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प्रत्यक्ष कर संहिता पर हो पुनर्विचार

पार्थसारथि शोम /  February 23, 2018

प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को और सहज बनाते हुए वर्ष 2009 की स्थिति में वापस ले जाना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम 

 
प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) में कई बदलाव हो चुके हैं। वर्ष 2007 के दौरान मुझे इसके 2009 के शुरुआती संस्करण (डीटीसी09) पर काम करने का अवसर मिला था। एचएमआरसी से मेरी वापसी के बाद मैं समझ चुका था कि इसका 2010 का संस्करण जो अंशधारकों और कर प्रशासन की राय के बाद तैयार किया गया है, वह काफी कमजोर और आयकर अधिनियम के समान है। बहरहाल, डीटीसी10 को संसद की वित्त समिति के समक्ष भेजा गया और उसके लिए कई उचित सुझाव भी मिले। वर्ष 2012 के अंत तक मैं सरकार में दोबारा वापस गया जहां अन्य मामलों के अलावा संसद की वित्त समिति की अनुशंसाओं और डीटीसी10 में व्याप्त निरर्थकता पर भी विचार करना था। यह काम वर्ष 2013-14 तक पूरा हो गया। इस तरह डीटीसी का काम 2007 से 2014 तक खिंच गया। अंतिम मसौदा यानी डीटीसी14 को सभी मंत्रालयों की मंजूरी मिल गई थी लेकिन वह कैबिनेट तक नहीं पहुंचा।
 
नई सरकार ने पहले इस पर पुनर्विचार करने की इच्छा नहीं दिखाई। मैंने इस कदम की आलोचना की थी। अब सरकार इस पर विचार कर रही है। ऐसे में डीटीसी09 और डीटीसी10 की कुछ अनुशंसाओं पर बात करना और दोनों की तुलना करना ताकि नए प्रारूप में उपयोगी सुधार किए जा सकें। मैं डीटीसी14 से दूरी बरतूंगा क्योंकि एक तो तकनीकी तौर पर यह अंशधारकों की चर्चा के लिए नहीं आई। दूसरा मौजूदा कवायद में डीटीसी09 पर पुनर्विचार की संभावना है जबकि डीटीसी14 में ऐसा कुछ नहीं है। तीसरी बात पहले के तीन संस्करणों का विश्लेषण यूं भी अनावश्यक होगा।
 
सेवानिवृत्ति की बचत पर कर के मामले में डीटीसी10 काफी हद तक आय कर के समान ही थी। इसमें मामूली अंतर यह था कि भविष्य निधि को निवेश या सहयोग के चरण में मामूली रियायत दी गई थी जबकि अर्जित ब्याज पर रियायत थी। बहरहाल भविष्य निधि कुछ संस्थानों में इनकी निकासी पर कर लगता है। ऐसे में डीटीसी10 को विभिन्न बचत योजनाओं के बीच अंतर के लिए लौटा दिया गया क्योंकि किसी भी ढांचागत कर सुधार में इस स्थिति से बचना चाहिए। 
 
डीटीसी09 में भविष्य निधि समेत हर तरह की बचत ईपीईटी का विषय थी। यहां सेवानिवृत्ति योगदान यानी ईपी तो कर रियायत का हकदार था लेकिन केवल तभी जबकि उसे सेवानिवृत्ति लाभ योजना में जमा किया गया हो और उसके संग्रहण पर रियायत हो। शुरुआती दो चरणों की रियायत की भरपाई के रूप में इसकी निकासी पर कर है। डीटीसी10 में सेवानिवृत्ति लाभ बिल्कुल आयकर की तरह था जहां सेवानिवृत्ति लाभ पर तयशुदा रियायत है। आदर्श स्थिति में डीटीसी09 को वापस लौटाना चाहिए क्योंकि बचत पर कर के मामले में एक बेहतर व्यवस्था की जरूरत है। 
 
पूंजीगत लाभ पर सामान्य आय के रूप में कर: डीटीसी09 में पूंजीगत लाभ को कुल आय में शामिल किया गया है और इस पर मामूली आय कर दर लगाई गई है। पूंजीगत वस्तु अगर एक साल से ज्यादा समय तक रखी जाए तो उस पर अधिग्रहण या सुधार की लागत लगेगी। किसी भी तरह का पूंजीगत नुकसान आने वाले साल के पूंजीगत लाभ से समायोजित होगा।
 
डीटीसी09 प्रतिभूति लेनदेन कर को समाप्त कर देगी। शेयर हस्तांतरण से होने वाला पूंजीगत लाभ सामान्य आय का हिस्सा होगा। डीटीसी10 में प्रतिभूति लेनदेन कर बरकरार है। इसमें एक विशेष योजना की व्यवस्था की गई ताकि एसटीटी वाले लेनदेन के लिए पूंजीगत लाभ का आकलन किया जा सके। उसके बाद सूचीबद्घ शेयरों को एक साल से अधिक या कम समय के लिए रखने पर अलग-अलग आकलन पेश किए गए। गैर एसटीटी चुकता पूंजीगत लाभ के अंतर पेश किए गए। यह सारा कुछ आय कर के ढांचे पर ही आधारित था। जाहिर है डीटीसी09 काफी बेहतर थी। 
 
पूंजीगत लाभ बचत योजना (सीजीएसएस): डीटीसी09 में सीजीएसएस का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें होने वाला जमा निकासी तक कर मुक्त रहता। डीटीसी10 ने इस योजना को वापस ले लिया जबकि दो अन्य ऐसी योजनाएं बरकरार रहने दी गईं जो कृषि भूमि और आवास से संबंधित थीं। इसे बहाल किया जाना चाहिए। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट): डीटीसी09 में सकल परिसंपत्ति मूल्य के हवाले से मैट का प्रस्ताव रखा गया था।  डीटीसी10 ने मैट को वापस ले लिया और आयकर की संबंधित दर को 18.5 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी गई। इसके अलावा कैरी फॉरवर्ड अवधि को 10 से बढ़ाकर 15 साल कर दिया गया। इसे बुक प्रॉफिट कर का नाम दिया गया। 
 
डीटीसी 09 में सकल परिसंपत्ति आधारित मैट पर भी दोबार विचार किया जाना चाहिए जबकि इसके मार्ग की अन्य बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए। इसकी दरों को तय करने में सावधानी बरती जानी चाहिए।  गैर लाभकारी संगठनों का कराधान: डीटीसी09 में ऐसे संस्थानों की कर जवाबदेही किसी भी निवेश या वित्तीय परिसंपत्ति के हस्तांतरण पर होने वाले पूंजीगत लाभ अधिशेष का 15 फीसदी होता था। भविष्य के इस्तेमाल के लिए कोई राशि अलग करने की व्यवस्था नहीं थी। डीटीसी10 में एक लाख रुपये की रियायत दी गई। उसके ऊपर की आय पर 15 फीसदी का कर लगना था। यह इस मायने में आय कर के अनुरूप था कि गैर लाभकारी संस्थानों के लिए अनिश्चितकाल के लिए 15 फीसदी की दर की व्यवस्था की गई। शेष 85 फीसदी को 5 वर्ष के लिए अलग करने की व्यवस्था की गई लेकिन इसके लिए आकलन अधिकारी का आवेदन आवश्यक था। डीटीसी09 ने आकलन अधिकारी द्वारा परीक्षण से जुड़ी चिंता को समाप्त किया था लेकिन डीटीसी10 में यह लाभ भी समाप्त हो गया। 
 
गैर लाभकारी संस्थानों का कराधान डीटीसी09 में दिखना चाहिए। हालांकि नया प्रावधान यह है कि ऐसा संस्थान 15 फीसदी राशि भविष्य के इस्तेमाल के लिए जमा कर सकता है। यह मानना होगा कि ऐसे संस्थानों की देश के विकास में बहुत अहम भूमिका है। जिन जगहों और क्षेत्रों में सरकार पर्याप्त सामाजिक और आर्थिक सेवाएं मुहैया नहीं करा पा रही है वहां ये संस्थान काम कर रहे हैं। गैर लाभकारी संस्थानों को चुनौती देते हुए उन पर भारी कराधान करना या उनके खिलाफ गैर कर प्रतिरोध लगाना गलत नीति होगी। इस संदर्भ में अगर गलत नीतियों को अपनाना जारी रखा गया तो इससे ये संस्थान ही समाप्त हो जाएंगे। जबकि ये जरूरतमंद और संवेदनशील तबके को अनिवार्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए आवश्यक हैं।
Keyword: DTC, income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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