बिजनेस स्टैंडर्ड - दूसरे बैंकों में भी धोखाधड़ी की आशंका
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दूसरे बैंकों में भी धोखाधड़ी की आशंका

शुभमय भट्टाचार्य /  February 16, 2018

नीरव मोदी मामले की जांच अभी शुरुआती दौर में है लेकिन वित्त क्षेत्र के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि अन्य बैंकों में भी इस तरह की धोखाधड़ी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए हैं क्योंकि कारोबारी विदेशी सौदों के लिए जिस बैंकिंग व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं, उसमें कई खामियां हैं। नीरव मोदी का मामला इसलिए सामने आया क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जनवरी की शुरुआत में नियम में बदलाव किया था। इसके कारण पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ने नीरव मोदी और दूसरे आयातकों से ज्यादा मार्जिन राशि मांगी और उनकी धोखाधड़ी का पता चल गया। संभवत: इस घोटाले के खुलासे का एक और कारण था। माना जा रहा है कि पीएनबी के एक अधिकारी ने नीरव मोदी की कंपनी को अगला लैटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) या बायर्स क्रेडिट जारी करने के बदले में कथित तौर पर रिश्वत मांगी थी। आरबीआई ने इस बारे में पीएनबी से जवाब मांगा था। हाल के घटनाक्रम ने पीएनबी की किसी अन्य सरकारी बैंक का खुद में विलय करने की योजनाओं को फिलहाल विराम लगा दिया है। कम से कम जब तक यह मामला ठंडा नहीं हो जाता है तब तक बैंक की इस योजना का आगे बढऩा मुश्किल है। और इस मामले को शांत होने में अभी समय लगेगा। इससे जुड़ा एक सवाल यह भी है कि कैसे बैंक के दो कर्मचारी इतने लंबे समय तक एक ही जगह काबिज रहे।

 
नियमों में बदलाव
 
आरबीआई ने बैंकों में फंसे कर्ज की पहचान की प्रक्रिया को सख्त बनाने के साथ ही बैंकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाले कारोबारी शब्दों की परिभाषा में भी एकरूपता की मुहिम चलाई। यह प्रक्रिया 2014 से चल रही है और इसके तहत बैंकिंग प्रणाली से जुड़े हर शब्द के अर्थ को पारदर्शी बनाया गया है। 4 जनवरी को केंद्रीय बैंक ने इन शब्दों की एक और सूची भेजी जिसमें अन्य के अलावा नॉन फंड बेस्ड एडवांसेज शामिल था। इनमें बायर्स क्रेडिट या एलओयू भी शामिल था। सामान्य शब्दों में कहें तो यह नीरव मोदी जैसी किसी कंपनी के लिए किसी भारतीय बैंक की तरफ से आयात को फाइनैंस कर रहे विदेशी बैंक को गारंटी है। पीएनबी और दूसरे बैंकों के अधिकारियों ने जब इसे पढ़ा तो उन्हें आभास हुआ कि आरबीआई जल्दी ही इस तरह के कारोबार की बारीकी से जांच शुरू कर देगा। 
 
चूंकि भारतीय बैंकों को पूंजी देने की जरूरत नहीं पड़ती है लेकिन वे ग्राहकों से जमानत (कोलेट्रल) या मार्जिन लेते हैं। लेटर ऑफ क्रेडिट (एलसी) जारी करने के बजाय जमानत या मार्जिन के बिना बायर्स क्रेडिट जारी किए गए, खासकर ऐसे मामलों में जहां कंपनियों के संबंधित बैंक के साथ करीबी रिश्ते थे। पूरी दुनिया में बैंक अपने ग्राहकों को स्टैंड बाई लैटर्स ऑफ क्रेडिट देते हैं जिससे देशों के बीच व्यापार सुरक्षित हो जाता है। अमूमन किसी भी सौदे में 4 पक्ष होते हैं जिनमें दो बैंक, एक खरीदार और एक विक्रेता होता है। कभी कभार एक या अधिक बैंक इस लेनदेन को ज्यादा सहज बनाते हैं। इस पूरी व्यवस्था से सामान विक्रेताओं को यह भरोसा रहता है कि खरीदार की भले ही जो स्थिति हो, उन्हें अपना भुगतान मिलकर रहेगा। स्टैंड बाई शब्द पिछली शताब्दी की शुरुआत में अस्तित्व में आया था जब अमेरिकी बैंकों को विदेशी व्यापार के लिए गारंटी देने से रोका गया था। तब उन्होंने विकल्प के तौर पर स्टैंड बाई शब्द का इस्तेमाल किया था।
भारतीय बैंकों में लगातार बढ़ रहे फंसे कर्ज से चिंतित आरबीआई उनकी गैर-पूंजी उधारी की पूरी-पूरी जानकारी चाहता था। कुछ बैंक अधिकारियों को ऐसा मानना था। 
 
अतिरिक्त मार्जिन राशि
 
इस तरह की रिपोर्ट हैं कि इन्हीं बाध्यताओं के कारण पीएनबी अधिकारियों ने नीरव मोदी की कंपनियों डायमंड्स आर अस, सोलर एक्सपोट्र्स और स्टेलर डायमंड्स से ज्यादा मार्जिन राशि की मांग की। इन कंपनियों ने अपने विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करने के लिए बैंक से बायर्स क्रेडिट के लिए संपर्क साधा था। न तो पीएनबी ने और न ही आरबीआई ने इन आरोपों पर कोई जवाब दिया। एक सरकारी बैंक के पूर्व चेयरमैन ने कहा कि उन्हें इस बात पर आश्चर्य है कि ज्यादा मार्जिन राशि की मांग पर इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। उन्होंने कहा, 'जब भी बायर्स क्रेडिट का आकार बढ़ता है तो नियमित तौर पर ज्यादा मार्जिन मांगा जाता है।' पीएनबी ने सीबीआई के पास दर्ज शिकायत में कहा कि 100 फीसदी नकद मार्जिन की मांग की गई क्योंकि नीरव मोदी की कंपनियों के लिए पूर्व मंजूरी की कोई सीमा नहीं थी। नीरव मोदी की कंपनियों ने ऐसा करने से इनकार किया क्योंकि वे ज्यादा मार्जिन मांगने को रिश्वत समझ रहे थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उन्होंने पहले कोई मार्जिन नहीं दिया था। उन्होंने इस बात पर गौर नहीं किया कि पीएनबी अधिकारी उनकी पुरानी फाइलों को खंगालेंगे। जब बैंक अधिकारियों ने इसकी पड़ताल की तो उनके होश उड़ गए।
 
दूसरे बैंकों में भी  फैला है जाल?
 
गुरुवार को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के अधिकारियों की पूरी टीम दिनभर जूझती रही। उसका काम यह पता करना था कि पीएनबी के अलावा कितने सरकारी बैंकों ने संदिग्ध गारंटी पत्र जारी किए हैं। अधिकारी इस आशंका से चिंतित हैं कि नीरव मोदी की कंपनियों ने जिस व्यवस्था का फायदा पीएनबी में उठाया, उसी को दूसरे बैंकों में भी इस्तेमाल किया हो। अलबत्ता यह आसान काम नहीं है क्योंकि इसके लिए आपको हरेक एलसी का जमानत या मार्जिन राशि के साथ मिलान करना होगा। अधिकारियों का कहना है कि दूसरे बैंकों में इस तरह के घोटाले की संभावना बहुत कम है लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि देश में बैंकिंग क्षेत्र के सबसे बड़े घोटाले को रोकने के लिए पीएनबी में सुरक्षित लेनदेन की कोई तरकीब काम नहीं आई। 
 
जमे रहे दागी अधिकारी 
 
पीएनबी को इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि उसके मानव संसाधन विभाग ने इस मामले में शामिल दो अधिकारियों को इतने लंबे समय तक एक ही जगह क्यों तैनात रखा। बैंक की तबादला नीति के मुताबिक हर अधिकारी का हर 3 साल में तबादला किया जाएगा। अगर अधिकारी प्रोन्नत होता है तो स्वत: ही उसका 3 साल से पहले ही तबादला हो जाएगा। नीरव मोदी की कंपनियों के खातों की देखरेख की अवधि के दौरान इनमें से एक अधिकारी का उप महाप्रबंधक के पद पर प्रमोशन हुआ। सालों तक उन्हें और उनके सहायक को उनके पद से हटाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। एचआर विभाग के एक सूत्र ने कहा कि विदेशी मुद्रा विनिमय या बड़े क्रेडिट मूल्यांकन जैसे विशेष विभागों में काम करने के इच्छुक अधिकारियों को बदलना मुश्किल है। 
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