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समस्या का हल

टी. एन. नाइनन /  March 04, 2018

आर्थिक वृद्धि दोबारा 7 फीसदी का स्तर पार कर चुकी है। इस बीच यह अटकल लगाई जा सकती है कि क्या सुधार की प्रक्रिया अब थम गई है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने हालांकि दो अंकों की वृद्धि के वादे के साथ शुरुआत की थी लेकिन लगातार चार तिमाहियों के कमजोर प्रदर्शन के बाद उसने इस बात से राहत की सांस ली होगी कि आखिर 7 फीसदी की वृद्धि दर दोबारा हासिल हुई। हालांकि इन संकट भरी तिमाहियों में बीते सालों की तुलना में कहीं अधिक अहम जमीनी सुधार देखने को मिले हैं जबकि उस समय सरकार की राह अपेक्षाकृत आसान थी। देश में नई दिवालिया संहिता लागू हुई, वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था चलन में आई, बैंकों का बड़े पैमाने पर पुनर्पूंजीकरण हुआ और कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण समाप्त हुआ। परंतु जैसे जैसे संकट की भावना समाप्त हो रही है और अगले लोकसभा चुनावों की ओर ध्यान जा रहा है तो यह सवाल समझा जा सकता है कि क्या यह सुधार की भावना धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगी? खासतौर पर यह देखते हुए कि हालिया उपाय सुधार के एकदम विपरीत नजर आ रहे हैं।
बैंकिंग एक ऐसा क्षेत्र है जहां अभी भी संकट की छाप दिखाई देती है लेकिन दुख की बात है कि सरकार ने बैंकों के निजीकरण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इसके बजाय सरकार बैंकों की होल्डिंग कंपनी पर विचार करती नजर आ रही है। अगर यह बैंक्स बोर्ड ब्यूरो के काम के औपचारिक स्वरूप की तरह ही हुआ तो लगता नहीं कि यह कोई हल होगा। सरकार अगर कोई उदाहरण प्रस्तुत करना चाहती है तो उसके लिए अधिक प्रत्यक्ष सुधार यही होगा कि वह यह घोषणा कर दे कि अधिक संकटग्रस्त बैंकों की बोली लगाई जाएगी। अगर इसे व्यापक नीतिगत बदलाव के बजाय एक अपवाद की तरह प्रस्तुत किया जाए तो शायद इसे कम राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़े। अगर बैंक नए मालिकान के अधीन बेहतर प्रदर्शन करता है तो इस अवधारणा को बल मिलेगा। साथ ही कुछ और बैंकों के निजीकरण की राह भी आसान हो जाएगी।
अभी जैसे हालात हैं उस हिसाब से इन बैंकों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि ये अधिक कड़े परिचालन मानकों के अधीन काम कर सकें। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि बैंकों की खराब ऋण संस्कृति में बदलाव लाया जाए। भारतीय रिजर्व बैंक ने गत माह एक नए ढांचे की घोषणा करके बेहतर किया जिसके तहत प्रयासों को परिसंपत्ति वर्गीकरण से इतर कर्जदारों की व्यवहार्यता के निर्धारण की ओर स्थानांतरित किया जाए। इसके लिए नए दिवालिया कानून को कहीं अधिक व्यापक ऋण खातों पर लागू किया जाएगा।
यह बीते चार सालों का सबसे बेहतरीन दौर हो सकता है। शुरुआती दो साल का समय प्रगतिशील ढंग से संहिता के दायरे के विस्तार का होगा। शुरुआत 30 अरब रुपये से अधिक के खातों से होगी और उसके बाद 20 अरब रुपये की श्रेणी आएगी और उसके पश्चात चरणबद्ध ढंग से सभी ऋण खातों का नंबर आएगा जो 1 अरब रुपये तक होंगे। इसके बाद बैंक प्रबंधन को छह माह की अवधि दी जाएगी ताकि वह फंसे कर्ज वाले खातों का निपटान कर सके। इसमें विफल रहने पर नौ महीने का समय इसलिए ताकि नीलामी प्रक्रिया की मदद से कंपनी को नए मालिकों को सौंपा जा सके या बंद किया जा सके। 
इसका मतलब यह हुआ कि जो प्रक्रिया 2015 में बैंकों को फंसे कर्ज के बारे में पारदर्शी बनाने से शुरू हुई थी और जिसके तहत दिवालिया कानून का गठन हुआ था, उसे अंतिम अंजाम तक पहुंचाने में 6 से 7 वर्ष का समय और लगेगा। अगर प्रक्रिया सही रहती है तो नई समस्याओं से तत्काल निपटा जा सकेगा और भविष्य में ऐसी समस्याओं से बचा जा सकेगा। अपेक्षा की जानी चाहिए कि तब विभिन्न कारोबारी आसानी से धन लूट कर विदेशों में नहीं जा छिपेंगे।
यह पूरी प्रक्रिया सरकार को काफी महंगी पड़ेगी। इसका सीधा संबंध करदाताओं से है। आने वाले दिनों में सरकार को सरकारी बैंकों में और अधिक पूंजी डालनी पड़ सकती है। अगर एक प्रगतिशील निजीकरण नीति आती है तो विधेयक से बचा भी जा सकता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो भी सरकार को निजी-सार्वजनिक भागीदारी पर विचार करना होगा जो अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर साबित हो सकता है। एक ऐसी बैंकिंग व्यवस्था जिसमें 70 फीसदी भागीदारी सरकारी बैंकों की हो, उसे आदर्श ढांचा नहीं माना जा सकता। खासतौर पर तब जबकि सरकारी संस्कृति हस्तक्षेप करने वाली हो।
Keyword: आर्थिक वृद्धि, नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार,
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