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अचानक गिरावट से न घबराएं नए निवेशक

संजय कुमार सिंह /  February 11, 2018

वर्ष 2017 बाजारों के लिए ऐसा साल था जब कम उतार-चढ़ाव हुआ। बगैर किसी बड़ी गिरावट के शेयरों में तेजी बरकरार रही। तेजी के बाजार में बड़ी तादाद में नए निवेशकों ने इक्विटी म्युचुअल फंडों में दांव लगाया। इन निवेशकों के लिए मौजूदा गिरावट उतार-चढ़ाव के बीच संभलने का पहला मौका है। हालांकि चिंतित होना स्वाभाविक है, लेकिन नए निवेशकों को ऐसे समय में गलतियां कर अपनी परेशानियां नहीं बढ़ाना चाहिए। बाजारों में ताजा गिरावट का मुख्य कारण वैश्विक कारकों को माना जा रहा है। एडलवाइस म्युचुअल फंड में मुख्य कार्याधिकारी राधिका गुप्ता का कहना है, 'यह स्थिति अमेरिका में ब्याज दरें बढऩे की आशंका से पैदा हुई है।' मुद्रास्फीति से जुड़ी चिंताओं की वजह से अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल बढ़ा है। ऐसी आशंका बन रही है कि फेडरल रिजर्व अमेरिका में पहले की तुलना में अधिक तेजी से ब्याज दरें बढ़ा सकता है। 

 
जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो पूंजी का रुझान शेयरों से ऋण यानी इक्विटी से डेट की ओर होता है। भारत में इक्विटी पर 10 प्रतिशत दीर्घावधि पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर लगने से धारणा प्रभावित हुई है। दिसंबर में उपभोक्ता मुद्रास्फीति के 17 महीने की ऊंचाई पर पहुंचने से यह चिंता पैदा हुई है कि आरबीआई जल्द ही दरों में वृद्घि कर सकता है। गिरावट के लिए एक और बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि भारतीय बाजारों का दीर्घावधि औसत मूल्यांकन बहुत बढ़ गया था और इसलिए गिरावट तय थी। 
 
नए निवेशकों को विश्लेषकों की पहली सलाह यही है कि वे मौजूदा स्थिति को देखकर कतई नहीं घबराएं। गुप्ता का कहना है, 'इक्विटी उतार-चढ़ाव वाला परिसंपत्ति वर्ग है। घबराएं नहीं और बाजार में गिरावट के कारण जल्दबाजी में निवेश से बाहर न निकलें। यदि आप ऐसा करते हैं तो फिर से आ सकने वाली तेजी का लाभ नहीं उठा पाएंगे। लिहाजा, दीर्घावधि निवेश के अपने नजरिये के साथ डटे रहें।' वित्तीय योजनाकारों की भी यही सलाह है। मुंबई स्थित वित्तीय योजनाकार अर्णव पंड्ïया कहते हैं, 'सबसे बड़ी गलती होगी एसआईपी बंद कर देना या बाजारों की गिरावट से डरकर इक्विटी से अपना पैसा निकाल लेना।' वह कहते हैं कि यदि गिरावट कुछ दिन और बनी रहती है तो निवेशकों को नुकसान के साथ इक्विटी नहीं बेचनी चाहिए। अगर आपका लक्ष्य दीर्घावधि (मान लीजिए कि पांच या सात वर्ष) है तो अपने परिसंपत्ति आवंटन के साथ बने रहें। बाजार के इन हालात में आपका सबसे अच्छा कदम यह हो सकता है कि आप कुछ न करें और चुपचाप बैठे रहें। पंड्ïया कहते हैं, 'जब तक आपका नुकसान घाटे से फिर लाभ की स्थिति में न आ जाए तब तक बैठे रहिए और निवेश को देखते रहिए।'
 
उतार-चढ़ाव का अनुभव होने से नए निवेशकों को यह भी अंदाज लगेगा कि उनकी जोखिम सहन करने की कितनी क्षमता है? तेजी वाले बाजार में ज्यादातर निवेशक उतार-चढ़ाव से जूझने में अपनी क्षमता को लेकर ज्यादा ही उत्साह दिखाते हैं। गिरावट वाला बाजार ज्यादा सटीक आकलन का अवसर मुहैया कराता है। गुप्ता की सलाह है, 'जोखिम उठाने की अपनी क्षमता के हिसाब से ही निवेश करें। हर किसी को इक्विटी में 100 प्रतिशत निवेश नहीं करना चाहिए। म्युचुअल फंडों के पास कई निवेश योजनाएं होती हैं जो 30, 50 या 70 प्रतिशत इक्विटी निवेश की पेशकश करती हैं। उतने ही निवेश से शुरू करें जो आपके लिए सही हो और फिर धीरे धीरे इक्विटी निवेश बढ़ाएं।' 
 
अगर आप एलटीसीजी कर के असर को लेकर चिंतित हैं तो यह याद रखिे कि इससे आपका प्रतिफल सिर्फ 10 प्रतिशत तक कम होगा। मिंटवॉक के सह-संस्थापक निखिल बनर्जी कहते हैं, 'लंबी अवधि के दौरान इक्विटी किसी अन्य परिसंपत्ति वर्ग की तुलना में ज्यादा आकर्षक साबित होगी।' पंड्ïया कहते हैं कि अगली बार जब निवेशक अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करें तो उन्हें इस कर की वजह से होने वाली कमी की भरपाई के लिए अधिक निवेश करना चाहिए। कॉरपोरेट आय में सुधार शुरू होने के साथ ही बाजारों के महंगा होने की समस्या भी दूर हो सकती है। 
 
कुछ निवेशक इस गिरावट में और निवेश करके लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन अल्पावधि लाभ के लिए उन्हें बाजार में कूदने से फिलहाल परहेज करना चाहिए। बनर्जी कहते हैं, 'अगर आपके पास अतिरिक्त पूंजी है तो लंबी अवधि के लिहाज से उसे एसआईपी के जरिये निवेश करें।'
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