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गलत संदेश

संपादकीय /  February 22, 2018

देश के दूरसंचार नियामक ट्राई ने आक्रामक कीमतों से निपटने के लिए दरों को लेकर जो ताजातरीन आदेश दिया है वह इस क्षेत्र में एक और संघर्ष की जमीन तैयार करने वाला है। दरें पिछले 15 साल से अधिक समय से कम बनी हुई हैं और यह तय करने का अधिकार बाजार का ही है कि कोई दूरसंचार कंपनी ग्राहकों से कितना पैसा लेना चाहती है। हालांकि यह व्यवस्था अभी बरकरार है लेकिन नियामक ने इस आदेश के साथ इस व्यवस्था से दूर रहने का सिलसिला त्याग दिया है। तत्काल प्रभाव से लागू होने वाला यह आदेश गलत नजर आता है क्योंकि इस क्षेत्र में आक्रामक मूल्य निर्धारण से निपटने के क्रम में यह पूरी तरह महत्त्वपूर्ण बाजार प्रतिभागी की परिभाषा पर निर्भर है। कोई सेवा प्रदाता जिसके पास उपभोक्ताओं या राजस्व के क्षेत्र में 30 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी हो उसे महत्त्वपूर्ण बाजार प्रतिभागी माना जाएगा। ट्राई का कहना है कि ऐसे प्रतिभागी को आक्रामक मूल्य की पेशकश करने वाला माना जाएगा अगर उसके द्वारा की गई पेशकश किसी एक सर्किल की औसत चर लागत से कम हुई। इस दर का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के लिए प्रति सर्किल 50 लाख रुपये का जुर्माना तय किया गया है। यह जमीन पर जिस तरह काम करेगा उसे देखते हुए माना जा रहा है कि एक नए सेवा प्रदाता को छोड़कर सारे पुराने सेवा प्रदाता नुकसान उठाएंगे। 

 
समस्या दरअसल आक्रामक मूल्य की ट्राई की परिभाषा में ही है। सबसे मूल विसंगति तो यही है कि अगर सरकार ने पहले ही विलय वाली संस्था के लिए 50 फीसदी बाजार हिस्सेदारी की इजाजत देकर विलय एवं अधिग्रहण को आसान बना दिया है तो ट्राई महत्त्वपूर्ण बाजार प्रतिभागी के लिए 30 फीसदी की सीमा क्यों रख रहा है? इतना ही नहीं अगर कोई महत्त्वपूर्ण बाजार प्रतिभागी तब आक्रामक मूल्य तय करे तो क्या हो जबकि उसके सामने एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी अत्यंत कम शुल्क दर लेकर आए जो महत्त्वपूर्ण प्रतिभागी के रूप में परिभाषित ही नहीं है? क्या दूरसंचार नियामक यह चाहता है कि मौजूदा बाजार कारोबारी स्वेच्छा से अपने उपभोक्ता आधार में कटौती करके अपने आपको महत्त्वपूर्ण प्रतिभागी की परिभाषा से बाहर कर लें या वह चाहता है कि उसके उपभोक्ता उस नई कंपनी के पास चले जाएं जिसे मनमानी दर तय करने की आजादी है? 
 
इतना ही नहीं अगर ट्राई आक्रामक मूल्य का निर्धारण करते वक्त बाजार हिस्सेदारी पर नजर डाले तो उसे डाटा बाजार को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह बात सबको पता है कि दूरसंचार क्षेत्र का असली कारोबार अब डाटा क्षेत्र में हो रहा है, न कि वॉयस कॉल के क्षेत्र में।  चिंता का एक और विषय है ट्राई का उपभोक्ताओं को पेश की जाने वाली दरों की योजना के ब्योरे पर ध्यान देना। ट्राई चाहता है कि दूरसंचार कंपनियां बाजार में उतारने से पहले सारी दर योजनाओं का खुलासा करें। पुरानी कंपनियों के पास तमाम तरह की योजनाएं हैं जिनकी मदद से वे ग्राहकों को पोर्ट करने से रोकते हैं। खासतौर पर तब जब कोई नई कंपनी कोई बहुत अच्छा एकल प्लान लेकर आती है। माना जा रहा है कि पुरानी कंपनियां मनचाही दरें बनाते रहने के लिए कानून की मदद लेंगी। नियामक अगर इस क्षेत्र में और अधिक अनिश्चितता नहीं पैदा करता तो बेहतर होता। चाहे जो भी हो एक क्षेत्रीय नियामक को ऐसे मसलों में उलझते देखना विचित्र है जो हकीकत में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) का क्षेत्र होना चाहिए। सीसीआई को प्रतिस्पर्धा अधिनियम की मदद से ऐसे मामलों से निपटने के अधिकार दिए गए हैं। ऐसे में ट्राई के कदम तर्क से परे हैं।
Keyword: telecom, दूरसंचार trai,,
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