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आरबीआई का रुख

संपादकीय /  February 05, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति की मंगलवार को आयोजित बैठक में देश के मौद्रिक रुख पर आगे विचार किया जाएगा। इस दौरान चर्चा के लिए कई मुद्दे सामने होंगे। हाल ही में प्रस्तुत आम बजट में सरकार ने राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के अपने लक्ष्य से समझौता किया। चालू वित्त वर्ष के दौरान राजकोषीय घाटे के जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहने का अनुमान लगाया गया जबकि इससे पहले यह लक्ष्य जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर था। वहीं अगले वित्त वर्ष के राजकोषीय घाटे के जीडीपी के 3.3 फीसदी के बराबर रहने की बात कही गई। जबकि पहले तय राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लक्ष्य के आधार पर इसे जीडीपी का 3 फीसदी रहना था। यह अतिरिक्त व्यय निश्चित तौर पर आरबीआई को मौद्रिक नीति को लेकर अपना आकलन बदलने पर मजबूर करेगा। वर्ष 2018-19 में सरकार के अतिरिक्त व्यय का जोखिम बहुत ज्यादा है। अगर आगामी आम चुनावों को किनारे कर के देखें तो भी कच्चे तेल का भविष्य और ईंधन कर तथा उर्वरक सब्सिडी का भविष्य अनिश्चित है। सरकार ने जिस नई स्वास्थ्य बीमा योजना की घोषणा की है, उसका बजट सही तरीके से सामने नहीं आया है और विनिवेश प्राप्तियों का अनुमान लगाना तो हमेशा ही मुश्किल रहता है। इसके अतिरिक्त खाद्य सब्सिडी में होने वाले इजाफे को तो बजट के आकलन में शामिल किया गया है लेकिन किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में किए जाने वाले इजाफे का आकार अभी सामने आना है।
 
बॉन्ड बाजार ने पहले ही इस समस्या का अनुमान लगा लिया है। बीते कुछ महीनों में देश के प्रतिफल का वक्र यानी यील्ड कर्व (तय अवधि में प्रतिफल का स्वरूप) तेजी से बढ़ा है और बजट सामने आने के बाद 10 वर्ष की सरकारी प्रतिभूतियों की प्रतिक्रिया भी नकारात्मक रही। इनका मौजूदा प्रतिफल करीब 7.6 फीसदी है। दूसरे शब्दों में कहें तो बॉन्ड प्रतिफल 6 फीसदी की शीर्ष ब्याज दरों से ज्यादा है। ब्याज दरों में अंतिम बदलाव अगस्त 2017 में किया गया था। उस वक्त इसे 6.25 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी किया गया था। इसमें लंबे समय तक स्थायित्व नहीं रहेगा। 
 
गत गुरुवार को आरबीआई ने 11,000 करोड़ रुपये की एक नीलामी रद्द कर दी क्योंकि इससे बॉन्ड बाजार को उकसावा मिलने की आशंका थी। यह उस महीने की चौथी ऐसी नीलामी थी। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य उचित ही संकेत कर चुके हैं कि केंद्रीय बैंक उन बैंकों की मदद की आदत नहीं बना सकता जिनके पोर्टफोलियो घाटे में चल रहे हैं। सरकारी बैंकों की ओर से इन नीलामियों में मांग बहुत कमजोर रही। मुद्रास्फीति का गणित भी आरबीआई की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं है। दिसंबर में खुदरा महंगाई 17 महीनों के उच्चतम स्तर पर थी। अभी भी यह खतरे के दायरे में नहीं है लेकिन इसमें बढ़ोतरी से आरबीआई चौकस है। आरबीआई ने इसके लिए 4 फीसदी का लक्ष्य तय कर रखा है। इस बीच वृद्धि की चिंता परिदृश्य से गायब है क्योंकि अर्थव्यवस्था में मांग की वापसी नजर आ रही है और 2016 में आई मंदी अब समाप्त नजर आ रही है।
 
कुल मिलाकर देखें तो यह अपेक्षा की जा सकती है कि मौद्रिक नीति समिति इस अवसर पर ब्याज दरों में इजाफा करे और ऋण बाजार में स्थिरता कायम करे। इसमें सरकार का बदला हुआ राजकोषीय रुख भी परिलक्षित होगा। हालांकि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि बजट का प्रभाव अभी अपना असर दिखा ही रहा है। उचित यही होगा कि आरबीआई इस बैठक में दरों को थामे रखे और भविष्य में होने वाली बढ़ोतरी को लेकर अपने रुख में बदलाव लाए। 
Keyword: RBI, rate, bank, budget,,
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