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रेल आईपीओ से बिक्री लक्ष्य पूरा करेगी सरकार

शाइन जैकब और अरूप रॉयचौधरी / नई दिल्ली February 14, 2018

वित्त वर्ष 2017-18 में 1 लाख करोड़ रुपये के संशोधित विनिवेश लक्ष्य को पूरा करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार दो रेल कंपनियों- आईआरएफसी और आरआईटीईएस- के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) को 31 मार्च से पहले लाने की प्रक्रिया में है। आरआईटीईएस के आईपीओ में केंद्र सरकार की करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी शामिल होगी जबकि आईआरएफसी के आईपीओ के जरिये सरकार अपनी 10 फीसदी हिस्सेदारी बेच सकती है।  इसके तुरंत बाद 'पिग्गी बैक' बिक्री भी की जाएगी जिसके तहत कंपनी अतिरिक्त शेयर जारी करेगी ताकि कंपनी में निवेशकों की हिस्सेदारी 15 फीसदी तक हो सके। बिजनेस स्टैंडर्ड को पता चला है कि यदि ये दोनों आईपीओ 924 अरब रुपये और 1 लाख करोड़ रुपये के बीच 75 अरब रुपये के अंतर को पाटने में विफल रहे तो केंद्र सरकार अपने भारत-22 ईटीएफ फंड की पेशकश भी कर सकती है। जहां तक आईआरएफसी का सवाल है तो उसके कर दायित्व संबंधी लंबित मामले को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि केंद्र सरकार उसे 31 मार्च से पहले शेयर बाजार में सूचीबद्ध करा पाएगी। हालांकि कंपनी मामलों के मंत्रालय ने अब कंपनी को 63.92 अरब रुपये की संचित कर देनदारी से छूट दी है जिसे कंपनी की शुद्ध हैसियत में जोड़ा जाएगा। 
 
विनिवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम) और रेल मंत्रालय के विभिन्न सूत्रों के अनुसार, कर देनदारी संबंधी विवाद के निपटने के साथ ही रेलवे की इस सहायक इकाई को जल्द ही सूचीबद्ध कराया जाएगा। रेलवे की सहायक इकाइयों के बीच आईआरएफसी को सबसे आकर्षक माना जा रहा है और पिछले साल मार्च के अंत तक उसके पास 1.52 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्ति थी जिसमें 8,998 लोकोमोटिव, 47,825 सवारी कोच और 2,14,456 डिब्बे के लिए अब तक का वित्तपोषण शामिल हैं। इसके अलावा आईआरएफसी ने रेलवे के अन्य उपक्रमों (रेल विकास निगम लिमिटेड और रेलटेल कॉरपोरेशन) को भी 36.12 अरब रुपये मुहैया कराया और क्षमता विकास कार्यों पर करीब 20.78 अरब रुपये खर्च किए हैं। कर देनदारी में छूट मिलने से आईआरएफसी को 630 अरब रुपये से अधिक के अतिरिक्त ऋण जुटाने में मदद मिलेगी। सरकार के अनुसार, इस छूट के बाद आईआरएफसी को किसी पूंजी निवेश की दरकार नहीं होगी। आईआरएफसी को लंबित कर देनदारी का सामना पड़ा क्योंकि उसका अवमूल्यन मुनाफे से कहीं अधिक हो गया था। कंपनी ने सामान्य आकलन के तहत कर का भुगतान नहीं किया लेकिन उसने 21 फीसदी मैट का भुगतान किया था। इसके अलावा उसे 35 फीसदी लंबित कर देनदारी के लिए भी एक प्रावधान करना था। इस प्रकार कंपनी के बहीखाते पर कुल कर प्रावधान 56 फीसदी हो चुका था जो अब घटकर 21 फीसदी रह जाएगा।
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