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बाजार में क्यों चल रहा बिकवाली का दौर!

आकाश प्रकाश /  February 06, 2018

इन दिनों बाजार में गिरावट का दौर चल रहा है। निवेशक इस अवसर का इस्तेमाल अपना पोर्टफोलियो मजबूत करने में कर सकते हैं। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश
 
भारतीय शेयर बाजारों में शुक्रवार को बिकवाली देखने को मिली। निफ्टी में 2 फीसदी और मिड कैप तथा स्मॉल कैप शेयरों में 3.5 फीसदी तक की गिरावट आई। मिड और स्मॉल कैप सूचकांक अब एक साल में 10 फीसदी तक गिर चुके हैं। वैश्विक बाजारों में गिरावट के साथ ही बिकवाली का क्रम सोमवार को भी जारी रहा। सवाल यह है कि भारतीय बाजारों में बिकवाली क्यों हो रही है? ऐसा बजट की वजह से है, वैश्विक मुद्दों के चलते या किसी अन्य वजह से? जहां तक बजट की बात है तो उसमें दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ कर का मुद्दा सामने आया। साफ कहें तो मुझे नहीं लगता कि 10 फीसदी कर लगाने के बाद भी देश में पूंजी की आवक प्रभावित होगी। हां अनुमानित प्रतिफल में अवश्य कमी आएगी और इससे आवक पर कुछ असर हो सकता है। अगर भारत और हमारी कंपनियां मजबूत वृद्धि का प्रदर्शन कर सकीं और पूंजीगत किफायत दिखा सकीं तो धन का आना जारी रहेगा। 10 फीसदी का कर लंबी अवधि में देश की वृद्धि को बेपटरी नहीं कर सकेगा। अल्पावधि में समस्या कर रिटर्न दाखिल करने और कराधान की कागजी कार्रवाई की अधिक है। निवेशक अभी पीछे हटने वाले नहीं हैं लेकिन हां, एक बार अगर आधारभूत बदलाव आए तो दिक्कतें बढ़ेंगी।
 
दूसरी आशंका का संबंध स्थानीय बॉन्ड प्रतिफल से जुड़ी हुई है। 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों से जुड़ा प्रतिफल बजट के दिन 18 आधार अंक उछलकर 7.61 फीसदी पर पहुंच गया। ऐसा सरकारी उधारी में 60,000 करोड़ रुपये की कमी के बावजूद हुआ। बाजार ने शायद फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में इजाफे को लेकर वित्त मंत्री की बातों को थोड़ा गंभीरता से ले लिया। इसके अलावा उन्होंने खाद्य तेल शुल्क से संबंधित कुछ बातें भी कहीं। इससे पता चलता है कि ग्रामीण भारत की आय बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता है। किसानों की दिक्कत यह है कि उन्हें फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। अगर सरकार उच्च मूल्य के साथ किसानों की आय बढ़ाने को तत्पर हो तो महंगाई का आना तय है। खाद्य मुद्रास्फीति की वापसी पर रिजर्व बैंक निश्चित तौर पर दरें बढ़ा देगा। 
 
यह चिंतित करने वाली बात है क्योंकि उच्च दरें मूल्यांकन चर और शेयरों का आकर्षण कम करती हैं। बॉन्ड प्रतिफल बढऩे पर वैश्विक निवेशक अपनी पूंजी ऋण बाजार से निकालेंगे, पूंजी के बाहर जाने से रुपया कमजोर होगा। इसके चलते महंगाई बढ़ेगी और आरबीआई को रुख कड़ा करना होगा। इससे बाजार का आवंटन गड़बड़ा सकता है। मुझे नहीं लगता है कि फिलहाल हम नकारात्मक चक्र में हैं लेकिन हमें सावधानी बरतनी होगी। सरकार को बॉन्ड बाजार को बजट के आकलन के बारे में यकीन दिलाना होगा और आरबीआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि नकदी की स्थिति बहुत ज्यादा तंग न हो। चूंकि बैंकों में पहले ही पर्याप्त सांविधिक तरलता अनुपात है इसलिए सरकारी प्रतिभूतियों के लिए नए खरीदार तलाश करने होंगे। ऐसा या तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की सीमा बढ़ाकर करना होगा या दीर्घावधि के निवेश के घरेलू संस्थानों के निवेश रुख में बदलाव करके।
 
इससे संबंधित एक चिंता 10 वर्ष के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड प्रतिफल से जुड़ी है। उनमें भी इजाफा हुआ है और 2.84 फीसदी के साथ वे 3 फीसदी के स्तर के करीब हैं जिसे अहम माना जाता है। अमेरिकी प्रतिफल में इजाफा हुआ क्योंकि ताजा आंकड़ों के मुताबिक वहां औसत प्रति घंटा मेहनताना करीब 2.9 फीसदी बढ़ा। सवाल यह उठता है कि क्या बेरोजगारी आखिरकार इतने निचले स्तर पर पहुंच गई है कि उसकी वजह मेहनताने और महंगाई में इजाफा हो रहा है? क्या इसमें फेडरल रिजर्व की भूमिका हो सकती है? क्या फेड द्वारा मौद्रिक कड़ाई तेज करने की आशंका से ऐसा हुआ है या फिर बाजार केवल फेडरल रिजर्व के नए चेयरमैन जेरोम पॉवेल की परीक्षा ले रहा है। बाजार शायद मुद्रास्फीति से जूझने की उनकी क्षमता की परीक्षा ले रहा है। अमेरिका में मौजूदा मूल्यांकन स्तर की बात करें तो प्रतिफल में कोई भी इजाफा बाजार को प्रभावित करेगा। अमेरिका का रुख पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। अगर आप मानते हैं कि मौजूदा हालात के लिए फेडरल रिजर्व जिम्मेदार है और मुद्रास्फीति का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है तथा हमने मौद्रिक सख्ती का चक्र तेज कर दिया है तो दुनिया भर के बाजारों को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है। 
 
हकीकत यह है कि हम न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में आश्वस्ति के शिकार हो गए हैं। किसी भी दौर में 10 फीसदी की गिरावट ठीक है। भारत में हमें बीते 15 महीनों में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला है। अमेरिका में बाजार में 3 फीसदी की गिरावट के बिना यह सबसे लंबी अवधि है। पिछले साल की शांति की बदौलत किसी भी तरह की बिकवाली बढ़ीचढ़ी प्रतीत होती है।  भारत में बिकवाली स्माल और मिड कैप शेयरों पर केंद्रित रहती है। मूल्यांकन और धारणा की बात करें तो कई शेयर ऐसे रहे जिन्होंने व्यापक बाजार के औसत प्रदर्शन को पीछे छोड़ दिया। जाहिर है इन शेयरों में मजबूती का दौर सामने आना ही था।
 
मुझे इस बात का यकीन है कि कॉर्पोरेट आय में मजबूत तेजी देखने को मिलेगी। वस्तु एवं सेवा कर बड़े कारोबारी संस्थानों और उनके मार्जिन के लिए सकारात्मक साबित हुआ है। अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और वास्तविक अर्थव्यवस्था के तमाम आंकड़े इस तेजी की गवाही देते हैं। हालांकि एक बात यह भी है कि बढ़ती दरों के चलते कुछ दबाव बनेगा लेकिन बढ़ती आय के कारण बाजार इस दबाव को दरकिनार करता हुआ आगे बढ़ जाएगा। हालांकि इस दौरान कुछ अस्थिरता उत्पन्न होने की भी आशंका है। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। अगर किसी को आय से जुड़े इस किस्से में यकीन नहीं है तो उसे बिकवाली कर शेयर बाजार से बाहर निकल जाना चाहिए। वृहद अर्थव्यवस्था किसी अन्य विस्तार का समर्थन नहीं करती। 
 
मुझे ऐसा लग रहा है कि हमें गिरावट के लिए तैयार रहना चाहिए। मिड कैप शेयरों में पिछले महीने इसकी शुरुआत हो चुकी है। अब यह आगे चलकर बड़े शेयरों में भी विस्तारित होगा। ऐसा ठहराव जो बाजार को ताजगी से भर दे वह हमेशा बेहतर होता है। मुझे नहीं लगता है कि इसे रुख में बदलाव के रूप में देखा जाना चाहिए। वैसा केवल तब होगा जबकि नकारात्मक वृहद चक्र नजर आने लगे। फिलहाल तो मौका है इस गिरावट का लाभ उठाते हुए पोर्टफोलियो में सुधार करने का।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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