बिजनेस स्टैंडर्ड - पीएनबी का साया और सरकारी बैंकों की काया
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पीएनबी का साया और सरकारी बैंकों की काया

आकाश प्रकाश /  March 01, 2018

बाजारों का संदेश साफ है। अगर सरकार विश्वसनीय नेतृत्व और ढांचागत मजबूती लाती है तो वे सहयोग करेंगे। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
नीरव मोदी ने पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के साथ जबरदस्त धोखाधड़ी की है और उससे इस बैंक और सरकारी बैंकों की प्रतिष्ठïा को भयंकर क्षति पहुंची है। इन दिनों हर तरफ इस बात की चर्चा है। अभी हमारे पास पूरी जानकारी नहीं है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यह धोखाधड़ी 11,000 करोड़ रुपये से 20,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है। ऐसा लगता है कि पूरी व्यवस्था चरमरा गई है और किसी का कोई नियंत्रण नहीं बचा है। आखिर यह सिलसिला इतने लंबे समय तक कैसे चलता रहा? अंकेक्षक क्या कर रहे थे? भारतीय रिजर्व बैंक और इन बैंकों का प्रबंधन क्या कर रहा था? शायद हमें सच कभी पता न चले लेकिन इससे देश की बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरियां और खामियां सामने आ गई हैं। पूरे प्रकरण ने मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। माना जा सकता है कि इससे बदलाव के लिए जरूरी दबाव बनेगा। इस दिशा में जरूरी कदम उठाने की दो वजह हैं।
 
पहली बात, इस दलील का कोई तुक नहीं बनता कि हम कमजोर सरकारी बैंकों की अनदेखी कर सकते हैं जो कि समय के साथ स्वयं नष्ट हो जाएंगे और हम देश की वृद्धि के लिए बॉन्ड बाजार, एनबीएफसी और निजी बैंकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। हमें सरकारी बैंकों को कारगर बनाए रखना होगा। हम उनके यूं समाप्त होने की कामना नहीं कर सकते। मुद्रास्फीति में इजाफे और नकदी की कमी के व्यापक अर्थव्यवस्था पर दबाव के शुरुआती संकेत मिलते ही बॉन्ड बाजार सहम गया है। प्रतिफल में 150 आधार अंकों की बढ़ोतरी हो चुकी है और बाजार अस्थायी तौर पर भंगुर नजर आ रहे हैं। सरकारी बैंकों में सांविधिक तरलता अनुपात ज्यादा है और वृद्धि दर में धीमापन आ रहा है जबकि नकदी का प्रचलन बढ़ रहा है। ये बैंक अब और बॉन्ड नहीं खरीदना चाहते। म्युचुअल फंड घाटे की जद में हैं और अब वे निश्चित आय वाली योजनाओं में होने वाली धन की आवक के बजाय निकासी को लेकर चिंतित हैं। रुपये को लेकर जोखिम बढ़ा है। यहां तक कि विदेशी कारोबारी भी भारतीय बॉन्ड की खरीद में हिचकिचा रहे हैं। लब्बोलुआब यह कि कोई खरीदार नहीं है और आखिरकार सरकार के खरीद कार्यक्रमों में मदद के लिए एलआईसी को ही आगे आना होगा। निश्चित आय बाजार अपने आप में देश की ऋण जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। संभव है कि हमारा तयशुदा आय बाजार बैंकिंग व्यवस्था का स्थान लेने के लिए सक्षम हो लेकिन अभी हम उस स्थिति में नहीं हैं। हमें एक मजबूत बैंकिंग व्यवस्था की आवश्यकता है। अभी भी सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 60 फीसदी है और वे हर तरह के लोगों की ऋण जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। ऋण की स्थिति सुधरने पर यह और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
 
दूसरी बात यह है कि बैंकों का परिचालन जारी रखने की वृहद लागत कोई कम नहीं है। 210,000 करोड़ रुपये की पुनर्पूंजीकरण योजना की प्रत्यक्ष लागत ब्याज लागत के रूप में सीमित है परंतु इसका असर सरकारी कर्ज पर तो पड़ेगा। बाजार इन बैंकों के मौजूदा स्वरूप में उनकी कोई मदद नहीं करेंगे। इसलिए सारा दांव सरकार पर होगा। बैंकों के फंसे हुए कर्ज के निपटान के लिए जरूरी मदद के आकार को देखते हुए कहा जा सकता है कि 2 से 3 लाख करोड़ रुपये के एक और प्रोत्साहन पैकेज की आवश्यकता पड़ सकती है। यह बहुत बड़ा आंकड़ा है और इसमें आगे इजाफा ही होगा। सरकारी बैंकों के कमजोर मुनाफे को देखें तो उनमें अपने आप वृद्धि को बल देने लायक पूंजी जुटाने की काबिलियत नहीं है। वे हमेशा सरकारी फंडिंग पर निर्भर रहेंगे। हमें कहीं न कहीं तो रोकना होगा। हमारे पास इतनी राजस्व क्षमता नहीं है कि हम हमेशा इन बैंकों का सहयोग करते रह सकें। 
 
तो क्या करना चाहिए? सबको पता है कि कुछ करना होगा, लेकिन क्या? एक बात यह सुनने को मिलती है कि निजीकरण करना होगा। यह संकट इसका अवसर दे रहा है। जनता में पहले ही काफी नाराजगी है। सरकारी बैंकों को लेकर एक किस्म का अविश्वास उत्पन्न हो गया है और ऐसे में उनका स्वामित्व बदलने की ओर बढ़ा जा सकता है। निजीकरण करते वक्त भी कुछ सतर्कता बरतनी आवश्यक है। अभी इसके लिए जरूरी राजनैतिक इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही। इसके बिना सारी बात केवल सैद्धांतिक बनकर रह जाएगी। 
 
हम निजीकरण को लेकर क्यों हिचकिचा रहे हैं इस पर बहस हो सकती है परंतु वह अलग लेख का विषय है। तथ्य यह है कि  किसी भी सरकार ने सन 1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण के निर्णय को पलटने का जज्बा नहीं दिखाया है। इस सरकार को भी अगले 14 महीनों में चुनाव का सामना करना है। दूसरी बात, निजीकरण अपने आप में कोई रामबाण नहीं है। हमने निजी क्षेत्र में ग्लोबल ट्रस्ट बैंक जैसों को नाकाम होते देखा है। सरकारी बैंकों का मसला संगठनात्मक बदलाव का मसला भी है जहां मानव संसाधन अहम है। निजीकरण की बात इसीलिए की जाती है ताकि विशेषज्ञता वाले पदों पर प्रतिभावान लोगों को तैनात किया जा सके और बाजार की हालत के मुताबिक वेतन-भत्ते दे सकें। हमें इन बैंकों में ऐसे अधिकारी चाहिए जो बिना सीवीसी, सीएजी या सीबीआई से डरे वाणिज्यिक निर्णय ले सकें। हमें जवाबदेही और प्रदर्शन की संस्कृति चाहिए। सरकारी बैंकों के संकट और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की उनकी क्षमता को देखते हुए हमें अहम बदलाव करने की आवश्यकता है। सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए की थी। 
 
अगर उसे काम करने का अवसर मिलता तो वह कार्यपालिका और बोर्ड स्तर पर बैंकों  में बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता था। बैंक बोर्ड ब्यूरो के गठन के बाद बैंकों में सीईओ और चेयरमैन पदों पर निजी क्षेत्र के लोग क्यों नहीं लाए गए? दरअसल ब्यूरो को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। ऐसे में अगर निजीकरण नहीं होता तो कम से कम बैंक ब्यूरो को तो काम करने दिया जाए। प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास और हर्जाने को लेकर उसने कई अनुशंसाएं की हैं। उनको आजमाया जाना चाहिए। बाजार का संदेश स्पष्ट है। ढांचागत बदलाव लाइए, और हम फंडिंग करने के लिए तैयार हैं। इन बदलावों के बिना सरकार बस बैंकों  में और अधिक पैसा लगाती जाएगी।
 
हमें सरकारी बैंकों की तादाद भी कम करनी होगी। क्या इतने सरकारी बैंकों की आवश्यकता है? स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा देश भर में विस्तार वाले बैंक हैं। इनके साथ चार और बैंक हो सकते हैं जिनकी प्रकृति क्षेत्रीय हो। क्या हमें छह से ज्यादा बैंकों की आवश्यकता है? निजीकरण अंतिम लक्ष्य हो सकता है लेकिन कम से कम हमें सुधार की प्रक्रिया तो अभी ही चालू करनी चाहिए और बैंकिग बोर्ड ब्यूरो की अनुशंसाओं को लागू करना चाहिए। 
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