बिजनेस स्टैंडर्ड - औपचारिक रोजगार की गणना
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औपचारिक रोजगार की गणना

अजित के. घोष /  February 16, 2018

हाल ही में हुए दो अध्ययनों से पता चलता है कि संगठित क्षेत्र में रोजगार निर्माण अच्छी गति से हुआ है। हालांकि इन अध्ययनों की वैधता पर प्रश्नचिह्न हैं। विस्तार से बता रहे हैं अजित के. घोष 

 
आम धारणा है कि देश की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार की स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि देश में वृद्धि की प्रक्रिया का अगुआ संगठित क्षेत्र रोजगार निर्माण के मामले में कमजोर बना हुआ है। हालांकि हाल ही में किए गए दो अध्ययनों में इस निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि संगठित क्षेत्र की रोजगार निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका रही है। अगर इन अनुमानों को सही माना जाए तो यह भी स्वीकार करना होगा कि संगठित क्षेत्र में औपचारिक और कुल रोजगार को लेकर अतीत में काफी कमतर आकलन किया गया। बहरहाल, इन अनुमानों की वैधता अपने आप में संदेह के दायरे में है। जैसा कि राधिका कपूर ने अपने एक आलेख में कहा और जैसा कि इक्रियर के पत्र में कहा गया ईपीएफओ/ईएसआईसी और एनपीएस के आंकड़ों की प्रकृति को देखते हुए औपचारिक रोजगार पर विश्वसनीय आंकड़े निकालना काफी मुश्किल है। शायद इस वजह से भी आंकड़ों के इन स्रोतों का बहुत अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया। एनएसएसओ के सर्वेक्षण और जनगणना के आंकड़ों के अनुसार औपचारिक रोजगार और संगठित क्षेत्र के रोजगार के अनुमानों की बात करें तो कॉर्पोरेट क्षेत्र में सभी निजी निगम, सरकारी उद्यम और सरकारी प्रतिष्ठान आदि शामिल हैं। असंगठित उद्यम ऐसे निजी उद्यम हैं जो कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत नहीं हैं। संगठित क्षेत्र में संपूर्ण कॉर्पोरेट क्षेत्र तथा उन निजी उद्यमों को शामिल किया जाता है जहां कम से कम 10 कर्मचारी कार्यरत हों। औपचारिक कर्मचारियों में संगठित क्षेत्र के दैनिक वेतनभोगी शामिल होते हैं। इनको कुछ हद तक सामाजिक सुरक्षा हासिल होती है। नियमित-असंगठित कर्मचारी ऐसे नियमित वेतनभोगी कर्मचारी हो हैं जिनको कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। नैमित्तिक कर्मचारियों को रोजाना आधार पर भर्ती किया जाता है और उनको दैनिक भत्ता मिलता है।
 
वर्ष 2004-05 से 2011-12 के बीच रोजगार वृद्धि और उत्पादन वृद्धि के अनुपात को देखें तो कॉर्पोरेट क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के लिए औपचारिक रोजगार और कुल रोजगार का आकलन अलग-अलग किया गया। उसके बाद इन अनुमानों को वर्ष 2011-12 से 2015-16 के बीच उत्पादन वृद्धि के आंकड़ों के साथ मिलाकर देखा गया ताकि साल 2015-16 के लिए औपचारिक रोजगार और कॉर्पोरेट क्षेत्र तथा असंगठित क्षेत्र के कुल रोजगार का अनुमान लगाया जा सके। चूंकि अंतिम प्रासंगिक उत्पादन आंकड़े वर्ष 2015-16 के लिए ही मौजूद हैं इसलिए वर्ष 2017-18 के अनुमान यह मानते हुए लगाए गए कि कॉर्पोरेट क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में वर्ष 2015-16 और 2017-18 में उत्पादन वृद्धि वही रही होगी जो वर्ष 2011-12 और 2015-16 के बीच थी। आखिर में यह माना गया कि संगठित क्षेत्र में सभी नियमित-असंगठित कर्मचारियों की हिस्सेदारी वर्ष 2011-12 और 2017-18 के बीच बिल्कुल नहीं बदली।
 
इन अनुमानों के अनुसार वर्ष 2017-18 में संगठित क्षेत्र में 10.2 करोड़ लोगों को रोजगार मिला लेकिन इनमें से केवल 3.9 करोड़ ही औपचारिक कर्मचारी थे। ध्यान रहे कि असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की तादाद 6.3 करोड़ रही जो आर्थिक समीक्षा के 6.7 करोड़ के अनुमानित स्तर से बहुत अलग नहीं रही। यह तब था जबकि समीक्षा में संगठित क्षेत्र की अलग परिभाषा प्रयोग में लाई गई। परंतु एनएसएसओ सर्वेक्षण से औपचारिक कर्मचारियों की अनुमानित तादाद समीक्षा में जताए गए 6 करोड़ के अनुमान से काफी कम रही। 
 
वर्ष 2011-12 और 2017-18 के बीच औपचारिक रोजगार में 45 लाख की बढ़ोतरी हुई जबकि संगठित क्षेत्र के रोजगार में 2.46 करोड़ का इजाफा हुआ। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2017-18 में संगठित क्षेत्र ने 41 लाख रोजगार तैयार किए जबकि संगठित क्षेत्र में महज 7.5 लाख रोजगार। एनएसएसओ सर्वेक्षण के आंकड़ों से निकला अनुमान आखिर रोजगार निर्माण को लेकर संगठित क्षेत्र के प्रदर्शन के बारे में क्या कहता है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें कुल रोजगार को तस्वीर में शामिल करना होगा। यह आकलन करते समय आबादी के अनुमान वर्ष 2001 और 2011 की जनगणना से लिए गए हैं। श्रमशक्ति और रोजगार के वर्ष 2004-05 और 2011-12 के अनुमान एनएसएसओ के सर्वेक्षण पर आधारित हैं जबकि वर्ष 2015-16 के अनुमान श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित हैं। वर्ष 2017-18 के अनुमान वे अनुमान हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के वयस्क आबादी और हमारे एलएफपीआर (श्रम शक्ति प्रतिभागिता दर) और बेरोजगारी दर के साथ निकाला गया है। एलएफपीआर में इस पूरी अवधि में एलएफपीआर में गिरावट आती रही जबकि बेरोजगारी दर में 2011-12 और 2015-16 में बढ़ोतरी देखने को मिली। हम मानकर चलते हैं कि एलएफपीआर में गिरावट का सिलसिला जारी रहा जबकि बेरोजगारी दर में 2015-16 और 2017-18 के बीच कोई बदलाव नहीं आया।
 
वर्ष 2004-05 और 2017-18 के बीच औपचारिक रोजगार में सालाना 2.4 फीसदी की दर से इजाफा हुआ और संगठित क्षेत्र का रोजगार सालाना 5.3 फीसदी की दर से बढ़ा। जबकि अर्थव्यवस्था में कुल रोजगार 0.6 फीसदी की दर से विकसित हुआ। यानी कुल रोजगार में औपचारिक रोजगार की हिस्सेदारी वर्ष 2004-05 के 6.5 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 8.3 फीसदी हो गई। जबकि संगठित क्षेत्र के रोजगार की हिस्सेदारी समान अवधि में 12 फीसदी से बढ़कर 22 फीसदी हो गई। ऐसे में रोजगार निर्माण को लेकर संगठित क्षेत्र का प्रदर्शन इस अवधि में काफी प्रभावी नजर आता है।
 
बहरहाल, यह प्रदर्शन इतना प्रभावशाली इसलिए दिख रहा है क्योंकि अर्थव्यवस्था में कुल रोजगार वृद्धि बहुत धीमी गति से हुई। वास्तव में यह श्रम शक्ति की अत्यंत धीमी वृद्धि को ही परिलक्षित करता है जो सालाना 0.7 फीसदी रही। इसी वजह से एलएफपीआर में भी गिरावट आई। विश्लेषण से पता चलता है कि घटता एलएफपीआर एक हद तक युवाओं द्वारा लंबे समय तक शिक्षा लेने के चलते समझ में आता है। काफी हद तक गरीबों और अल्पशिक्षित महिलाओं का असंगठित क्षेत्र के अत्यंत खराब गुणवत्ता वाले रोजगार से बाहर होना भी इसकी एक वजह है। यह दूसरा रुझान दिखाता है कि असंगठित क्षेत्र के रोजगार के हालात में बहुत कम सुधार हुआ है। ऐसे में अर्थव्यवस्था में अत्यंत धीमी वृद्धि दर के बारे में कहा जा सकता है कि यह असंगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर तैयार होने की कमी से संबंधित है। इसके लिए संगठित क्षेत्र के पर्याप्त तेज गति से रोजगार नहीं तैयार कर पाने को भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। 
 
दूसरा अहम तथ्य यह है कि संगठित क्षेत्र में तमाम ऐसे रोजगार भी तैयार हो रहे हैं जो अनौपचारिक और खराब गुणवत्ता के हैं। उनकी स्थिति असंगठित क्षेत्र के कामों से बेहतर नहीं है। ये वे दो कारक हैं जो इस दलील को बल देते हैं कि संगठित क्षेत्र रोजगार निर्माण के मामले में बेहतर नहीं रहा है। 
Keyword: employment, jobs,,
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