बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि निर्यात से आय में हो सकती है बढ़ोतरी
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कृषि निर्यात से आय में हो सकती है बढ़ोतरी

नीलकंठ मिश्रा /  February 15, 2018

कृषि क्षेत्र का निर्यात ही एकमात्र ऐसा उपाय है जिसकी मदद से बिना मुद्रास्फीति बढ़े खेती से जुड़ी आय बढ़ाई जा सकती है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
देश में व्यय के संकेतक बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में दो तरह की गतियां नजर आ रही हैं। पहला, ऊपरी स्तर की खपत में स्थिरता है: कारों और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री बढ़ रही है, विमान यात्रियों की तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है कि मुंबई और दिल्ली हवाई अड्डों पर रनवे खाली नहीं रहते और बागडोगरा जैसे दूरदराज हवाई अड्डों पर बैठने की जगह नहीं मिलती।  बहरहाल, व्यापक स्तर पर खपत के संकेतक कमजोर हैं। साल भर की कमजोरी के बाद सीमेंट और इस्पात क्षेत्र मजबूत हुआ है लेकिन साबुन, शैंपू आदि उपभोक्ता वस्तुओं के कारोबार में मंदी बरकरार है। इसका सबसे सटीक उदाहरण खाद्य कीमतें हैं। आधा हिंदुस्तान खाद्यान्न उत्पादक और शेष आधा उपभोक्ता है। वर्ष 2012 के रोजगार सर्वेक्षण के मुताबिक 46 फीसदी रोजगार कृषि क्षेत्र में है। 
 
खाद्य कीमतें उपभोक्ता से उत्पादक को स्थानांतरित होती हैं। खाद्य पदार्थों की उच्च कीमतों का अर्थ है अमीरों से गरीबों की ओर अधिक धन का हस्तांतरण।  देश में कृषि क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य करीब 25 लाख करोड़ रुपये है। अगर यह मान लिया जाए कि इसका 60 फीसदी यानी 15 लाख करोड़ रुपये का उपभोग ऊपरी आधा वर्ग कर लेता है तो कीमतों में 10 फीसदी बढ़ोतरी का अर्थ यह हुआ कि 1.5 लाख करोड़ रुपये की राशि कृषि क्षेत्र में आएगी। अगर खाद्य महंगाई में महज 2 फीसदी गिरावट आती है तो 30,000 करोड़ रुपये हस्तांतरित होंगे। शीर्ष आधे हिस्से में एकत्रित 1.2 लाख करोड़ रुपये की राशि बताती है कि वित्तीय बचत में इजाफा हो रहा है और खपत में भी। इस हस्तांतरण का अभाव भी कमजोर व्यापक खपत की वजह हो सकता है। 
 
खाद्य महंगाई में धीमापन प्रमुख तौर पर अतिरिक्त आपूर्ति के कारण आया। कृषि उत्पादकता में सुधार (सड़क, फोन, बिजली और ऋण की उपलब्धता के चलते) के कारण आपूर्ति बढ़ रही है जबकि खाद्य पदार्थों की मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही है। राजकोषीय अनुशासन ने भी इसमें मदद की है। हालांकि समेकित घाटा ज्यादा होने के कारण चिंता बरकरार है। जीडीपी के 6 फीसदी के बराबर समेकित घाटे के साथ भारत दुनिया में सर्वाधिक घाटे के प्रतिशत वाले देशों में शुमार है लेकिन फिर भी यह चार दशकों का सबसे निचला स्तर है। 
 
भारत में ऐसी स्थितियां दुर्लभ हैं। सन 1960 के दशक में जहां कृषि उत्पादन में सालाना आर्थिक वृद्घि 2.5 फीसदी थी, वहीं औसत सालाना मूल्य वृद्घि 7.5 फीसदी रही। ऐसे में अपेक्षाकृत कमजोर उत्पादन वृद्घि के बावजूद कृषि की समेकित आय 10 फीसदी सालाना की दर से बढ़ती रही। सन 1951 के बाद से कृषि क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी की एक वजह यह भी रही है।  खाद्य कीमतों में स्थायी उच्च वृद्घि का भी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर होता है। मसलन मुद्रास्फीति, उच्च ब्याज दर और मुद्रा की कमजोरी आदि इसके उदाहरण हैं। 
 
परंतु खाद्य मूल्य महंगाई के भी अपने प्रभाव हैं। अगर आधी श्रम शक्ति की आय वृद्घि की दर धीमी होगी तो उनकी खपत भी कमजोर होगी।  उदाहरण के लिए वे अपने घरों में नए कमरे नहीं बनाएंगे या कच्चे मकान से पक्के मकान का रुख नहीं करेंगे। वित्तीय बचत को ऊपरी आधे वर्ग से नीचे के लोगों की खपत बढ़ाने में प्रयोग करने की कोई प्रभावी व्यवस्था हमारे पास नहीं है। इस सिलसिले में न तो ऋण की व्यवस्था है और न ही वैकल्पिक रोजगारों की। इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। हम हाल में किसानों के विरोध प्रदर्शन में यह देख चुके हैं। आगामी आम चुनाव करीब हैं और सरकार को इनमें से कुछ चिंताओं को दूर करना होगा। 
 
खासतौर पर यह देखते हुए कि खाद्य कीमतों के चलते ऐसे हस्तांतरण तय हो सकते हैं जो सरकार द्वारा तय किसी भी लक्ष्य से बड़े हों। साफ कहें तो अमीरों से संपत्ति को गरीबों की ओर स्थानांतरित करने के दो तरीके हैं- कर बढ़ाना और फिर विभिन्न सरकारी योजनाओं की मदद से, प्रत्यक्ष हस्तांतरण द्वारा या खाद्य कीमतें बढ़ाकर।  पहली स्थिति में फंड का प्रवाह सरकार के माध्यम से होता है और दूसरी स्थिति में कृषि बाजार के जरिये। अगर फंड होता तो भी सरकार के लिए अरबों रुपये व्यय करना आसान नहीं होता। शायद यह बाधा भी एक वजह है कि केंद्र सरकार ने आने वाले वर्ष के व्यय बजट में केवल 9 फीसदी इजाफे की बात कही है। यह नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर से भी कम है और सरकारी व्यय और जीडीपी अनुपात एकदम निचले स्तर पर है।
 
सरकार खाद्य कीमतें बढ़ाने का प्रयास कर रही है। बजट भाषण में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को ऐसे तय करने की बात कही गई है ताकि किसानों को उपज लागत से कम से कम 50 फीसदी अधिक दाम मिलें। इस दिशा में प्याज निर्यात पर न्यूनतम निर्यात मूल्य प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया है और चीनी के आयात शुल्क में इजाफा किया गया है ताकि घरेलू उद्योग का बचाव है।  ये कदम कितने प्रभावी साबित होंगे इस पर बहस हो सकती है। जैसा कि कई लोगों ने देखा भी होगा, 50 फीसदी का मार्जिन शायद केवल धान का मूल्य बढ़ाने में मददगार हो क्योंकि गेहूं, तुअर दाल और चीनी जैसी अन्य प्रमुख उपज का एमएसपी पहले ही तय सीमा से ऊपर है। कुल कृषि उत्पादन में चावल की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है और कुल उत्पादित चावल में से केवल एक तिहाई ही सरकार खरीदती है। इससे एमएसपी का प्रभाव सीमित हो जाता है। बीते कुछ सालों में चावल उत्पादन 11 करोड़ टन का स्तर पार कर चुका है और खुदरा कीमतें एमएसपी से ऊपर निकल गई  हैं। अत्यधिक आपूर्ति वाली जिंसों की कीमतों को संभालना मुश्किल है। 
 
प्याज पर निर्यात प्रतिबंध समाप्त करने से कीमतों में उछाल आई लेकिन बढिय़ा उत्पादन और सीमित निर्यात संभावनाओं के कारण व्यापक असर देखने को नहीं मिला। लाखों कृषि श्रमिकों को यही सलाह दी जाती है कि वे कौशल विकास करके गैर कृषि रोजगार अपनाएं। यहां अंतिम लक्ष्य तो एकदम स्पष्ट है लेकिन राह स्पष्ट नहीं है।  ऐसे में कृषि निर्यात बढ़ाना ही एकमात्र स्थायी हल है जिसके जरिये बिना महंगाई के कृषि क्षेत्र और राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। घरेलू क्षेत्र के लिए खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात की मांग से भी रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। आय में ऐसी बढ़ोतरी से विनिर्मित वस्तुओं की मांग भी बढ़ेगी। इससे विनिर्माण को बहुप्रतीक्षित गति मिलेगी। हाल के महीनों में कृषि निर्यात को लेकर सरकार की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है जो काबिले तारीफ है। हालांकि इसका प्रभाव नजर आने में कुछ समय लग सकता है।
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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