बिजनेस स्टैंडर्ड - वनों की बढ़ोतरी और गुणवत्ता को लेकर चंद सवाल
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वनों की बढ़ोतरी और गुणवत्ता को लेकर चंद सवाल

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  February 26, 2018

भारत को अपने वनों का कैसे प्रबंधन करना चाहिए? यह सवाल अजीब लगता है, लेकिन सही है। यह सवाल मुश्किल से ही कभी पूछा गया है और वास्तव में कभी इसका जवाब भी नहीं दिया गया। ऐसा लगता है कि यह सवाल पूछने की कोई वजह नहीं है क्योंकि देश में वनों की स्थिति के बारे में चिंता करने की कोई वजह नहीं है। सरकार का कहना है कि इस मोर्चे पर सब कुछ ठीक नहीं है। ऐसा लगता है कि वे सही हैं। 
भारतीय सर्वेक्षण विभाग की उपग्रह तस्वीरों पर आधारित वन स्थिति रिपोर्ट, 2017 में यह पाया गया है कि वन क्षेत्र कुल मिलाकर स्थिर है, जिसमें वर्ष 2015 और 2017 के बीच केवल 0.21 फीसदी बदलाव दर्ज किया गया है। देश के कुल भू-क्षेत्र में से करीब 21.54 फीसदी वन क्षेत्र है। वन विभाग के तहत आने वाले वन देश के कुल वनों का 23 फीसदी हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि वन की कहानी अच्छी खबर है, लेकिन हमें इस पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए। पहला, हमें यह समझना चाहिए कि इन पेड़ों की तादाद में कहां बढ़ोतरी हो रही है। दूसरा, हमें यह समझना चाहिए कि उस जंगल की गुणवत्ता कैसी है, जो स्थिर बना हुआ है। 
वन स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक वन क्षेत्र की परिभाषा में एक हेक्टेयर से ज्यादा वह सब भूमि शामिल है, जिसमें 10 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र पेड़ों से आच्छादित है, भले ही उसका भू-उपयोग, स्वामित्व और कानूनी स्थिति कुछ भी हो। दूसरे शब्दों में इस 21.54 फीसदी वन क्षेत्र में सरकारी वन भूमि और निजी जमीन में उगे पेड़ शामिल हैं। यह कहना संभव नहीं है कि वन विभाग के तहत आने वाले वनों का क्षेत्र कितना है क्योंकि सभी राज्य सरकारों ने इन भूखंडों की सीमाओं के डिजिटलीकरण का काम पूरा नहीं किया है। इसलिए हमारे पास वर्गीकृत और संरक्षित वन भूमि के वनों की संपूर्ण तस्वीर नहीं है। 
रिपोर्ट के मुताबिक अभी करीब 16 राज्यों ने अपने वनों की सीमाओं का डिजिटलीकरण किया है। दरअसल ये आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्यों में पहले वनों के रूप में दर्ज काफी क्षेत्र में 'कमी' आई है और ब्योरे के डिजिटलीकरण के बाद ये नहीं मिल रहे हैं। इन 16 राज्यों में करीब 70,000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि खत्म हो गई है, जो अभिलिखित वन क्षेत्र का करीब 12 फीसदी है। इससे यह जानने के लिए देशभर में सीमाओं का डिजिटलीकरण पूरा करना अहम हो जाता है कि आरक्षित या संरक्षित वनों के क्षेत्र की क्या स्थिति है।
इसके अलावा वनों की गुणवत्ता का भी सवाल है। इस आकलन के मुताबिक कुल क्षेत्रफल के 21.54 फीसदी वन क्षेत्र में केवल 3 फीसदी को अत्यधिक सघन वन में वर्गीकृत किया जा सकता है। अत्यधिक सघन का मतलब है कि भूमि 70 फीसदी या उससे अधिक पेड़ों से आच्छादित होती है। करीब 9 फीसदी वन क्षेत्र सामान्य सघन है, जिसमें 40 से 70 फीसदी भूमि पेड़ों से ढकी होती है। वहीं 9 फीसदी खुले वन हैं, जिनमें जमीन 10 से 40 फीसदी पेड़ों से आच्छादित होती है। 
इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि वर्ष 2015 से 2017 के बीच 'अत्यधिक सघन' के रूप में वर्गीकृत वनों में करीब 9,000 वर्ग किलोमीटर का इजाफा हुआ है। वहीं सामान्य सघन जंगलों में गिरावट आई है, जबकि खुले वनों में कुछ बढ़ोतरी हुई है। इससे ऐसा लगता है कि वन क्षेत्र की गुणवत्ता सुधरी है और 'सामान्य सघन' वन 'अत्यधिक सघन' वनों में तब्दील हुए हैं। अच्छी खबर है? इस पर इतने जल्द भरोसा करने की जरूरत नहीं है। 
इस बदलाव के लिए जो वजह बताई गई है, वे कई हैं। इनमें उपग्रह तस्वीरों में सुधार से लेकर संरक्षण और वन विभाग के तहत आने वाली वन भूमि से बाहर पौधरोपण तक शामिल हैं। इसलिए यह कहानी का मुख्य बिंदु है। 
क्या हम 7.6 लाख वर्ग किलोमीटर वन विभाग की वन भूमि का संरक्षण क्यों कर रहे हैं। उनका क्या उपयोग है? क्या यह उत्पादक उपयोगों के लिए पौधरोपण है? उस मामले में कौन पौधरोपण करेगा और उससे किन्हें फायदा होगा, वन विभाग को या इन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीण समुदायों को? क्या भारत की वन भूमि केवल संरक्षण के मकसद के लिए है, इसलिए उस वन विभाग को सौंपा गया है? क्या हम पेड़ों को उगाएंगे और काटेंगे, वन विभाग की वन भूमि में नहीं बल्कि निजी जमीन में। ये सवाल न पूछे गए और न ही उनका जवाब दिया गया। 
वर्ष 2017 की रिपोर्ट में उन बहुत सी चीजों का ब्योरा दिया गया है, जो आज हो रही हैं। इसके अनुमानों के मुताबिक वन विभाग के तहत आने वाली वन भूमि से लकड़ी का सालाना उत्पादन 40 लाख घन मीटर है और इसलिए लकड़ी की ज्यादातर मांग वन भूमि से बाहर से या आयातित लकड़ी से पूरी होती है। आयात में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। 
रिपोर्ट में वन विभाग के वनों के बाहर देश में लकड़ी पैदा करने की संभावनाओं का भी आकलन किया गया है, जो 745 लाख घन मीटर के आसपास है। इसकी 40 लाख घन मीटर से तुलना कीजिए, जो वन विभाग की विस्तृत जमीन में पैदा होती है। इससे आपको समझ आएगा कि कौन पेड़ उगा रहा है और कहां। 
दरअसल उगाए जाने वाले वनों का 30 फीसदी वन विभाग के वनों से बाहर है और यह वन विभाग द्वारा नियंत्रित जमीन में पैदा होने वाली लकड़ी की तुलना में बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। यह वन स्वास्थ्य और उत्पादकता का संकेत है। 
अंतर पेड़ों की प्रजातियों की 'प्रकृति' का है। वनों में मुख्य रूप से साल, सागवान या देवदार बढ़ रहे हैं। जबकि जंगलों के बाहर वनों में आम, नारियल, नीम और बांस की तादाद बढ़ रही है। जो बागवानी और उगाई जाने वाली प्रजातियां हैं। यह उस स्थिति में है, जब भारत में पेड़ उगाना और काटना एक जटिल कारोबार है। देेश में पेड़ों की कटाई, परिवहन और बिक्री के लिए बहुत सी मंजूरियां लेनी पड़ती हैं। इसलिए सवाल यह उठता है कि भारत में वन भूमि का क्या मतलब है? हम इस पर चर्चा जारी रखते हैं। 
Keyword: Forest, trees, वन,
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