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बहाल हो बजट का असल मकसद

नितिन देसाई /  02 28, 2018

बीते वर्षों के दौरान बजट में मीडिया की रुचि बढ़ती जा रही है। इसके चलते सरकार ने भी इसे प्रचार का माध्यम बना लिया। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं नितिन देसाई
 
संसद में आम बजट की प्रस्तुति बहुत तेजी से बदल रही है। एक वक्त था जब यह संवैधानिक जरूरत थी जिसके तहत सरकार अपनी सालाना प्राप्तियों और व्यय का लेखाजोखा रखा करती थी। अब इसमें न केवल वृहद आर्थिक स्थितियों का ध्यान रखा जाता है बल्कि वित्त मंत्री अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार कुछ पेशकश भी करते हैं। इस बदलाव को समझा जा सकता है। बीतते वर्षों के साथ सरकार भी बजट को मिलने वाले व्यापक मीडिया कवरेज और जनता के ध्यान आकर्षण को लेकर उत्सुक रहने लगी। धीरे-धीरे यह उन पहल के प्रचार का माध्यम बन गया जो मीडिया का ध्यान आकृष्टï करने में सक्षम थीं।
 
इस वर्ष का बजट इस बात का उदाहरण है। बजट भाषण में शामिल 168 पैराग्राफ में से केवल 40 में आरंभिक बातें, राजकोषीय प्रबंधन की चर्चा और कर घोषणाएं हैं। शेष 128 पैराग्राफ में क्षेत्रवार मसले हैं। इनमें से करीब 40 पैराग्राफ वित्तीय क्षेत्र और रेलवे बजट से संबंधित हैं। शेष पैराग्राफ यानी बजट भाषण के आधे पैराग्राफ सरकार की उन उपलब्धियों और क्षेत्रवार प्रस्तावों पर केंद्रित हैं जो दरअसल अन्य मंत्रालयों के दायरे में आते हैं। इन प्रस्तावों को प्रस्तुत करने की भाषा एकदम अप्रत्याशित है। वित्त मंत्री ने उन प्रस्तावों के लिए भी, 'मैं प्रस्तावित करता हूंÓ की शब्दावली बोली जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। अगर संबंधित मंत्रालयों को भी इन प्रस्तावों की जानकारी थी तो फिर ऐसी भाषा दरअसल उनके ही कैबिनेट सहयोगियों की अवमानना है और अगर उन्हें जानकारी नहीं थी तब तो यह कैबिनेट की साझा जवाबदेही का भी उल्लंघन है।
 
देश के 10 करोड़ से अधिक परिवारों को 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा की महत्त्वाकांक्षी योजना को ही देख लें। यह एक बड़ा कदम है जिसके तहत सरकारी क्षेत्र सेवा प्रदाता से वित्तीय मददगार की भूमिका में जा रहा है। कम से कम अस्पताल में भर्ती होने के मामले में तो ऐसा ही है। बजट प्रस्तुत होने के बाद इसका स्पष्टीकरण नीति आयोग के एक अधिकारी ने दिया। इससे संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय इस प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल नहीं था। सच तो यह है कि बजट में प्रस्तुत कई क्षेत्रवार पहल ऐसी हैं जो अभी चर्चा के अधीन हैं लेकिन अभी उन्हें अंतिम रूप नहीं दिया गया है। तमाम बातों को ध्यान में रखें तो लगता यही है कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय का बढ़ावा मिला होगा, तभी वित्त मंत्रालय अन्य मंत्रालयों के क्षेत्र में दखल दे रहा है। लेकिन क्या आधी अधूरी योजनाओं को व्यय की खुली प्रतिबद्धता के साथ संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए।
 
स्वास्थ्य बीमा योजना की बात करें तो इसकी लागत को लेकर कई तरह के भ्रम हैं। दरअसल यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था किस तरह बीमारियों का बोझ कम रखने में मददगार होती है। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र का आगे का व्यय सीमित होगा। एक सुसंगत स्वास्थ्य नीति वही होगी जिसमें बीमारियों का बोझ कम हो और भविष्य में कैसे बचाव से खर्च कम रखा जा सके। इसमें पानी और साफ-सफाई का मुद्दा भी शामिल है। यह भी देखना होगा कि कहां और कैसे बीमारियों का बेहतर इलाज हो सकता है और ये सुविधाएं कैसे प्रदान की जाएंगी कि सरकारी बजट और परिवारों पर इसका बोझ न पड़े। जाहिर है केरल और बिहार जैसे राज्यों की जरूरतें एकदम अलग होंगी। फिलहाल इन बातों को लेकर कोई  जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य एवं अन्य संबंधित मंत्रालयों में ऐसे दूरगामी हस्तक्षेप पर चर्चा कर लेनी चाहिए थी। सरकार को स्वास्थ्य बीमा की घोषणा के पहले सभी अंशधारकों से चर्चा करनी चाहिए थी। खासतौर पर निजी क्षेत्र से अवश्य जिसे इतने बड़े पैमाने पर सेवा का ढांचा तैयार करने के लिए प्रोत्साहन देना होगा और इसका नियमन भी करना होगा।
 
बिना पूरी तैयारी के तदर्थ घोषणा करना कतई उचित नहीं है। हमने हालिया अतीत में ऐसी कई घोषणाएं देखी हैं जहां बिना पूर्व तैयारी के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित कर दिए गए। मिसाल के तौर पर 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य घोषित कर दिया गया लेकिन ग्रिड और वितरण व्यवस्था के बारे में कोई बात नहीं की गई। इसी तरह सन 2022 तक हर व्यक्ति के लिए 24 घंटे पानी और बिजली की सुविधा वाले पक्के मकान का वादा किया गया जबकि वित्तीय और संसाधनों की आवश्यकता पर कोई काम नहीं किया गया। 
 
कमजोर ढंग से तैयार क्षेत्रवार लक्ष्यों और नीतियों की घोषणा करते हुए बजट प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखना खतरनाक है। इससे न केवल योजनाएं कमजोर होंगी बल्कि क्षेत्रवार नीतियां भी सुसंगत नहीं रहेंगी। पूरा अध्ययन न करने से अलग-अलग राज्यों की जरूरतें अलग होंगी और क्रियान्वयन में कठिनाई आएगी। इन तमाम कमियों को पूरा करने के लिए बाद में एक और योजना की आवश्यकता होगी। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का कमजोर क्रियान्वयन इसका उदाहरण है जहां बहुत कम लोगों को रोजगार मिल सका है। स्मार्ट सिटी पहल के तहत 2 लाख करोड़ रुपये के आवंटन के बावजूद बमुश्किल एक फीसदी काम हुआ है। गौरतलब है कि योजना की घोषणा हुए ढाई वर्ष बीत चुके हैं। उच्च शिक्षा फंडिंग अथॉरिटी के लिए किए गए एक लाख करोड़ रुपये को कहां खर्च किया जायेगा यह किसी को नहीं पता। 
 
बजट में योजनाओं की घोषणा भी चुनिंदा बड़ी योजनाओं तक सीमित नहीं है। इसमें तमाम बातें शामिल रहीं। उदाहरण के लिए इस वर्ष स्वास्थ्य बीमा अथवा एमएसपी गारंटी के अलावा बजट में जैविक खेती और औषधीय पौधों की खेती जैसी छोटी-मोटी बातें भी शामिल रहीं। क्या केंद्रीय बजट इन बातों के लिए सही है?  केवल यह सरकार ही नहीं बल्कि अन्य सरकारें भी ऐसी घोषणाओं से राजनीतिक लाभ लेना चाहती हैं। वित्त मंत्री का बजट भाषण अगर प्रत्यक्ष तौर पर वित्तीय क्षेत्र से संबंधित रहे तो वह वृहद आर्थिक मसलों और राजकोषीय समस्याओं से कहीं अधिक गहराई से और बेहतर ढंग से निपट सकते हैं। वित्तीय बाजार के रुझान और संभावनाओं, ऋण प्रबंधन और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों पर वह अधिक ध्यान दे सकते हैं। तब उन्हें ये मामले वृहद आर्थिक ढांचे, मध्यम अवधि की राजकोषीय नीति आदि पर यदाकदा दिए जाने वाले बयानों पर टालने नहीं होंगे। इससे मीडिया का ध्यान भी अर्थव्यवस्था की स्थिति और राजकोषीय सेहत पर रहेगा। इस प्रकार बजट का मूल संवैधानिक उद्देश्य बहाल करने में मदद मिलेगी।
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