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बाजार में दीर्घकालिक मंदी के आसार से नहीं इनकार

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  February 22, 2018

पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में हुआ करोड़ों रुपये का घोटाला बीते सप्ताह से सुर्खियों में है। किसी को यह पता नहीं है कि बैंकिंग जगत को इससे कितना झटका लगेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि हमें भी यह पता नहीं है लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के जोखिम में कौन-कौन से बैंक हैं। इसका राजनीतिक असर भी होगा और फरार आभूषण कारोबारी के बड़े लोगों के साथ संपर्क को देखते हुए कह सकते हैं कि अभी बहुत कुछ सामने आएगा। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की हालत किसी से छिपी नहीं है। तीसरी तिमाही के नतीजों से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र आमतौर पर घाटे में है और फंसा हुआ कर्ज बढ़ रहा है। पीएनबी उन पांच बैंकों में से एक है जिन्होंने मुनाफा होने की घोषणा की थी। पांचों का कुल मुनाफा 850 करोड़ रुपये था। पीएनबी ने 230 करोड़ रुपये का मुनाफा होने की बात कही थी। घोटाले से होने वाले नुकसान की तुलना में यह राशि बहुत मामूली है। अन्य 16 सरकारी बैंकों ने 18,900 करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही। इसमें स्टेट बैंक का 2,400 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ इंडिया का 2,340 करोड़ रुपये का नुकसान शामिल है। आरबीआई की पिछली वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक सितंबर 2018 तक फंसा हुआ कर्ज सकल अग्रिम का 11 फीसदी हो सकता है। आंकड़ा आगे और बढ़ेगा। आशंका तो यही है कि 2.2 लाख करोड़ रुपये की प्रस्तावित राशि सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए अपर्याप्त होगी। इसके लिए इससे दोगुनी या और अधिक राशि की आवश्यकता होगी। 

 
दूसरी बात, आरबीआई ने अपनी दोमाही नीतिगत समीक्षा में नीतिगत दरों को स्थिर रखा। मौद्रिक नीति समिति के एक सदस्य दरों में इजाफा चाहते थे लेकिन अन्य पांच सदस्यों ने यथास्थिति का पक्ष लिया। केंद्रीय बैंक को लगता है कि मुद्रास्फीति और बढ़ेगी जबकि उसे यह भी उम्मीद है वर्ष 2018-19 में जीडीपी की वृद्घि दर में करीब 0.75 फीसदी का सुधार होगा।  उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के जनवरी 2018 के आंकड़े से संकेत मिलता है कि खुदरा महंगाई स्वीकार्य स्तर पर रह सकती है। जनवरी 2018 में सीपीआई की दर पिछले साल की समान अवधि से 5.07 फीसदी अधिक थी। यह दिसंबर 2017 के 5.21 फीसदी से बेहतर स्तर है। खाद्य महंगाई में कमी आई है लेकिन कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत ने हिसाब बराबर कर दिया। बॉन्ड प्रतिफल हमेशा भविष्य में मुद्रास्फीति ज्यादा होने की उम्मीद पर ऊपर ही गया है। जबकि कमजोर बैलेंस शीट बैंक की ऋण देने की क्षमता को प्रभावित करती है। दिसंबर 2017 में सालाना आधार पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) उछलकर 7.11 फीसदी हो गया। यह अच्छी बात हुई। आईआईपी में विनिर्माण में 8.4 फीसदी, बिजली और खनन में 4.4 फीसदी और 1.2 फीसदी वृद्धि देखने को मिली। आधार प्रभाव के अलावा आईआईपी काफी अस्थिर रहा। वाहनों की बिक्री भी एक बड़ा संकेत है और जनवरी में इसके नतीजे शानदार रहे। वाहन उत्पादन और डीलरों को भेजे जाने वाली तादाद सालाना आधार पर 30.7 फीसदी अधिक रही। आधार प्रभाव के बावजूद यह बेहतरीन है। वाणिज्यिक वाहन, दोपहिया वाहन, तीन पहिया वाहन और अन्य उपयोग वाले वाहनों में भी वृद्धि देखने को मिली।
 
जनवरी के पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) में मामूली संकुचन नजर आया। विनिर्माण पीएमआई का विस्तार हुआ और वह 52.4 फीसदी रहा लेकिन यह दिसंबर के 54.7 फीसदी से कम रहा। सेवा क्षेत्र का पीएमआई 51.7 फीसदी रहा और यह भी दिसंबर के 50.9 फीसदी में विस्तार का ही संकेत देता है। नैशनल काउंसिल ऑफ ऐप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च द्वारा हर तिमाही में जारी कारोबारी आत्मविश्वास सूचकांक भी रुझान मापने का तरीका है। उसमें भी जनवरी में 9.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। इससे पहले दो तिमाहियों में गिरावट आई थी।
 
वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही के नतीजों से पता चलता है कि तेजी आई है लेकिन वह धीमी है। तीसरी तिमाही में नतीजे घोषित करने वाली 2000 कंपनियों में अगर बैंक और तेल एवं गैस को अलग कर दें तो संकेत यही मिलता है कि शुद्ध मुनाफा करीब 10 फीसदी की दर से बढ़ा है। यह बीती पांच तिमाहियों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। एफएमसीजी और सीमेंट कंपनियों के नतीजे भी अच्छे रहे जिससे पता चलता है कि खपत में सुधार हो रहा है। कच्चे तेल और औद्योगिक धातु क्षेत्र के दाम विश्व स्तर पर तेज हुए हैं। उनके परिचालन और मार्जिन में मामूली सुधार हुआ है।
 
निवेशकों की बात करें तो खुदरा निवेशक बजट के बाद से बिकवाली कर रहे हैं और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पिछले सप्ताह बिकवाली शुरू की। ऐसे में घरेलू खरीद ने प्रमुख सूचकांकों को लुढ़कने से बचाए रखा। छोटे सूचकांकों में अवश्य भारी गिरावट रही और वित्तीय क्षेत्र पर बाजार की तुलना में ज्यादा असर हुआ। निफ्टी में बजट के बाद से 5.12 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई। बैंकिंग शेयरों में 7.56 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। घरेलू संस्थागत खरीद का एक बड़ा हिस्सा म्युचुअल फंड में है। रुझान में आया बदलाव इस क्षेत्र पर भी असर डाल सकता है, अगर खुदरा निवेशक अपनी फंड प्रतिबद्धता कम करने लगें। एफपीआई बजट में उल्लिखित राजकोषीय चूक और संरक्षणवाद से नाखुश हैं। पीएनबी घोटाले ने भी नकारात्मक असर डाला है। गत सप्ताह भारतीय एक्सचेंज में दुबई और सिंगापुर की कारोबारी पहुंच पर लगी रोक से भी अच्छा संदेश नहीं गया है। बहरहाल अब तक रुपया ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है। यह येन की तुलना में 4 फीसदी और यूरो की तुलना में 1.5 फीसदी कमजोर हुआ है। परंतु डॉलर और पाउंड के मुकाबले यह केवल 0.46 और 0.2 फीसदी कमजोर पड़ा है।
 
अगर बिकवाली चलती रही तो प्रमुख सूचकांकों में 200 दिन का मूविंग एवरेज (डीएमए) खतरे में पड़ सकता है। यह निफ्टी के 10,075 के मौजूदा कारोबारी स्तर से करीब 3.5 फीसदी कम है। अगर 200 डीएमए टूटता है तो तकनीकी आकलन लंबी अवधि के मंदी के बाजार का संकेत करेगा।
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