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स्टेट बैंक से पीएनबी तक पुराना सिलसिला

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 18, 2018

जिम्मी नागरवाला के स्टेट बैंक से 60 लाख रुपये का घपला करने से लेकर नीरव मोदी के पीएनबी से 11,000 करोड़ रुपये तक देश के सरकारी बैंकों में घोटालों का 47 वर्ष का इतिहास है

एक पुरानी कहावत है जिसका अर्थ है कि किसी संकट को कभी जाया मत होने दो। परंतु इसके लिए साहस की दरकार होती है। यह विकल्प नौकरशाहों, समय काटने वालों या जोखिम से बचने वालों के लिए नहीं है। यहां हम इसका प्रयोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उपरोक्त में से कोई नहीं हैं। वह इंदिरा गांधी के बाद हमारी राजनीति में जोखिम उठाने वाले सबसे बड़े राजनेता हैं। मजेदार बात यह है कि हम उनमें जो भी साहस देखते हैं वह इंदिरा गांधी के ही साहसी और प्रलयंकर कदमों को ही बदलने से जुड़ा होता है।

सन 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद समाजवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बड़े वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की नाटकीय घोषणा की थी। सन 1991 के आर्थिक सुधार तक कई अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। तमाम बीमा कंपनियों के राष्ट्रीयकरण और डेवलपमेंट फाइनैंस इंस्टीट्यूशंस (डीएफआई) पर सरकारी नियंत्रण के साथ इंदिरा गांधी ने देश के औपचारिक वित्तीय जगत को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण वाला बना दिया। उनके इस छद्म समाजवादी और संपत्ति विनाशक समाजवाद ने चुनाव दर चुनाव उन्हें सफलता भी दिलाई। उन्होंने गरीबों को यकीन दिला दिया कि वह अमीरों को नुकसान पहुंचा रही हैं और आगे चलकर उनके लिए कुछ करेंगी।
ऐसा कुछ नहीं हुआ लेकिन गरीब मूर्ख बनते रहे और वह चुनाव जीतती रहीं। आखिरकार सन 1973 में योम किपूर युद्ध के बाद तेल उत्पादक देशों ने इजरायल समर्थक देशों को तेल आपूर्ति रोक दी जिससे तेल संकट खड़ा हुआ। इसके अलावा कुछ अन्य बदलाव भी हुए और भारत में मुद्रास्फीति की दर सन 1920 के दशक के स्तर पर जा पहुंची। उनका खराब आर्थिक प्रबंधन सामने आ गया। तब से 40 साल तक भारत उन झटकों से उबरने की कोशिश कर रहा है। उन्हें खुद इसका एहसास हुआ लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राजनीतिक इतिहास हमें बताता है कि कैसे जोखिम रहित और आकर्षक सरकारी लोकलुभावनवाद निहायत आसान है जबकि इसका विपरीत जोखिमभरा और अलोकप्रिय होता है। हालांकि बहादुर सुधारों ने साहस नहीं खोया। सन 1991 में नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने कुछ काम किया और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने भी। मोदी से कुछ अधिक नाटकीय कदमों की अपेक्षा थी। उन्हें विरासत में वे बैंक मिले थे जिन्हें इंदिरा गांधी ने लगभग दिवालिया स्थिति में अधिग्रहीत किया था। चार वर्ष बाद वह उन बैंकों में पूंजी डाल रहे हैं। देश के अमीर और भ्रष्ट लोगों के फंसे हुए कर्ज के निपटान के लिए करदाताओं का पैसा लगाया जा रहा है। सरकारी क्षेत्र के 21 बैंक अभी भी देश की वित्तीय व्यवस्था के केंद्र में हैं। देश के कुल बाजार में उनकी हिस्सेदारी 55-60 फीसदी है। उनमें से अधिकांश शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय स्टेट बैंक समेत सभी सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण एचडीएफसी बैंक के बाजार पूंजीकरण से कम है। एचडीएफसी बैंक महज 23 साल पहले अस्तित्व में आया है। जबकि सरकारी बैंकों का दशकों और सदियों का इतिहास है। इससे अंदाजा लग सकता है कि सरकारी बैंकों ने किस हद तक संपदा का विनाश किया है।
किसी भी कंपनी के किसी भी अंशधारक से पूछिए। अगर आपका प्रबंधन आपके धन के साथ इतना निर्मम हो तो क्या आप उसके साथ बने रहेंगे? नहीं लेकिन अगर आप सरकार हों तो आप उसमें और अधिक पूंजी डालेंगे। वह पूंजी जो आम नागरिकों की है। इस बीच उन्हें लगता रहेगा कि इससे कभी उनका भला होगा। जैसा कि इंदिरा गांधी के समय हुआ, इस बार भी कुछ नहीं होगा। इससे केवल आभूषण कारोबारी नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे हजारों अमीर अपराधियों का भला होगा। अतीत में भी यही हुआ है और अभी भी यही होगा। यह सबकुछ इतना असमान और गलत है कि उन्हीं डिफॉल्टरों (देनदारी में चूक करने वाले) में से कई अब दोबारा उन कंपनियों को बहुत कम कीमत में खरीदने के दावेदार हैं जिन्हें उन्होंने ही दिवालिया किया। दावोस में प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी वाले सामूहिक चित्रों को देखिए और आपको पता चलेगा कि ऐसे कुछ लोग वहां भी मौजूद हैं। देश का बैंकिंग क्षेत्र समय-समय पर फंसे हुए कर्ज की दिक्कत से दो-चार होता रहता है। आप देश के ऐसे डिफॉल्टरों की सूची पर नजर डालें और आपको कुछ नाम बार-बार देखने को मिलेंगे। ऐसा होने की इकलौती वजह यह है कि उन्हें बार-बार उन सरकारी बैंकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। वे दोबारा बढ़ाचढ़ाकर परियोजना प्रस्ताव पेश करते हैं और भुगतान करने में चूक जाते हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना माफी के काबिल है। एक अन्य बात जो इन सभी सूचियों में साझा है वह यह कि ये सभी बैंक जिन्हें ऐसे लोगों ने लूटा है, सरकारी बैंक ही हैं। यहां तक कि माल्या से भी निजी बैंकों ने अपना पूरा पैसा वापस वसूल कर लिया। इंदिरा गांधी का इरादा चाहे जो भी रहा हो लेकिन बैंक राष्ट्रीयकरण की उनकी योजना गरीबों के काम नहीं आई लेकिन यह कारोबारी जगत को खूब रास आई।
इस पर थोड़ा अलग तरह से नजर डालते हैं। अगर आप किसी अनुपात के आधे पर चुनाव करते हैं। मसलन आपकी ऋण पुस्तिका का आकार, अगर सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण निजी बैंकों के तुलना में आधा भी होता तो भारत सरकार और उसके करदाता कम से कम 10 लाख करोड़ रुपये से अमीर होते। ऐसे में यह कहना गरीबों का मजाक उड़ाना है कि सरकारी बैंकों की हालत इसलिए खस्ता है क्योंकि वे गरीबों को या प्राथमिक क्षेत्र को ऋण देते हैं। इसलिए क्योंकि गरीब और मध्य वर्ग के लोग अपना कर्ज चुका देते हैं। यहां तक कि जब गरीब और खासतौर पर किसान यह कर्ज नहीं चुका पाते तो सरकार बैंकों को पैसा चुकाती है। जाहिर है यह काम चुनाव के मौकों पर वोट के लिए किया जाता है।
फरीद जकारिया ने 13 नवंबर, 2008 को नई दिल्ली में सालाना जवाहरलाल नेहरू स्मृति व्याख्यान दिया था। उन्होंने आर्थिक मंदी के दौर में बचे रहने के लिए देश के बैंकिंग तंत्र की सराहना की लेकिन बतौर मेजबान वहां मौजूदा सोनिया गांधी इंदिरा गांधी की दूरदर्शिता की बात करते हुए अत्यंत भावुक हो गईं। ऐसा लग रहा था मानो भारतीय बैंकों के बचे रहने की इकलौती वजह उनका सरकारी होना था, न कि उनका बढिय़ा नियमन। उन्होंने उसी साल बाद में हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में भी यह बात दोहराई। उन्होंने वहां आए लोगों की चुटकी लेते हुए कहा कि मुझे पता है कि मैं जो कहने जा रही हूं वह आपको पसंद नहीं आएगा। बहरहाल, नरेंद्र मोदी खुद इसी भावना से संचालित हो रहे हैं और यही बात समझ से परे है। नरेंद्र मोदी के बारे में सबसे अधिक चकित करने वाली बात यह है कि वह नेहरू द्वारा किए गए हर काम को उलट देना चाहते हैं। परंतु वह नेहरू की बेटी यानी इंदिरा गांधी की तमाम गलत नीतियों तक को हाथ लगाते हुए शर्माते हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसका सटीक उदाहरण है। सन 1969 में उन्होंने यह कहकर इनका राष्ट्रीयकरण किया कि बैंक केवल अमीरों को कर्ज देते हैं और गरीबों की अनदेखी करते हैं। राष्ट्रीयकरण के 50वें वर्ष में वही बैंक इसलिए बिखर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अमीरों को बहुत अधिक पैसा बिना कोई प्रश्न किए दे दिया और लुट गए। यह विडंबना ही है कि मोदी ने वह नीति जारी ही नहीं रखी है बल्कि वह करदाताओं के 2.11 लाख करोड़ रुपये भी इन बैंकों को दे रहे हैं। पीएनबी महाराष्ट्र की चीनी बेल्ट के किसी नेता का छोटामोटा सहकारी बैंक नहीं है। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक है। हालिया घोटाले से पता चलता है कि दुनिया के कुछ सबसे अमीर चोर वर्षों से इसका दोहन कर रहे थे और वे तमाम जांच प्रक्रिया, निगरानी और अंकेक्षण से बचे रहे। इतनी बड़ी विफलता राष्ट्रीय शर्म का विषय है। यही वजह है कि मोदी को इसे त्याग देना चाहिए। वह इसे बेचकर भुला सकते हैं। आज के दौर में यह लोकप्रिय कदम होगा। इससे उन्हें गांधी परिवार की दूसरी सबसे ताकतवर हस्ती पर इल्जाम लगाने का उचित मौका भी मिलेगा। इस संकट का वह क्या इस्तेमाल करते हैं यह उन पर है। 
Keyword: PNB, Banks, fraud, SBI,
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