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मालदीव को लेकर चीन के साथ लडऩे से होगी राष्ट्रहित की पूर्ति ?

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  February 09, 2018

मालदीव में आज जो कुछ हो रहा है उसके संकेत तो पिछले साल 6 मई को ही मिल गए थे जब स्थानीय परिषद चुनाव के नतीजों की घोषणा की गई थी। मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन को भारी जीत मिली और सभी पर्यवेक्षकों ने इसे इस साल के आखिर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की झलक बताया था। परिषद चुनावों में एमडीपी ने 653 में से 300 से अधिक सीटें जीतीं।  राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स (पीपीएम) की अगुआई वाले सत्तारूढ़ गठबंधन ने चार बार इस चुनाव को स्थगित किया। इन चुनावों को जनवरी 2017 में होना था। लेकिन जब चुनाव हुए तो सत्तारूढ़ गठबंधन ने इसमें अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उसके लिए यह हार झटका देने वाली थी क्योंकि राष्ट्रपति की पत्नी फातिमा इब्राहीम इन चुनावों में जीत के साथ खुद को नवंबर 2018 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव में प्रत्याशी के तौर पर पेश करने की उम्मीद कर रही थीं। 

 
वर्ष 2008 तक मालदीव में एक ही पार्टी का राज था। राष्ट्रपति ही प्रशासनिक सेवा, सुरक्षा बलों और न्यायपालिका का सर्वेसर्वा था। साथ ही संवैधानिक रूप से नियुक्त सांसद के एक समूह के जरिये संसद पर भी उसका नियंत्रण था। मालदीव में 30 साल तक मौमून अब्दुल गयूम का शासन रहा।  इसे मोहम्मद नशीद ने चुनौती दी। उन्होंने निर्वासन में एमडीपी का गठन किया और वर्ष 2008 में 54 फीसदी मतों के साथ राष्ट्रपति चुनावों में जीत दर्ज की। देश में नया संविधान बनाया गया लेकिन 2012 में सुरक्षा बलों की मदद से नशीद को अपदस्थ कर दिया गया और घर में ही नजरबंद कर दिया गया। 2013 में फिर से राष्ट्रपति चुनाव हुए जिसमें पूर्व राष्ट्रपति गयूम के सौतेले भाई अब्दुल्ला यामीन ने जीत दर्ज की। हालांकि नशीद के समर्थकों ने चुनावों में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इसका कारण था कि अब्दुल्ला ने पद का लालच देकर नशीद के गठबंधन के कई नेताओं को अपनी तरफ मिला लिया था। इस पूरे घटनाक्रम में नाटकीय मोड़ तब आया जब कुछ ही घंटे बाद नशीद ने भारतीय उच्चायोग में शरण मांगी और भारत को मालदीव की आंतरिक राजनीति में एक कारक बना दिया। वह नौ महीने जेल में रहे। उन पर आतंकवाद का मुकदमा चलाया गया और दोषी करार देकर 13 महीने जेल की सजा सुनाई गई। उन्होंने इलाज के लिए ब्रिटेन जाने की अनुमति मांगी और फिर वहां जाकर शरणार्थी का दर्जा हासिल कर लिया। फिलहाल वह श्रीलंका से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। अगर वह स्वदेश लौटते हैं तो उन्हें गिरफ्तार करके अपनी बाकी सजा पूरी करने के लिए जेल में डाल दिया जाएगा। 
 
एमडीपी के शीर्ष नेतृत्व में एक तरह से खालीपन पैदा हो गया है। गिरफ्तारी के डर से पार्टी के कई नेता कोलंबो, अमेरिका और ब्रिटेन में रह रहे हैं। इस बीच यामीन ने अपनी स्थिति लगातार मजबूत की, कई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को जेल में ठूस दिया और बाकियों को ठिकाने लगा दिया। यामीन ने मालदीव की विदेश नीति को भी व्यापक बनाने की कोशिश की। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सितंबर 2014 में मालदीव की यात्रा की जो दक्षिण एशिया की उनकी पहली यात्रा थी। इससे उन्होंने भारत के साथ शक्ति संतुलन का संकेत दिया। शी के साथ 100 कारोबारियों का प्रतिनिधिमंडल भी आया था। चीनी राष्ट्रपति ने चीन और मालदीव को जोडऩे के लिए मेरीटाइम सिल्क रोड कनेक्टिविटी का भी विचार आगे बढ़ाया। इसके लिए जमीन की जरूरत थी लेकिन मालदीव के संविधान में देश की जमीन को किसी विदेशी नागरिक के हवाले नहीं किया जा सकता था लेकिन 99 साल तक पट्टïे पर देने की अनुमति थी। इसमें संशोधन करके एक अरब डॉलर से अधिक निवेश करने वाले विदेशी नागरिकों को परियोजना स्थल के भीतर जमीन खरीदने का अधिकार दे दिया गया। 
 
हालांकि इसमें एकमात्र शर्त यह थी कि पूर्ण परियोजना का कम से कम 70 फीसदी हिस्सा समुद्र पाटकर बनाई गई जमीन होनी चाहिए। मालदीव आने वाले चीनी पर्यटकों की संख्या 2010 में 1.2 लाख थी जो 2015 में 3.59 लाख हो गई। मालदीव टूरिस्ट प्रमोशन बोर्ड का दावा है कि 2016 में करीब 5 लाख चीनी पर्यटक मालदीव आए। मालदीव और चीन के बीच हुए दूसरे समझौतों ने भारत को चिंता में डाल दिया है। इनमें ताजा मामला यह है कि मालदीव ने आईहैवन परियोजना के तहत अपने प्रमुख हवाई अड्डïे को विकसित करने काम चीन को सौंपने की पेशकश की है। यह यामीन के आर्थिक कार्यक्रम की अहम योजना है। इसमें एक हवाई अड्डïा, एक हार्बर, बंकरिंग सर्विसेज, रियल एस्टेट, शॉपिंग मॉल और रिजॉर्ट का विकास शामिल है। पहले इस हवाई अड्डïे को बनाने का ठेका भारतीय कंपनी जीएमआर को दिया गया था लेकिन बाद में इसे रद्द कर दिया गया। जीएमआर इसे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ के पास ले गई जिसने भारतीय कंपनी के पक्ष में फैसला दिया। 
 
यामीन 2016 में भारत आए थे और भारत ने उन्हें मान्यता देकर नशीद के प्रति अपने झुकाव को दुरुस्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यामीन ने एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें बंदरगाहों के विकास, वहां की सेनाओं को प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, उपकरणों की आपूर्ति और सामुद्रिक निगरानी की बात कही गई थी। यह सबकुछ किसी नाटकीय बदलाव से कम नहीं था। करीब एक साल पहले ही भारत ने खुले तौर पर नशीद प्रशासन का पक्ष लिया था। भारत ने नशीद का तख्ता पलटने के लिए मालदीव पर प्रतिबंध लगाने के वास्ते राष्ट्रमंडल मंत्रिस्तरीय समूह में लॉबिंग की थी। इस पर यामीन ने राष्ट्रमंडल छोड़ दिया। भारत ने सैन्य हस्तक्षेप की नशीद की अपील पर कोई कार्रवाई नहीं की है। कई हलकों से सैन्य हस्तक्षेप की मांग उठ रही है लेकिन सभी भारतीयों को खुद से यह पूछना चाहिए कि क्या मालदीव को लेकर चीन के साथ लड़ाई लडऩे से राष्ट्रहित की पूर्ति होगी?
 
Keyword: Maldives, emergency,,
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