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वित्तीय एसईजेड के क्षेत्र में कैसे बढ़ें आगे?

अजय शाह /  February 08, 2018

केवल विनियमन से काम नहीं चलने वाला है बल्कि ऐसे संस्थान बनाने होंगे जो निजी क्षेत्र की कंपनियों को निर्यात क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का अवसर दें और वैश्विक ग्राहकों में भरोसा पैदा करें। बता रहे हैं अजय शाह

 
अंतरराष्ट्रीय पहलू देश की वित्तीय और आर्थिक नीति के केंद्र में हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं के साथ एक रक्षात्मक हिस्सा स्थानीय बाजारों के अवसर कम होने का है। साथ ही विश्व स्तर पर एक बड़ी भूमिका निभाने का अवसर भी है। वित्तीय नियमन, पूंजी नियंत्रण और कराधान में कमियों से हमारी व्यवस्था पंगु है। इसलिए सबसे बेहतर यही होगा कि हम इन समस्याओं को हल कर सकें। दूसरा बेहतर हिस्सा है वित्तीय एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) स्थापित करना। बजट भाषण में इस संबंध में कई बातें कही गईं।
 
वित्तीय सेवा निर्यात के दो हिस्से हैं। रक्षात्मक हिस्सा दो प्रमुख वित्तीय उत्पादों निफ्टी और रुपये में भारत की हिस्सेदारी को लेकर चिंतित रहता है। वैश्विक ग्राहकों को यह स्वतंत्रता है कि वे इन दोनों से जुड़े अपने कारोबार भारत ले जाएं या अन्य किसी जगह। हमारी बाजार हिस्सेदारी सन 2007 में 100 फीसदी से कम होकर आज बमुश्किल 50 फीसदी बची है। वर्ष 2016 में आईजीआईडीआर ने अनुमान लगाया था कि अगर हम रुपये के कारोबार में दोबारा रसूख हासिल कर लें तो इससे निर्यात राजस्व में सालाना 62,000 करोड़ रुपये का लाभ होगा। इसी तरह निफ्टी का काम देश से बाहर जाने से भी बड़े पैमाने पर राजस्व हानि हो रही है।
 
परंतु बड़े अवसर तो निफ्टी और रुपये से परे संपूर्ण वैश्विक वित्तीय गतिविधियों में ही हैं। भारत वैश्विक बाजार में सोने और 10 कृषि जिंसों में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। यह सरकारों, फर्मों और श्रीलंका, बांग्लादेश अथवा केन्या के लोगों की वित्तीय गतिविधियों का केंद्र हो सकता है। भारत येन के कारोबार के लिए विश्व व्यापार में प्रतिस्पर्धा कर सकता है। लेखा, विधि, गणित, कंप्यूटर विज्ञान और जोखिम लेने की भारतीयों की क्षमता का मुकाबला बहुत ज्यादा देश नहीं कर सकते हैं इसलिए भारत में संभावनाएं बहुत हैं।
 
वैश्विक वित्तीय बाजार में निर्यात के लिए एक मजबूत सरकार और क्षमता संपन्न श्रमशक्ति की आवश्यकता है। श्रमिक शक्ति के मामले में भारत बेहतर स्थिति में है जबकि वित्तीय नियमन और कराधान केमामले में कमजोर। निफ्टी और रुपये का कारोबार भारत का है लेकिन पूंजी नियंत्रण, वित्तीय नियमन और कर आदि के हमारे कायदे ठीक नहीं। जिस वक्त जसवंत सिंह वित्त मंत्री थे, उन्होंने इस दिशा में पहल शुरू की थी कि मुंबई को लंदन का प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए किन चीजों की आवश्यकता है? सन 2007 में आई पर्सी मिस्त्री रिपोर्ट इसी से संबंधित थी।
 
इसके बाद 2011 में प्रणव मुखर्जी ने वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) का गठन किया और 2013-15 में भारतीय वित्तीय संहिता का मसौदा तैयार हुआ। वित्त मंत्रालय ने वित्तीय तंत्र की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा पर एक स्थायी समिति का गठन किया। इसकी अध्यक्षता रवि नारायण के पास थी। इसका लक्ष्य था देश की वृहद वित्त नीति को ठीक करना। सन 2014 के बाद से एफएसएलआरसी के कुछ हिस्सों में प्रगति हुई है। मुद्रास्फीति को लक्षित करना, सेबी और एफएमसी का विलय, फेमा में संशोधन, एफएसआरसीए की नियुक्ति प्रक्रिया, एफआरडीआई विधेयक आदि इसके उदाहरण हैं। परंतु इनसे निर्यात प्रतिस्पर्धा हासिल नहीं हुई। वित्तीय एजेंसियों के लक्ष्य, जवाबदेही और प्रशासनिक तंत्र में कमियां बनी रहीं। अनिवासी भारतीय भारतीय वित्तीय नियामकों, कर नीति आदि से बचने के मामले में स्पष्ट नजर आए।
 
यही वजह है कि भारत से असंबद्ध वित्तीय सेवाओं के निर्यात की शुरुआत नहीं हुई। अब ऐसा लगता है कि घरेलू निफ्टी और रुपया बाजार सिमट जाएगा और इसकी प्रमुख गतिविधि विदेशों में अंजाम लेगी। अन्य विकासशील देशों में हम ऐसा देख चुके हैं। शायद हमारी कमजोर वृहद/वित्त नीतिगत क्षमताओं के बाद 10 से 20 सालों में पर्सी मिस्त्री/बी एन श्रीकृष्णा सुधार लागू हों। इस बीच हमें निफ्टी और रुपया बाजार को गंवाने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। शायद हम वित्तीय एसईजेड स्थापित करके इस बाजार में बने रह सकें क्योंकि वहां हमारी सीमित क्षमताएं भी जल्दी रंग लाएंगी। वस्तु व्यापार के साथ विशेष आर्थिक क्षेत्र मसलन सांताक्रूज इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (एसईईपीजेड) अहम पड़ाव रहे। इनकी स्थापना के लिए केवल इतना कहना था कि देश के व्यापार गतिरोध तथा कर नीतियां इन विशिष्ट क्षेत्रों के भीतर लागू नहीं होंगे। एसईईपीजेड ने देश में सॉफ्टवेयर और हीरा उद्योग को जन्म दिया। समय बीतने के साथ भारत ने यह सीख लिया कि कर नीति में सुधार कैसे करना है और व्यापार अवरोध कैसे समाप्त करने हैं। इसके बाद यह विचार देश के अन्य हिस्सों में पहुंचा।
 
वित्तीय एसईजेड इससे कहीं अधिक जटिल होते हैं। केवल सीबीडीटी, आरबीआई या सेबी को बाहर कर देने से काम नहीं बनेगा। वैश्विक ग्राहक ऐसी वित्तीय सेवा पर यकीन नहीं करेगा जो एक अनियमित व्यवस्था में काम करती हो। केवल विनियमन पर्याप्त नहीं है बल्कि एफएसएलआरसी जैसे गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की आवश्यकता है ताकि निजी फर्म को निर्यात में प्रतिस्पर्धा का अवसर मिले। इससे वैश्विक ग्राहकों का विश्वास बहाल होगा। बजट भाषण में कहा गया  है कि वित्तीय क्षेत्र के एसईजेड के लिए नया कानून बनाकर एकीकृत वित्तीय नियामक बनाया जाएगा। वित्त मंत्रालय अगर समझदारी भरे कदम उठाए तो यह काफी प्रभावी हो सकता है। 
 
इन एसईजेड के लिए भारतीय वित्तीय संहिता का गठन भी किया जा सकता है। यह संहिता वित्तीय एजेंसियों के लिए मजबूत लक्ष्य निर्धारित करेगी और इन्हें हासिल करने के लिए मजबूत कानून प्रयोग में लाए जा सकते हैं। परंतु केवल कानून पर्याप्त नहीं है। हमें बढिय़ा प्रदर्शन करने वाले संस्थान स्थापित करने होंगे। वित्त मंत्रालय को समय रहते इसकी शुरुआत करनी होगी। तभी सांस्थानिक क्षमताएं विकसित हो पाएंगी।  अगर आगे बेहतर कदम उठाए गए तो हम कानून में सुधार हासिल कर सकते हैं और वित्तीय एजेंसियों का सांस्थानिक निर्माण हो सकता है। रुपये और निफ्टी के क्षेत्र में भारत के निरंतर नुकसान को दूर किया जा सकता है। मानव संसाधन विकसित किया जा सकता है। वित्त मंत्रालय में, वित्तीय एजेंसियों में, अकादमिक और उद्योग जगत सुधार के जरिये ऐसे सुधार लाए जा सकते हैं जो न केवल वित्तीय एसईजेड बल्कि पूरे देश के लिए लाभकारी हों। 
Keyword: economy, company, CBDT, RBI,,
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