बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक दृष्टि से सही नहीं होते संरक्षणवादी कदम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 24, 2018 08:37 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

आर्थिक दृष्टि से सही नहीं होते संरक्षणवादी कदम

मिहिर शर्मा /  March 04, 2018

सन 2014 में जब नरेंद्र मोदी ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री बने थे तब कई लोगों ने कहा था कि वह आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को आगे ले जाएंगे। वे लोग खासतौर पर उत्साहित थे जो वर्षों से राजनीतिक माहौल में ढांचागत बदलाव की बात कह रहे थे क्योंकि किसी भी तरह की प्रगति मुश्किल हो गई थी। दुखद यह है कि मोदी ने जो कदम उठाए हैं वे सुधारवादियों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। उनकी सरकार की सबसे बड़ी नीतिगत पहल नोटबंदी थी। इसे शायद ही कोई आर्थिक सुधारों के एजेंडे का हिस्सा माने। अब ताजा बजट के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था एक बंद अर्थव्यवस्था में बदलती दिख रही है। बजट पर नजर रखने वालों ने भाषण के उस हिस्से पर ध्यान नहीं दिया जिसमें क्षेत्रवार टैरिफ या आयात शुल्क की बात कही गई है। हालिया बजट में 45 विभिन्न उत्पादों का शुल्क बढ़ाया गया है। कुछ के शुल्क में तो 40 फीसदी तक का इजाफा किया गया है। समेकित आयात शुल्क पर 10 फीसदी अधिशेष भी लगाया गया है।
इन बढ़ोतरी के पीछे की वजह है देसी विनिर्माण को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करना। पतंग, घड़ी, वाहन कलपुर्जे और स्मार्ट फोन आदि के क्षेत्र में वित्त मंत्रालय की दलील है कि भारतीय उद्योगों को बचे रहने के लिए शुल्क संबंधी बचाव की जरूरत है। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ नौकरशाह की मानें तो प्रतिकारी शुल्क के जीएसटी में शामिल हो जाने के कारण सीमा शुल्क पर उपकर लगाना जरूरी हो गया था ताकि केंद्र सरकार का राजस्व बचाया जा सके। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह सरकार आर्थिक नीति को लेकर किस हद तक अदूरदर्शी है।
यह जरूरी आर्थिक सिद्धांतों से पीछे हटने वाली बात है। सन 1991 के ऐतिहासिक बजट भाषण में अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारतीय उद्योग जगत को विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए धीरे-धीरे सामने किया जाएगा क्योंकि हमारे उद्यमी किसी से कम नहीं हैं। इसी धारणा के तहत विदेश व्यापार का उदारीकरण किया गया और बाद की सरकारों और वित्त मंत्रियों ने भी इसे अपनाया। मोदी और अरुण जेटली के अधीन यह प्रक्रिया उलट गई है। ऐसा लग रहा है मानो सन 1970 और 1980 के दशक के सबक भुला दिए गए हैं। उद्योग संरक्षण, औद्योगिक नीति आदि उस समय ठीक लगते हैं जब उनका उद्देश्य बाजार की विफलताओं से उबारना हो। तब उनके पक्ष में दलील दी जा सकती है लेकिन प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए उनका इस्तेमाल करना ठीक नहीं। कुछ लोगों का कहना है कि भारत का संरक्षणवाद स्वीकार्य है क्योंकि अन्य देशों ने भी टैरिफ बैरियर बढ़ाना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि इससे रोजगार बढ़ेगा। ऐसे में यह याद करना उचित होगा कि आखिर क्यों ऐसा संरक्षणवाद विफल होगा।
पहली बात तो यह कि उच्च टैरिफ से देश में मूल्यवर्धन नहीं होगा। संरक्षणवाद अपनाने से मनमानापन बढ़ेगा और घरेलू उद्योग कम मूल्य वाली उत्पाद शृंखला तैयार करेंगे क्योंकि कोई प्रतियोगिता नहीं होगी। उच्च मूल्य शृंखला अभी भी विदेशों में ही बरकरार रहेगी।
दूसरी बात, आयात संरक्षण से उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचता है। उन्हें विश्वस्तरीय वस्तुओं के लिए उन्हें कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ती है बल्कि देश में बनी कम गुणवत्ता वाली वस्तुओं की कीमत भी बढ़ जाती है क्योंकि वे अधिक मुनाफा कमाने का प्रयास करते हैं।
तीसरा, इसका निर्यात पर बुरा असर पड़ता है। भले ही यह प्रथम दृष्टया नजर नहीं आए लेकिन सन 1936 में अब्बा लर्नर द्वारा स्पष्ट किए जाने के बाद से ही अर्थशास्त्री इसे भलीभांति समझते हैं। उन्होंने दिखाया कि कैसे उच्च शुल्क से आयात घरेलू चीजों की तुलना में महंगा हो जाता है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि निर्यात में फायदा नहीं रह जाता। इससे निर्यात हतोत्साहित होता है। उच्च मूल्य से लागत भी बढ़ जाती है और निर्यात पहले की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो जाता है। ये शुल्क विनिमय दर पर दबाव डालते हैं। अधिमूल्यित रुपया निर्यातकों को और अधिक प्रभावित करेगा। संरक्षित अर्थव्यवस्था वाले देशों के कई अध्ययन बताते हैं कि किसी भी आयात संरक्षण का आधा हिस्सा निर्यात पर प्रत्यक्ष कर के समतुल्य नजर आता है। 
चौथी बात, आयात संरक्षण कामगारों को भी नुकसान पहुंचाता है। यह दलील एकदम सटीक है अगर आयात पूंजी आधारित हो। उस मामले में उच्च टैरिफ श्रम मेहनताने के प्रतिफल को प्रभावित करता है। आयात में इजाफे से वास्तविक मेहनताना बढ़ता है जबकि टैरिफ में इजाफे से उस पर नकारात्मक असर पड़ता है। 
पांचवीं बात, उच्च टैरिफ से देश का वैश्विक आपूर्ति शृंखला के साथ एकीकरण प्रभावित होता है क्योंकि वह व्यवस्था विकेंद्रित और बहुराष्टï्रीय है। उच्च टैरिफ वाला देश इस मूल्य शृंखला का हिस्सा कम ही बन पाता है। अगर भारत ऐसा नहीं करता है तो उसे एक आधुनिक मध्य वर्ग विकसित करना होगा जो पूरी तरह घरेलू मांग से जुड़ा हो। यह संभव नहीं है। 
छठा, कुछ खास क्षेत्रों को उच्च संरक्षण देने से ऐसा माहौल तैयार होता है जहां बहुत अहम संसाधन उत्पादक गतिविधियों से दूर हो जाते हैं और वे किसी खास क्षेत्र के लिए अतिरिक्त संरक्षण की लॉबीइंग में लग जाते हैं। यही वजह है कि अस्थायी संरक्षण कभी अस्थायी नहीं रहते। गैर प्रतिस्पर्धी घरेलू उत्पादकों की लॉबी बन जाती है जो लगातार यह मांग कर सकती है कि संरक्षण खत्म करने से उनके रोजगार और उत्पादन पर असर होगा। 
संरक्षणवाद की हिमायत करने वाले लोग अपने कदमों के आर्थिक असर को शायद ठीक तरह से नहीं समझते। जिन लोगों को सन 2014 के पहले लग रहा था कि वह सुधारवादी नेता साबित होंगे और मनमोहन सिंह को इस मोर्चे पर पीछे छोड़ देंगे उनको अब आत्मावलोकन करना चाहिए कि वे गलत क्यों साबित हुए?
Keyword: प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पोर्टफोलियो प्रबंधकों के लिए बने सख्त नियम?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.