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पैसे देकर ऑनलाइन सामग्री देखने को तैयार भारतीय दर्शक!

वनिता कोहली-खांडेकर /  March 05, 2018

जब भी कोई ऑनलाइन सामग्री देखने-पढऩे के एवज में भुगतान की बात करता है तो यही सवाल उठता है कि क्या भारत के लोग कभी इसके लिए पैसे देने को तैयार होंगे? आम तौर पर इसका जवाब यही होता है कि भारतीय कंटेंट के लिए कभी भुगतान नहीं करेंगे।
हालांकि यह धारणा सच नहीं है। वर्ष 2016 में भारत के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग का कुल राजस्व करीब 1,262 अरब रुपये रहा था और उसका आधा हिस्सा उपभोक्ताओं के भुगतान से ही आया था। असल में जब से मास मीडिया का प्रसार हुआ है, तभी से भारतीय उपभोक्ता खबर-मनोरंजन देखने, सुनने और पढऩे के लिए भुगतान करते रहे हैं। ऐसे में यह माना जा सकता है कि भारतीय उपभोक्ता ऑनलाइन सामग्री के लिए भी भुगतान करेंगे।
जरा इसके बारे में सोचिए। जब से समाचारपत्र वजूद में आए हैं, हम तभी से उन्हें पढऩे के लिए मामूली ही सही लेकिन भुगतान कर रहे हैं। डीबी कॉर्पोरेशन के जुटाए आंकड़ों के मुताबिक समय बीतने के साथ लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्रों का मासिक मूल्य बढ़ा है। मलयाला मनोरमा जैसे भाषाई समाचारपत्र का एक महीने का ग्राहक शुल्क 2016 में 196 रुपये हो गया जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया (दिल्ली) का मासिक ग्राहक शुल्क 153 रुपये ही था। 
मुंबई में मासिक शुल्क देकर केबल टीवी का प्रसारण 1980 के दशक के आखिर में ही शुरू हो गया था। भारत में केबल प्रसारण के वे शुरुआती दिन थे और ऑपरेटर एक निर्धारित शुल्क लेकर दिन भर फिल्में दिखाते रहते थे। जब ऑपरेटरों ने सैटेलाइट चैनल दिखाने की पेशकश रखनी शुरू की तब भी लोगों ने उन्हें भुगतान करना जारी रखा। इतने साल बाद भी लोग किसी डीटीएच ऑपरेटर को हर महीने 217 रुपये का औसत भुगतान कर रहे हैं या फिर केबल ऑपरेटर को 224 रुपये का मासिक शुल्क दे रहे हैं। भले ही पिछले कुछ वर्षों में ग्राहक से प्राप्त राजस्व की मात्रा नहीं बढ़ी है लेकिन वह बरकरार जरूर है।
फिल्में भी तो हैं। आप किसी भी अच्छे मल्टीप्लेक्स हॉल में एक फिल्म देखने के लिए औसतन 181 रुपये का टिकट खरीदते हैं जबकि सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघर में इसी टिकट का मूल्य 50 से 100 रुपये तक होता है।
मोटे तौर पर प्रिंट उद्योग का 36 फीसदी राजस्व, टेलीविजन उद्योग का 66 फीसदी राजस्व और फिल्म उद्योग का 69 फीसदी राजस्व दर्शकों-पाठकों के भुगतान से ही आता है। सवाल है कि इतना होने पर भी ऐसी धारणा क्यों बनी हुई है कि भारतीय उपभोक्ता ऑनलाइन सामग्री के लिए भुगतान नहीं करना चाहेंगे? इसका जवाब यह है कि इंटरनेट पर तो सब कुछ मुफ्त में उपलब्ध है। फिर भला पैसे देकर कोई क्यों कुछ पढऩा चाहेगा?
सच है कि इंटरनेट पर तमाम खबरें, जानकारियां और मनोरंजन सामग्री मुफ्त में उपलब्ध हैं। ऐसा होने की वजह यह है कि अब इंटरनेट को हॉटस्टार और वूट जैसी मूल कंपनियों या निजी इक्विटी फंडिंग के जरिये रियायती बनाया जा रहा है। यह तथ्य भारत में 30 से भी अधिक मनोरंजक वीडियो ऐप की मौजूदगी को बयां करने के लिए काफी है। 
यह अलग बात है कि कारोबार का बुनियादी सिद्धांत तो ऑनलाइन सामग्री के लिए भी वही है जो प्रिंट या टीवी मीडिया के लिए हुआ करता है। ज़ी5, व्यू या फास्टफिल्म्ज वही कर रहे हैं जो ऑफलाइन कंटेंट ब्रांड करते हैं यानी दर्शकों को एक साथ जोडऩा और फिर विज्ञापनदाताओं को दर्शक आधार बेचना या ग्राहक शुल्क वसूल करना। समूचा मीडिया बाजार विज्ञापन से मिलने वाले राजस्व से ही संचालित नहीं हो सकता है लिहाजा दर्शकों से मिलने वाला भुगतान ही कारगर तरीका है।
केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि इस राजस्व का आकार कितना होगा? कुछ अनुमान ऐसे हैं। आप कह सकते हैं कि भारत के कुल 32.5 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 10 फीसदी लोग हर महीने ऑनलाइन सामग्री देखने के लिए 100 रुपये प्रति ग्राहक के हिसाब से करीब 39 अरब रुपये का भुगतान करेंगे। अगर 30 फीसदी इंटरनेट उपभोक्ता ऑनलाइन सामग्री के लिए भुगतान करेंगे तो यह राजस्व करीब 117 अरब रुपये हो जाएगा। बहरहाल यह महज अनुमान ही है। 
फिक्की-केपीएमजी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में डिजिटल विज्ञापन का आकार 77 अरब रुपये रहा था जिसमें से 25 अरब रुपये ऑनलाइन वीडियो सामग्री को मिले। इसमें से 2.5 अरब रुपये ग्राहक शुल्क के तौर पर ऑनलाइन वीडियो समूह को मिले थे।
ऑनलाइन कंटेंट के कारोबारी भविष्य का संकेत इस क्षेत्र में लगी कंपनियां ही दे रही हैं। मैंने 14 ऑनलाइन वीडियो ब्रांड को एक साथ रखकर जो आंकड़े जुटाए हैं, उनमें से 10 ब्रांड या तो भुगतान आधारित हैं या फिर वे हाइब्रिड मॉडल का पालन करते हैं। हाइब्रिड मॉडल में कंटेंट देखने के लिए कुछ हिस्सा मुफ्त होता है जबकि कुछ हिस्से के लिए भुगतान करना होता है। इस तरह ऑनलाइन कंटेंट राजस्व के मामले में भुगतान देने की प्रवृत्ति पहले से ही स्थापित की जा रही है। नेटफ्लिक्स जैसा डिजिटल प्लेटफॉर्म दुनिया के कुछ बेहतरीन शो दिखा पाने में इसलिए सफल हो जाता है कि वह हरेक उपभोक्ता से मासिक शुल्क के तौर पर आठ और 10 डॉलर वसूलता है। आखिर बढिय़ा विषय और उम्दा प्रस्तुति देने में बड़ी लागत भी आती है।
भारत में भुगतान आधारित ऑनलाइन कंटेंट पेश करने में बड़ी चुनौती यह नहीं है कि लोगों को जेब से पैसे निकालने के लिए मजबूर किया जाए। जरूरत इस बात की है कि उन्हें भुगतान की सरल एवं सुविधाजनक प्रणाली मुहैया कराई जाए। कुछ कंपनियों ने तो स्क्रैच कार्ड और एकमुश्त ग्राहक शुल्क लेने जैसे तरीके अपनाने शुरू किए हैं। इसे एक अच्छी शुरुआत कहा जाएगा।
Keyword: ऑनलाइन सामग्री, कंटेंट,
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