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राजकोषीय सुधार पथ पर वापसी के हों उपाय

रथिन रॉय /  February 05, 2018

वर्ष 2017-18 का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहा। यह गत वर्ष बजट में उल्लिखित स्तर से 0.3 फीसदी तक ज्यादा है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं रथिन रॉय 

 
सरकार वर्ष 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य पर कायम नहीं रह सकी। यह अप्रत्याशित नहीं था। इस राजकोषीय फिसलन में बॉन्ड बाजार कारक रहा और बीते चार महीनों में बॉन्ड प्रतिफल में 110 आधार अंकों की बढ़ोतरी हुई है। बजट प्रस्तुत होने के बाद राजकोषीय फिसलन के बावजूद बॉन्ड प्रतिफल में मामूली बढ़ोतरी ही देखने को मिली। यानी राजकोषीय फिसलन उतनी नहीं थी जितनी कि बाजार को आशंका थी।  मैं इस फिसलन की वजह का विश्लेषण करने का प्रयास करूंगा। वर्ष 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहा यानी गत वर्ष प्रस्तुत बजट में किए गए उल्लेख से 0.3 फीसदी अधिक। जबकि राजस्व घाटा जीडीपी के 2.6 फीसदी के बराबर रहा जो पिछले साल 1.9 फीसदी था। राजस्व घाटे में हुई बढ़ोतरी के चलते ही राजकोषीय घाटा बढ़ा। वर्ष 2017-18 के बजट अनुमान में इनके बीच का अनुपात 58.76 फीसदी था जबकि इस बजट में उल्लिखित संशोधित अनुमान में यह 73.78 फीसदी हो गया। 
 
केंद्र सरकार को इस अनुपात को लेकर लंबे समय तक ढांचागत समस्याओं का सामना करना पड़ा है। वर्ष 1981-82 में यह केवल 4.5 फीसदी था और वर्ष 2012-13 तक यह बढ़कर 74.3 फीसदी पर जा पहुंचा। इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वर्ष 2016-17 में वह इसे 59 फीसदी पर लाने में कामयाब रही। यह बात ज्यादा चिंतित करने वाली है। आखिर राजस्व घाटे में इजाफा क्यों हुआ? वर्ष 2017 के बजट अनुमान में उल्लिखित वृहद-राजकोषीय जानकारी की तुलना कल दी गई जानकारी से करें तो कुल व्यय जीडीपी के उल्लिखित 0.47 फीसदी से अधिक है। राजस्व व्यय जीडीपी के संदर्भ में 0.68 फीसदी ज्यादा है और पूंजीगत व्यय करीब 0.21 फीसदी कम है। राजस्व के मोर्चे पर कर राजस्व जीडीपी के 0.28 फीसदी के साथ पिछले बजट में जताए गए अनुमान से अधिक है। गैर कर राजस्व में अनुमान की तुलना में गिरावट आई है। दोनों मिलकर एक दूसरे के प्रभाव को खत्म करते हैं। इसके बावजूद व्यय वृद्धि के अनुमान से ज्यादा रहने की समस्या है, न कि कम राजस्व की। इसके चलते भी राजकोषीय घाटे का स्तर बढ़ा है।
 
आखिर राजस्व व्यय में इजाफा क्यों हुआ? अगर हम अलग-अलग घटक पर नजर डालें और संशोधित अनुमानों में उतार-चढ़ाव पर दृष्टि डालें तो राजस्व व्यय 1.07 लाख करोड़ रुपये ज्यादा है। अन्य हस्तांतरण में व्यय 60,000 करोड़ रुपये की राशि राज्यों को चुकाई गई जीएसटी क्षतिपूर्ति के बराबर है। इसने भी घाटा बढऩे में भूमिका निभाई है। यह कहा जा सकता है कि गत वर्ष राजकोषीय लक्ष्य हासिल करने की कमजोर प्रक्रिया में यह नजर भी आया। परंतु यह भी मानना होगा कि जीएसटी पर सहमति हासिल करने की प्रक्रिया विचलन भरी रही। बाकी लोगों की बात करें तो प्रतिष्ठानिक व्यय इसलिए ज्यादा रहा क्योंकि पेंशन व्यय बढ़ा और रक्षा राजस्व व्यय तथा ब्याज भुगतान में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। ऐसे में गैर विकास राजस्व व्यय के चलते भी राजस्व घाटा बढ़ा।
 
राजस्व के मोर्चे पर आय कर संग्रह एकदम लक्ष्य के बराबर नजर आता है और कॉर्पोरेट कर संग्रह में 25,000 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। सीमा शुल्क राजस्व अनुमान से करीब 1,09,758 करोड़ रुपये तक कम रहा। ऐसा इसलिए भी नजर आ रहा है क्योंकि कई शुल्क जीएसटी में समाहित कर दिए गए हैं। वर्ष 2017-18 में कर राजस्व बजट अनुमान की तुलना में राजस्व व्यय में अधिक है लेकिन गैर कर राजस्व में करीब 53,000 करोड़ रुपये की कमी देखने को मिली है। यह राशि करीब उतनी ही है जितना इजाफा राजस्व घाटे और जीडीपी अनुपात में हुआ है। इसके लिए मोटे तौर पर सरकारी कंपनियों और आरबीआई का कम लाभांश उत्तरदायी है। 
 
अगर गैर कर राजस्व अनुमानित से कम नहीं होता तो राजस्व घाटा एकदम लक्ष्य के अनुरूप होता। 11 महीने के बजाय अगर 12 महीने का जीएसटी राजस्व मिलता तो भी अच्छा होता लेकिन घाटे में इजाफा इसके चलते नहीं हुआ है। ऐसे में यह एकदम स्पष्ट है कि राजस्व घाटे के स्तर में यह विचलन चुनावी लोकलुभावन अथवा जीएसटी के लेनदेन की अनिवार्यता की वजह से नहीं हुआ है। यह गिरावट राजकोष की ढांचागत कमजोरी को दर्शाती है, न कि बजट निर्माण की किसी सामरिक या परिचालन चूक को।
 
भविष्य की बात करें तो वर्ष 2018-19 का अनुमान निराशाजनक है। कर राजस्व में ज्यादा इजाफे की बात शामिल नहीं है। गैर कर राजस्व में और गिरावट आने की बात कही गई है। ऐसे में राजकोषीय घाटे में और कमी के लिए व्यय में कमी लानी होगी। राजस्व घाटे और राजकोषीय घाटे का अनुपात 66 फीसदी तक होने की बात कही गई है। यह लक्ष्य भी वर्ष 2017-18 के लिए निर्धारित 59 फीसदी के स्तर से काफी ज्यादा है। यानी सरकार पर राजकोषीय दबाव बना रहेगा और ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी में इजाफा जारी रहेगा।
 
व्यय बजट का परीक्षण यह बताता है कि चुनावी साल में विस्तारवादी भावनाओं के बजाय बजट को बेहतर लक्षित किया गया है। कृषि क्षेत्र को ध्यान में रखकर बनाई गई योजनाओं की बात करें तो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को महत्त्वपूर्ण आवंटन हुआ है। जबकि अन्य योजनाओं की बात करें तो वह स्थिर रहा है या कम हुआ है। यह बेहतर राजकोषीय प्रबंधन का उदाहरण है और इसमें प्राथमिकताओं का ध्यान रखा गया है। प्रमुख वृहद आर्थिक आंकड़ों में फिसलन देखने को मिली है। परंतु हमें यह भी समझना होगा कि ऐसा चुनावी वर्ष की बजटीय उदारता की वजह से नहीं हुआ है और न ही कमजोर बजट निर्माण से। अंशधारकों को समझना होगा कि वृहद आर्थिक स्थिति गंभीर है और राजकोषीय पथ पर वापसी के लिए अहम ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है। बिना अन्य अंशधारकों के सहयोग के वित्त मंत्री इससे नहीं निपट सकते। गैर कर राजस्व और व्यय को नियंत्रित करने के लिए यह आवश्यक है। इस संदर्भ में वित्त मंत्री का एफआरबीएम समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार करने का बयान काबिलेतारीफ है। हालांकि बजट बाधाओं से संबंधित कुछ अहम उपाय भी शामिल हैं। इसमें मध्यम अवधि के बजट प्रावधान और राजकोषीय परिषद की स्थापना आदि शामिल हैं। मैं बस यही चाहूंगा कि ये प्रतिबद्धताएं जल्दी पूरी की जाएं और इनके लिए आगामी बजट तक इंतजार नहीं किया जाए। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: fiscal deficit, GDP, budget,,
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