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बजट 2018 : असरदार रहा या कमोबेश बेअसर?

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  February 05, 2018

बजट के दिन किसी अन्य खबर के बारे में सोचना तक मुश्किल होता है। खासतौर पर बीते एक दशक में जबकि बजट लगातार कम ताकतवर और अस्पष्ट होता गया है, और बड़े नीतिगत कदम और झुकाव उपांगिका और अनुलग्नक अथवा वित्त विधेयक के संशोधनों में दफन कर दिए जाते हैं। तब ऐसा प्रतीत होता है कि बजट पर एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे एक सप्ताह तक ध्यान देने की आवश्यकता है। परंतु बजट के दिन आई दो अन्य खबरों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। ये खबरें बजट में निहित दबाव के बारे में तो बताती ही हैं, साथ ही यह वजह भी साफ करती हैं कि आखिर क्यों बजट अपने उल्लिखित लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रह सकता है?

 
पहली खबर है राजस्थान में हुए उपचुनाव के नतीजे। वहां भाजपा के खिलाफ जबरदस्त लहर देखने को मिल रही है। भाजपा ने वर्ष 2014 में जो सीट 2 लाख से अधिक सीटों से जीती थी, वहां उसे 2018 में एक लाख से अधिक वोटों से हार का सामना करना पड़ा। अलवर लोकसभा क्षेत्र में 19 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा से मुंह मोड़ लिया। हालांकि किसी एक सीट से पूरे उत्तर भारत के मिजाज का पता लगाना और उपचुनाव से आम चुनाव के बारे में कोई कयास लगाना मुश्किल है लेकिन जीत का अंतर इतना ज्यादा रहा कि पहली बार लगने लगा है कि मोदी की भाजपा को केवल किसी मजबूत तीसरे दल के नेता ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी पराजित कर सकती है। गुजरात के बाद मोदी की अपराजेयता का दावा क्षीण हुआ है। अलवर के बाद अजमेर में भी उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। सीधी बात है, हम देखते आए हैं कि मोदी दूसरे कार्यकाल की बात करते हैं लेकिन हकीकत यह है कि यह दूसरा कार्यकाल उनको चुनावी जीत से हासिल करना होगा। 
 
उन्होंने अपनी इतनी विशालकाय छवि गढ़ ली है कि वर्ष 2014 में हासिल 284 सीटों से अगर वे 50 सीटें भी कम जीतते हैं तो यह उनके संभावित साझेदारों और खुद उनकी पार्टी के लिए किसी हार से कम नहीं नजर आएगा। आज यह पूरी तरह संभव नजर आता है कि 50 से अधिक सीटें हार जाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे उन सभी जगहों पर कांग्रेस के सफाये का दावा नहीं कर सकते हैं जहां ये दोनों दल एक दूसरे के सामने हैं। मोदी को हराया जा सकता है। एक बार जब यह बात दिल्ली में और देश के अन्य इलाकों में फैल जाएगी तो उनका प्रशासन कहीं अधिक असुरक्षित और अनिश्चित नजर आने लगेगा। तब नौकरशाही और कारोबारी भी कम दास भाव में नजर आएंगे। यह एक ऐसी भविष्यवाणी है जिसे आसानी से अंजाम दिया जा सकता है।
 
इसमें दो राय नहीं है कि मोदी और अमित शाह को यह बात बहुत पहले से मालूम थी। हकीकत में मुझे लगता है कि उन्हें इस बात का अंदाजा हम सभी से पहले हो गया था। शायद यही अतिसंवेदनशीलता थी जो बजट की प्रस्तुति में भी देखने को मिला। हमें एक ग्रामीण केंद्रित बजट की अपेक्षा थी और हमें एक ऐसा बजट मिला जिसे कृषि क्षेत्र पर आधारित बताया जा रहा है, हालांकि वास्तविक नीतिगत ब्योरा, विस्तृत जानकारी और आवंटन, कुछ भी हकीकत से मेल नहीं खाता। अहम बात यह है कि यह बजट सरकार की कमजोरी और अस्थिरता के बारे में बता रहा है। तीन दशक में पहली बार बहुमत की सरकार आई, उसे बढिय़ा वृहद आर्थिक परिस्थितियों का साथ मिला, इसके बावजूद उसके बजट में राजनीतिक और आर्थिक दबाव साफ नजर आता है। यह अपने आप में उसकी अक्षमताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है।
 
अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में सरकार ने सरकारी संपत्तियों की मदद के रूप में अंतिम सहारा अपनाया। उसने बुनियादी ढांचा समेत अपने तमाम तय लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारी कंपनियों, सरकारी बैंकों, सरकारी बीमा कंपनियों और चिकित्सा नियामकों आदि का सहारा लिया। परंतु बजट के दिन आई एक अन्य खबर ऐसी है जो दिखाती है कि यह कितनी बड़ी गलती हो सकती है। राजकोषीय योजना को रेखांकित करने वाले राजस्व अनुमान के बारे में बात करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी व्यवस्था में कर वंचना रोकने संबंधी जो प्रावधान किया गया है वह 1 फरवरी से लागू हो रहा है। वह शायद यह संकेत देना चाहते थे कि राजस्व के मोर्चे पर आगे राह आसान रहेगी। परंतु उसी दिन एक और घटना हुई। राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केंद्र जिसके हवाले तमाम राज्यों में वस्तुओं के परिवहन के इलेक्ट्रॉनिक वेबिल तैयार करने और निगरानी करने का दायित्व सौंपा गया है, वह उस दिन पूरी तरह लडख़ड़ा गया। यह वही करवंचना रोधी व्यवस्था है जिसकी तारीफ जेटली कर रहे थे। इस वेबसाइट के पूरी तरह नाकाम हो जाने के बाद केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड ने ट्वीट किया कि अब बिल एक अधिसूचित तारीख से मान्य होंगे।
 
यह बात हमें याद दिलाती है कि कैसे प्रभावी और सहयोगी राज्य बुनियादी ढांचा और क्षमता सरकार के छोटे से छोटे वादे को पूरा करने में अहम है। उनकी मदद से ही इस बजट के या पहले के वादों को पूरा किया जा सका है या सकता है। परंतु सरकार ने इसमें सुधार करने में अक्षमता दिखाई है। मोदी सरकार अपने वादे के मुताबिक देश की विभिन्न व्यवस्थाओं में बदलाव नहीं ला सकी। आज ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जो सरकार की राजनीतिक भंगुरता और उसके सीमित दृष्टिकोण तथा क्रियान्वयन क्षमता को प्रदर्शित करती हैं। जबकि यही वे मानक हैं जिनके आधार पर हमें बजट के इरादों और उसके वादों का आकलन किया जाना चाहिए। इस लिहाज से देखा जाए तो बजट पहले की तुलना में भी कम प्रभावी नजर आता है।
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