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सर्वप्रथम रिजर्व बैंक को बनाएं सक्षम

अजय शाह /  02 20, 2018

पीएनबी मामले से संकेत मिलता है कि अगर बैंकिंग नियामक में एक विशिष्टï स्तर की क्षमताएं नहीं होंगी तो हमारी बैंकिंग यूं ही दिक्कतों से दो-चार होती रहेगी। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

 
बैंकिंग नियमन और निगरानी व्यवस्था में एक खास स्तर तक सुधार की जरूरत है। यह लगातार अनुपस्थित नजर आ रही है। कुछ लोग इसे सरकारी बनाम निजी बैंकिंग के सवाल के रूप में देखते हैं। निजी बैंकों में भी फंसे हुए कर्ज की समस्या है। इससे पता चलता है कि देश में बैंकिंग व्यवस्था के नियमन में कुछ साझा दिक्कतें हैं। सबसे पहले हमें एक सक्षम केंद्रीय बैंक (आरबीआई) तैयार करना होगा। हमें बैंकिंग व्यवस्था का आकार धीरे-धीरे कम करना होगा जबकि आरबीआई को सक्षम भी बनाना होगा। 
 
समस्या
 
पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) संकट मामले में पता चला कि स्विफ्ट संदेश भेजे गए थे और निजी लोगों को गारंटी सौंपी गई थी। इन्हें बैंक की मुख्य लेखा व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया। जब निरीक्षक बैंक आते तो उन्हें सबसे पहले यही मांगना चाहिए था। स्विफ्ट के जरिये कौन-कौन सी गारंटी दी गईं? क्या वे खातों का प्रतिनिधित्व करती हैं? इनके एक प्रादर्श के लिए क्या आप यह साबित कर सकते हैं कि जोखिम प्रबंधन की उचित प्रक्रिया अपनाई गई? ये कुछ शुरुआती काम हैं जो बैंक को करने चाहिए। 
 
कई और बातें हैं जिनको बैंकिंग व्यवस्था की सामान्य क्षमताओं की मदद से ही पकड़ा जा सकता था। इसमें आरबीआई को बैंकों द्वारा विदेशी मुद्रा संबंधी गतिविधियों पर मिलने वाली रिपोर्ट, नियामकों द्वारा लोगों की संवेदनशील पदों पर तैनाती आदि इसमें शामिल हैं। इसी प्रकार फंसे हुए कर्ज के संकट से बचा जा सकता था, बशर्ते कि नियामक ने कुछ मूलभूत बातों का ध्यान रखा होता। वाणिज्यिक बैंकों के लिए बैंकिंग निगरानी कठिन काम नहीं है। इसके लिए ऐसे नियमों की आवश्यकता होती है जहां नाकाम हो रही संपत्ति का पता लगाकर तेजी से निपटान किया जा सके। इससे बैंक को छद्म तरीके से मजबूत नहीं दिखाया जा सकेगा। जब बैंक देखता है कि किसी परिसंपत्ति का आंतरिक मूल्य शून्य है तो वह वसूली के लिए वाणिज्यिक उपाय कर सकता है। इसे समझना कोई कठिन काम नहीं है लेकिन आरबीआई में इतनी क्षमता नहीं है और इसलिए एकदम आधारभूत काम भी नहीं होते। भारत में लोग अपने हित में काम करते नजर आते हैं जबकि संगठनात्मक लक्ष्यों को हासिल करने में वे पीछे रहते हैं। रेलवे का आकार रेलवे की नौकरशाही के हितों से जुड़ा है, शिक्षा में शिक्षा की नौकरशाही के हित हैं, रक्षा क्षेत्र से वर्दीधारियों के हित संबद्घ हैं और आरबीआई को बनाने में वहां की नौकरशाही का योगदान है।
 
यह केवल सरकारी बैंक का मामला नहीं
 
सरकारी बैंकों की आलोचना का सिलसिला चल रहा है। परंतु समस्या स्वामित्व की नहीं बल्कि निगरानी की है। अगर आरबीआई ने निगरानी का काम सही अंदाज में किया होता तो ये गलतियां होती ही नहीं। फिर चाहे बैंक सरकारी हो या निजी। 
निजी बैंक मसलन आईसीआईसीआई या ऐक्सिस बैंक आदि में भी फंसे कर्ज की समस्या है। उदाहरण के लिए जब सरकार ने सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की बात की थी तब आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में 9 फीसदी उछाल आई थी। इसलिए क्योंकि सरकार जनता के पैसे से डिफॉल्टरों को बचाने जा रही थी और इन डिफॉल्टरों ने आईसीआईसीआई बैंक से भी कर्ज लिया था। सरकारी बैंकों का नियमन करना वैसे भी आसान है। इन बैंकों के शीर्ष प्रबंधन को कम प्रोत्साहन और तयशुदा वेतन मिलता है। उन्हें कोई शेयर नहीं दिए जाते। उनका शीर्ष प्रबंधन मूलभूत रूप से आरबीआई के सामने विनयशील मुद्रा में रहता है। इसके विपरीत निजी बैंकों के वरिष्ठï प्रबंधकों को भारी भरकम प्रोत्साहन मिलता है और उनका वेतन भी ज्यादा होता है। इसके अलावा उन्हें बोनस, शेयर स्वामित्व आदि भी मिलते हैं। वे नियमों में कमी का फायदा उठाने का प्रयास करेगे। निजी क्षेत्र का नियमन अधिक कठिन काम है। ऐसे में उचित होगा कि सबसे पहले हम बैंकिंग नियमन की राज्य क्षमता विकसित करें। उसके बाद ही सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाए। 
 
आरबीआई की क्षमता का खाका
 
एक बढिय़ा प्रदर्शन वाला आरबीआई कैसे हासिल किया जाए? इसके चार घटक हैं। पहला, इसका उद्देश्य एकदम स्पष्टï होना चाहिए। आरबीआई को मजबूत कोष और मजबूत बैंकिंग की कोशिश करनी चाहिए। मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने के साथ इनमें से एक दिशा में काम आरंभ हो चुका है जबकि दूसरे पर होना है। इसके अलावा भी अन्य लक्ष्य हैं जिन पर हम विफल रहे हैं।  बोर्ड की भूमिका भी इसमें अहम है। फिलहाल फिलहाल आरबीआई बोर्ड सामान्य बैठकें करता है और संगठन इनकी अनदेखी कर देता है। 
 
बोर्ड को संगठन के डिजाइन, संसाधन आवंटन और प्रक्रिया आदि का ध्यान रखना चाहिए और विभागीय प्रमुखों को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। तीसरी बात यह कि विधायी, कार्यपालिक और न्यायिक कदमों के लिए विस्तृत प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। फिलहाल आरबीआई स्टाफ को ये काम करने के लिए पूरे अधिकार दिए गए हैं। इसे क्षमता कम हुई है और एक तरह का मनमानापन आया है। जरूरत इस बात की है विस्तृत प्रक्रियागत कानून बनाया जाए ताकि निष्पक्ष तरीके से और सक्षम ढंग से कामकाज हो सके। 
 
रिपोर्टिंग और जवाबदेही का नंबर चौथा है। फिलहाल आरबीआई एक अस्पष्टï संस्थान है। यह भारतीय राज्य की सबसे बड़ी और सबसे जटिल वित्तीय शाखा है। परंतु वित्तीय खुलासों पर इसके केवल चार पन्ने हैं और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक इसका ऑडिट भी नहीं करता। बेहतर रिपोर्टिंग से गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।  भारतीय वित्तीय संहिता के मसौदे में इन चारों पर गहनता से विचार विमर्श किया गया है। यह आरबीआई को सक्षम बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। आखिर में, ताली दोनों हाथों से बजती है। आरबीआई को अगर उच्च प्रदर्शन हासिल करना है तो उसके मातृ संस्थान  यानी आर्थिक मामलों के विभाग को भी संस्थागत क्षमताएं विकसित करनी होंगी और आईएफसी में उल्लिखित भूमिका निभानी होगी। 
 
जब तक ऐसा नहीं होता
 
यह एक लंबी परियोजना है। हमें पहले आईएफसी को कानून बनाना होगा। उसके बाद आरबीआई की क्षमता तैयार करने में कई साल लगेंगे। कुल मिलाकर इसमें 5 से 10 साल का वक्त लग सकता है। इस बीच क्या होगा?  इस बीच हमें एक व्यापक बैंकिंग व्यवस्था को चुनौती के रूप में देखना होगा। एक ऐसा देश जिसे एयर ट्रैफिक कंट्रोल को ठीक से चलाना न आता हो उसमें विमानन कंपनियां नहीं होनी चाहिए। एक देश जिसे बैंकों का नियमन करना नहीं आता है वहां बैंकिंग का जीडीपी की तुलना में आकार निरंतर कम कम होना चाहिए। हमें गैर बैंकिंग वित्तीय व्यवस्था विकसित करनी चाहिए और बैंकिंग की सांकेतिक वृद्घि को तब तक रोक देना चाहिए जब तक कि एक तयशुदा आकार में क्षमता निर्माण नहीं हो जाता। 
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