यापार युद्ध की शुरुआत कर दी है। भारत से वह इसलिए चिढ़े हुए हैं क्योंकि उसने मोटरसाइकिल पर आयातित शुल्क में उनकी इच्छा के मुताबिक कमी नहीं की है। 

अमेरिका ने चीन को अधिक जवाबदेही भरे कारोबारी मानकों के लिए प्रेरित करने के विभिन्न प्रयासों को नुकसान पहुंचाया है। भारत सरकार के लिए यह संरक्षणवाद की ही याद दिलाने वाली बात है। भारत हाल के महीनों में खुद संरक्षणवाद अपनाता नजर आया है जबकि यह कभी उपयोगी कारोबारी उपाय साबित नहीं हुआ। अगर विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती जैसे कि उसे करना चाहिए तो डब्ल्यूटीओ ही एक जगह है जहां इसे दुरुस्त किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो विनाशकारी कारोबारी लड़ाइयां ही हमारी हकीकत बन जाएंगी।
Keyword: अमेरिका, राष्ट्रपति, डॉनल्ड ट्रंप, आयात,
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