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जेटली के पांचवें बजट की पांच महत्त्वपूर्ण बातें

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 07, 2018

वित्त मंत्री अरुण जेटली के पांचवें बजट ने कई घोषणाओं से लोगों का ध्यान आकृष्टï किया है। इन घोषणाओं में महत्त्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना, किसानों के लिए एक विशेष न्यूनतम समर्थन मूल्य पैकेज, शेयरों पर दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर, सीमा शुल्क में बढ़ोतरी एवं बहुत सी आयातित वस्तुओं पर अधिभार और वित्तीय मजबूती के लिए काफी उदार रूपरेखा शामिल हैं। लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 के बजट में इन घोषणाओं के अलावा भी कम से कम पांच ऐसी बातें हैं, जिनकी तरफ लोगों का बहुत ज्यादा ध्यान नहीं गया है। इस आलेख में उनका और उनके असर का उल्लेख करने की कोशिश की गई है। 

 
बड़ी सरकार : यह उम्मीद थी कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में सरकार का आकार छोटा होगा। लेकिन इसके विपरीत सरकारी विभागों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है। हालांकि बढ़ोतरी की रफ्तार में काफी गिरावट आई है। फरवरी, 2016 के अंत में सरकारी कर्मचारियों की अनुमानित संख्या 32.5 लाख थी। यह एक साल बाद यानी फरवरी, 2017 में 2.3 लाख बढ़कर 34.8 लाख हो गई। फरवरी, 2018 के अंत तक सरकारी कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 35 लाख हो जाएगी यानी इसमें पिछले वर्ष के मुकाबले बहुत कम केवल 25,000 कर्मचारियों की बढ़ोतरी होगी। 
 
अहम बात यह है कि सबसे बड़े नियोक्ता- भारतीय रेलवे के कर्मचारियों की संख्या 13 लाख के स्तर पर बनी हुई है, जिसमें पिछले तीन साल के दौरान कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस रुझान के हिसाब से वेतन-भत्तों एवं यात्रा पर सरकारी खर्च 2018-19 में छह फीसदी से कम बढ़ोतरी के साथ 2.07 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। यह 2017-18 में आठ फीसदी बढ़कर 1.95 लाख करोड़ रुपये हुआ था। वित्त वर्ष 2016-17 में वृद्धि 20 फीसदी के काफी ऊंचे स्तर पर रही थी।  लेकिन इस पर अगले साल कर प्रशासन के लिए धन आवंटन में की गई भारी बढ़ोतरी पानी फेर देती है। वित्त वर्ष 2018-19 में कर प्रशासन के लिए 1 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2017-18 में खर्च की गई राशि से 36 फीसदी अधिक हैं। यह साफ नहीं है कि कर प्रशासन पर सरकार के खर्च में इतनी भारी बढ़ोतरी क्यों होनी चाहिए। प्रत्यक्ष करों और अप्रत्यक्ष करों का प्रशासन संभाल रहे विभागों के कर्मचारियों की संख्या पिछले दो वर्षों में करीब दोगुनी हो गई है, लेकिन केवल इसी से इतनी भारी बढ़ोतरी की वजह साफ नहीं है। 
 
सरकारी क्षेत्र की घटती ताकत: सरकारी कंपनियों (पीएसयू) द्वारा जुटाए जाने वाले आंतरिक और अतिरिक्त बजट संसाधनों (आईईबीआर) ने हमेशा निवेश को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। वित्त वर्ष 2017-18 में तीन पीएसयू कंपनियां आंतरिक एवं अतिरिक्त बजट संसाधनों के तहत 3.96 लाख करोड़ रुपये खर्च करेंगी। इन कंपनियों में भारतीय रेलवे शामिल नहीं है। यह 2016-17 में उनके द्वारा खर्च की गई राशि से करीब 45 फीसदी अधिक है। हालांकि 2018-19 में ऐसी पीएसयू द्वारा जुटाए जाने वाले आंतरिक एवं अतिरिक्त बजट संसाधन 3 फीसदी घटकर 3.85 लाख करोड़ रुपये रहेंगे। रेलवे से इतर पीएसयू द्वारा जुटाए जाने वाले आंतरिक एवं अतिरिक्त बजट संसाधन अगले साल क्यों घटने चाहिए? भारतीय रेलवे अगले साल अपने आंतरिक एवं अतिरिक्त बजट संसाधन 17 फीसदी बढ़ाएगा। लेकिन क्या अन्य पीएसयू की वित्तीय हालत इतनी खराब हो गई है कि वे निवेश के लिए और संसाधन मुहैया कराने की स्थिति में नहीं हैं? या उन्होंने निवेश अवकाश घोषित कर दिया है? 
 
पूंजीकरण: यह आश्वस्त करने वाला कदम है कि सरकार ने 2018-19 में सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए अतिरिक्त 0.65 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो 1.35 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी डालने की प्रस्तावित प्रक्रिया पूरी करने के लिए जरूरत से अधिक होंगे। चालू वित्त वर्ष में पुनर्पूंजीकरण के लिए कुल 0.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इनमें 0.1 लाख करोड़ रुपये की वह राशि भी शामिल है, जिसका पहले वादा किया गया था। पीएसयू में पूंजी डालने के कार्यक्रम का आकार 2017-18 में 1.63 लाख करोड़ रुपये अनुमानित था। यह चालू वर्ष में 1.66 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है। इसमें भारतीय रेलवे को 0.53 लाख करोड़ रुपये और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को 0.3 लाख करोड़ रुपये मुहैया कराए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार ने किस तरह रेलवे और सड़क निर्माण में पर्याप्त पूंजी डाला जाना सुनिश्चित किया है। 
 
लेकिन इसमें चौंकाने वाला कदम एयर इंडिया में इक्विटी झोंकने का प्रावधान है, जिसका अगले साल निजीकरण किया जाना है। 6.5 अरब रुपये की राशि तुलनात्मक रूप से छोटी है। लेकिन इससे उस कंपनी में पूंजी डालने की जरूरत पर सवाल खड़े होते हैं, जो पहले ही बिकने को तैयार है। 
 
कम पीएसयू लाभांश : वित्त वर्ष 2017-18 के बजट आंकड़े साफ तौर पर यह दर्शाते हैं कि गैर-कर राजस्व में 13.5 फीसदी गिरावट से कैसे सरकार राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई। इस झटके से सबक लेते हुए सरकार ने 2018-19 में गैर-कर राजस्व में केवल 3 फीसदी बढ़ोतरी का बजट अनुमान रखा है। चिंताजनक अनुमान यह है कि पीएसयू का लाभांश अगले साल घटेगा, जिनका कुल गैर-कर राजस्व में 20 फीसदी हिस्सा है। वित्त वर्ष 2017-18 में पीएसयू का लाभांश 0.55 लाख करोड़ रुपये होने से अगले साल इस मद से राजस्व 0.52 लाख करोड़ रुपये होगा।  रेलवे से इतर पीएसयू द्वारा जुटाए जाने वाले आंतरिक एवं अतिरिक्त बजट संसाधनों में गिरावट और उनका कम लाभांश देना इन उद्यमों को प्रभावित करने वाली बड़ी समस्या के शुरुआती संकेत हैं। 
 
श्रम सुधार: जेटली ने अपने भाषण में केवल एक वाक्य में नियत मियाद रोजगार को सभी क्षेत्रों में लागू करने की घोषणा की। यह समय ही बताएगा कि श्रम बाजार में उदारता कितनी प्रभावी होगी। 
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