बिजनेस स्टैंडर्ड - श्रम कानून सुधार का बड़ा अवसर
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श्रम कानून सुधार का बड़ा अवसर

अपराजिता गुप्ता /  February 13, 2018

केंद्रीय स्तर पर सरकार श्रम सुधार के लगातार प्रयास कर रही है। इस बीच जम्मू कश्मीर राज्य ने इस संबंध में एक नई राह दिखाई है। विस्तार से बता रही हैं अपराजिता गुप्ता

 
मैं राज्य के लिए समान रोजगार संहिता के गठन का प्रस्ताव रखता हूं जिसमें राज्य में लागू सभी श्रम कानून शामिल हों। यह प्रस्तावित रोजगार संहिता ऐसी होनी चाहिए जो घरेलू और कृषि क्षेत्र के श्रमिकों को छोड़कर अन्य तमाम कामगारों के लिए रोजगार और सेवा की शर्तों का निर्धारण करे। 
 
इसके अलावा इसे एक मजबूत, स्वतंत्र और अलहदा श्रम न्याय व्यवस्था का खाका भी खींचना चाहिए।  जम्मू कश्मीर के वित्त मंत्री ने वर्ष 2018-19 के बजट भाषण में यह बात कही। उनका यह वक्तव्य इतिहास में दर्ज होगा क्योंकि इनके जरिये श्रम सुधारों के एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। मौजूदा श्रम कानूनों से जुड़ी समस्याओं के बारे में अक्सर चर्चा होती है। पहली बात तो यह कि राष्टï्रीय और राज्य स्तर पर कई श्रम कानून हैं। इसके लिए विधायी शक्तियों का संवैधानिक बंटवारा जिम्मेदार है। अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे श्रमिकों को नियमित करने वाले अलग-अलग कानूनों के कारण इसमें दोहराव भी है। इसके अलावा भीषण दुर्घटना अधिनियम 1855, श्रम संगठन अधिनियम 1926, वेतन भत्ते भुगतान अधिनियम 1936, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 आदि जैसे कई कानून ऐसे हैं जो आजादी के पहले के हैं। चूंकि उनको एक अलग जमाने में बनाया गया था इसलिए उनमें संशोधन किए जा रहे हैं। 
 
कई लोगों को तो यह भी लगता है कि आजादी के बाद बने श्रम कानूनों में भी बदलाव का वक्त आ गया है।  कुछ लोग इस बारे में संकेत करते हैं कि बाहरी लोगों को श्रम संगठनों का हिस्सा बनने देने और ऐसे संगठनों की बहुलता की वजह से भी दिक्कत पैदा हो रही है। वहीं कई अन्य लोगों का कहना यह भी रहा है कि श्रमिकों की छंटनी और उपक्रम की बंदी में दिक्कत का सामना करना पड़ता है।  उनकी दलील है कि कठोर श्रम कानूनों की बदौलत देश में औपचारिक क्षेत्र में नए रोजगार तैयार करने में दिक्कत आ रही है। वहीं उद्योग धंधे अनुबंधित श्रम की ओर रुख कर रहे हैं और वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा की मानें तो नियामकीय नजर से बचने के लिए वे अपना आकार छोटा रखते हैं। ऐसा करने से श्रमिकों का संरक्षण कम होता है। सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों पर इन कानूनों के लागू होने का एक अलग मसला है। फिलहाल, उनमें से अधिकांश उन कानूनों का प्रयोग कर रहे हैं जो दुकानों और प्रतिष्ठïानों से जुड़े हैं। अनुपालन की समस्या अपनी जगह है। कई प्राधिकार और प्रक्रियाएं हैं जिनका अनुसरण करना होता है। विवाद निस्तारण की धीमी प्रक्रिया को एक अन्य गतिरोध माना जा रहा है। अतीत में भी इन कानूनों में सुधार और इनके समावेशन के प्रयास किए गए हैं। उदाहरण के लिए सन 1968 में राष्टï्रीय श्रम आयोग ने एक कानून का मसौदा तैयार किया। ऐसी ही कवायद सन 1994 में राष्टï्रीय श्रम कानून संघ ने फ्रेडरिक एबर्ट स्टिफ्टंग नामक जर्मन संगठन के साथ मिलकर की। सन 2002 में राष्टï्रीय श्रम आयोग ने श्रम कानून सुधार पर अपनी रिपोर्ट दी। फिलहाल केंद्रीय स्तर पर सुधार का काम श्रम मंत्रालय के  जिम्मे है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में कुछ कानूनों में सुधार हुआ है जबकि अन्य प्रक्रियाधीन हैं। 
 
जम्मू कश्मीर ने हाल ही में जो घोषणा की है वह इस दिशा में एक कदम आगे बढ़कर ऐसा मॉडल प्रस्तुत करता है जिसका अनुकरण किया जा सकता है। चूंकि राज्य की प्रस्तावित रोजगार संहिता अब तक सामने नहीं आई है इसलिए यह देखना रोचक होगा कि यह कैसी होती है। पहली बात तो यह कि एकदम नई संहिता का निर्माण शानदार विचार है। तमाम श्रम कानूनों को एक में जोडऩे के बजाय सभी श्रम कानूनों के प्रावधानों पर नए सिरे से विचार कर उनकी अहमियत आंकी जानी चाहिए। पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को सुधारा जाना चाहिए। दूसरी बात, एक संहिता होने के चलते श्रमिकों, नियोक्ताओं, श्रम संगठनों, श्रम अधिकारियों और अन्य लोगों को एक ही स्थान पर सारी जानकारी मिल जाएगी। 
 
तीसरा, इस कानून में केवल मुख्य प्रावधान शामिल होने चाहिए। वे प्रावधान भी जिनको अन्य नियम बनाने वाले प्राधिकार को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता हो। इससे काम आसान होगा। चौथी बात, प्रधानमंत्री ने अभी हाल ही में लोगों के लिए जीवन जीने की सहजता के बारे में बात की। इस बात को ध्यान में रखते हुए कानून ऐसा होना चाहिए कि लोगों को आसानी से समझ में आ जाए। 
 
फिलहाल कई श्रमिक और बाज दफा नियोक्ता भी श्रम कानूनों को बिना कानूनी मदद के समझ नहीं पाते। अमेरिका में कानून की जटिल भाषा को खत्म करने के लिए बाकायदा आंदोलन चला। ब्रिटेन ने भी ऐसा ही किया।  अब भारत की बारी है कि वे श्रम कानूनों को सहज भाषा में तैयार करे। सुलझा हुआ मसौदा होने से उनकी व्याख्या से जुड़ी दिक्कतें भी कम होंगी।  पांचवीं बात, हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संबद्ध पक्षकारों मसलन श्रमिकों, कर्मचारियों, श्रम संगठनों के हितों में उचित संतुलन कायम किया जा सके। उदाहरण के लिए श्रमिकों के पक्ष में ज्यादा झुकाव या कारोबारियों के पक्ष में बहुत ज्यादा लचीलापन दोनों ही स्थितियां अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं हैं। छठा, कुछ विचार जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर तमाम कर्मचारियों को दायरे में रखना, रोजगार के न्यूनतम मानक निर्धारित करना, लचीलापन कायम रखना, प्राधिकारों और प्रक्रियाओं के दोहराव को कम से कम करना आदि ऐसी ही कुछ बातें हैं। इसके अतिरिक्त अगर वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में दिए गए सुझाव को भी ध्यान में रखना चाहिए। सुझाव में कामगारों को बेहतर विकल्प देने की बात शामिल है ताकि सेवा प्रदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल बन सके। इससे भी काफी मदद मिलेगी। 
 
(लेखिका पेशे से अधिवक्ता और नीति आयोग से जुड़ी हुई हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं। )
Keyword: labor, reform, law, policy,,
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