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बैंक धोखाधड़ी का राजनीतिक फंडिंग से है करीबी संबंध

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  02 28, 2018

पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के साथ नीरव मोदी की धोखाधड़ी का मामला सामने आए हुए दो हफ्ते से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान हमें गुस्से से भरे कई उलाहने, कपट से भरपूर संकेत और तर्कसंगत एवं अव्यावहारिक दोनों तरह के सुझाव सुनने को मिले हैं। दरअसल अच्छी मंशा रखने वाले लेकिन कम जानकारी रखने वाले नागरिकों की तरफ से की जा रही इस चर्चा में ऐसा होना लाजिमी है। इसमें टेलीविजन चैनलों के ऐंकर और समाचारपत्रों के टिप्पणीकार भी शामिल हैं।  वैसे बैंकिंग धोखाधड़ी केवल भारत की समस्या नहीं है। दुनिया भर में बैंकिंग एवं अन्य वित्तीय संस्थानों को धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। निक लीसन को याद कीजिए जिसने अकेले ही बैरिंग्स बैंक को तबाह कर दिया था। बरबादी के बाद इस बैंक को महज एक डॉलर में बेचना पड़ा था। इसी तरह बर्नी मेडॉफ पर 50 अरब डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप लगा था। मेडॉफ चिटफंड योजना भी चला रहा था। साफ है कि बेहद सख्त नियमन एवं निगरानी वाले बैंकिंग क्षेत्रों में भी समय-समय पर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती रही हैं। यह सूची काफी लंबी है। 

 
भारत में बैंक धोखाधड़ी पर पीएनबी के पूर्व चेयरमैन और भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती ने 2013 में एक शानदार परिचर्चा पत्र पेश किया था। धोखाधड़ी से संबंधित परिदृश्य को समझने के लिए इसे अब भी पढ़ा जा सकता है।  पीएनबी घोटाले के सामने आने से उपजे शुरुआती आक्रोश के बाद अब ध्यान हमारी बैंकिंग प्रणाली को जकड़ी हुए संरचनात्मक समस्याओं पर केंद्रित हो रहा है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की हैसियत बैंकिंग प्रणाली के गोरिल्ला जैसी है। अहम सवाल यह है कि बैंकों का विशाल स्वामित्व सरकार के पास होने (असल में इसका मतलब नेताओं के नियंत्रण से है) से धोखाधड़ी को सहज रूप से बढ़ावा मिलता है? या फिर यह धोखाधड़ी का बैंकों के स्वामित्व से कोई लेना-देना नहीं होता है?
 
जब भी बैंक धोखाधड़ी के बड़े मामले सामने आते हैं तो फिर बैंक स्वामित्व के साथ उसके संबंध को लेकर सवाल जरूर खड़े होते हैं। तमाम तरह के समाधान सुझाए जाते हैं। भारत में हमेशा की तरह हरेक समाधान के विपक्ष में एक दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है और फिर कुछ भी नहीं हो पाता है। अब यह साफ है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में इस तरह की धोखाधड़ी के मामले अधिक होते हैं। इसके पीछे दर्जनों कारण हो सकते हैं। लेकिन मेरे हिसाब से इसका मुख्य कारण यह है कि बैंक धोखाधड़ी चुनावों के लिए धन जुटाने का जरिया बन चुका है। यह एक तरह से चुनावों के लिए सरकारी फंड मुहैया कराने का भारतीय संस्करण है।
 
इसके अलावा चुनावों की लागत बढऩे से जरूरी रकम की मात्रा भी बढ़ चुकी है। हरेक चुनाव क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या बढऩे से उम्मीदवारों को अब पहले से कहीं अधिक खर्च करना पड़ता है। लोकसभा चुनाव में हरेक मतदाता पर होने वाला खर्च करीब 2,000 रुपये हो चुका है जबकि वर्ष 2004 में यह करीब 100 रुपये था।  ऐसी हालत में कुछ यूं होता है। एक कर्जदार को उसकी परियोजना आवश्यकता से कहीं अधिक कर्ज दे दिया जाता है। कर्ज की इस अतिरिक्त राशि को कुछ राजनीतिक दलों या नेताओं को दे दिया जाता है और वह कारोबारी भी उसका कुछ हिस्सा अपने पास रख लेता है।
 
लेकिन बात जब इस कर्ज के भुगतान की आती है तो कर्ज की अतिरिक्त राशि गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) बनकर रह जाती है। अगर तमाम बैंकों के एनपीए का विश्लेषण करें तो आपको दिखेगा कि इसका बड़ा हिस्सा उस संचित ब्याज का होता है जो पूरे कर्ज पर लागू होता है लेकिन कारोबारी अतिरिक्त राशि का भुगतान नहीं करता है तो वह ब्याज बढ़ता जाता है। यह पूरी कवायद राजनीतिक व्यर्थता का विषय बनकर रह जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की अक्षमता के बारे में क्या कहा जाए? इसमें तो उन्हें काफी हद तक बढ़त मिली हुई है। असली धोखाधड़ी नहीं तो बैंकिंग कदाचार रोक पाने में इसकी कितनी भूमिका है? क्या धोखाधड़ी रोकने के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ बैंक प्रबंधकों के प्रति उठाए जाने वाले कदमों में कोई समस्या है? कई पूर्व बैंक अधिकारी मानते हैं कि ऐसी स्थिति है। क्या इसकी वजह से बैंकों के भीतर लापरवाही वाला रवैया बढ़ा है?
 
सच तो यह है कि राजनीतिक दबाव, अक्षमता, गलत प्रोत्साहन, खराब तकनीक और कुछ अन्य कारण सार्वजनिक बैंकों में धोखाधड़ी को आसान बना देते हैं। अचरज में डालने वाली बात यह है कि ये सारे अवयव अधिक प्रसारित नहीं हैं और न ही आकार में बड़े हैं। या फिर वे ऐसा हैं और हमें उसकी जानकारी ही नहीं है? यही वजह है कि बैंकों का निजीकरण किया जाना, नहीं तो उनमें सरकारी हिस्सेदारी को 50 फीसदी से नीचे लाना बेहद जरूरी है। नरसिम्हन समिति ने 1990 के दशक के मध्य में सरकारी हिस्सेदारी को 33 फीसदी पर लाने की सिफारिश की थी। लेकिन सार्वजनिक बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी की आदर्श स्थिति तो 25.9 फीसदी ही होनी चाहिए। 
 
हालांकि केवल ऐसा करने से ही समय-समय पर होने वाली धोखाधड़ी रुक नहीं पाएगी। लेकिन इससे कम-से-कम बैंक धोखाधड़ी के मामलों में नेताओं की भूमिका को तो कम किया जा सकेगा।  यह भी सच है कि किसी भी कारोबार में धोखाधड़ी का खतरा हमेशा बना रहता है, लिहाजा उसे सौ फीसदी सुरक्षित कर पाना संभव भी नहीं है। लेकिन धोखाधड़ी को 90 फीसदी तक तो रोका ही जा सकता है और उसके लिए हर मुमकिन कोशिश की जानी चाहिए।
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