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बजट में ऐलान लेकिन धन का प्रावधान?

नितिन देसाई /  February 01, 2018

बजट में कई महत्त्वपूर्ण घोषणाएं तो शामिल हैं लेकिन उनके लिए जरूरी धनराशि की व्यवस्था कैसे होगी इसका कोई प्रमाण नजर नहीं आ रहा है। इस बारे में बता रहे हैं नितिन देसाई

 
बजट आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह सरकार के वर्णित नीतिगत लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कितना प्रभावी है। केंद्रीय बजट का मुख्य आर्थिक कार्य है वृहद आर्थिक स्थिरता को बरकरार रखना। परंतु बजट में उल्लिखित विशिष्टï कर एवं व्यय संबंधी प्रस्ताव अन्य नीतिगत लक्ष्यों मसलन वृद्घि, रोजगार निर्माण, समता और पर्यावरण के स्थायित्व आदि को प्रभावित करते हैं।  वृहद आर्थिक स्थिरता की बात करें तो इसका मुख्य मानक राजकोषीय घाटा है। वित्त वर्ष 2019 के बजट में राजकोषीय घाटे को कम करने की प्रक्रिया को धीमा किया गया और शायद ज्यादा अहम बात यह है कि वित्त वर्ष 2018 के लिए घाटे का स्तर जीडीपी के 3.5 फीसदी के बराबर रहा जबकि इसके 3.2 फीसदी तक रहने का लक्ष्य तय किया गया था। परंतु इसमें अहम योगदान परिसंपत्तियों की बिक्री का भी है। हाल ही में एचपीसीएल की हिस्सेदारी को ओएनजीसी को बेचने को इससे जोड़कर देखा जा सकता है। यह बिक्री सरकारी क्षेत्र में सीमित थी और इससे घाटा कम हुआ लेकिन कुल सार्वजनिक बचत पर इसका असर नहीं हुआ। 
 
वित्त वर्ष 2019 के लिए राजकोषीय घाटे के 3.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। इस वर्ष कर राजस्व वृद्घि के 16.6 फीसदी रहने और व्यय वृद्घि के 10.1 फीसदी रहने की बात कही गई है। प्रत्यक्ष करों की वृद्घि दर 14.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। बीते करीब एक दशक में प्रत्यक्ष कर की उछाल (नॉमिनल जीडीपी वृद्घि की तुलना में प्रत्यक्ष कर वृद्घि का अनुपात) सीमित रही है। वित्त मंत्री ने कहा कि नोटबंदी के बाद से इसमें तेजी आई है और इसके अंतिम आंकड़ों के लिए अभी प्रतीक्षा करनी होगी। जहां तक अप्रत्यक्ष कर की बात है तो यह जीएसटी क्रियान्वयन का पहला वर्ष है और वित्त वर्ष 2019 के 6.04 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित सीजीएसटी के आंकड़े या वित्त वर्ष 2018 के अनुमानित 2.21 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से तुलना करने के लिए कुछ है नहीं। परंतु यह महत्त्वाकांक्षी नजर आता है। भारतीय संदर्भ में वृहद आर्थिक लक्ष्यों मसलन राजकोषीय प्रोत्साहन अथवा उसे सीमित रखने तथा क्षेत्रवार प्राथमिकताओं के मामले में व्यय बजट अहम संसाधन है। इनमें साल दर साल बदलाव आते हैं और ये निर्धारक नहीं होंगे। यह अगले आम चुनाव से पहले सरकार का आखिरी पूर्ण बजट है और इस वर्ष कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। 10.1 फीसदी की व्यय वृद्घि का अनुमान 2004-05 के चुनावी वर्ष के 13.8 फीसदी के व्यय से काफी कम है। वर्ष 2008-09 में तो यह 24 फीसदी रहा था जबकि वर्ष 2013-14 में केवल 10.6 फीसदी। परंतु बजट में घोषित महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को देखते हुए यह अपर्याप्त नजर आ रहा है। 
 
फिलहाल राजकोषीय विवेक की बात करें तो वह स्पष्टï है क्योंकि अगर कच्चे तेल के दाम बढ़ते रहे और मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ा तो दिक्कत हो सकती है। इस लिहाज से देखा जाए तो बजट अच्छा है लेकिन इसके चलते कई मजबूत लगती योजनाओं का फंड कम रह गया है।  जहां तक बात है वृद्घि की तो तयशुदा निवेश दर वर्ष 2011-12 के 39 फीसदी के उच्चतम स्तर से गिरकर वर्ष 2017-18 तक 26.4 फीसदी पर आ गई। आर्थिक समीक्षा में इसके लिए मोटे तौर पर कॉर्पोरेट क्षेत्र की संकटग्रस्त बैलेंस शीट और बैंकों के फंसे हुए कर्ज को उत्तरदायी ठहराया गया है। वर्ष 2011-12 से 2015-16 के बीच कॉर्पोरेट तयशुदा निवेश जीडीपी के करीब 13 फीसदी के स्तर का रहा। इसमें कमी इसलिए आई क्योंकि गैर कॉर्पोरेट अथवा घरेलू क्षेत्र के सकल तयशुदा निवेश में 5 फीसदी की कमी आई। आर्थिक समीक्षा में निवेश में सुधार को लेकर सतर्कता बरती गई है और कहा गया है कि यह एक अहम आवश्यकता है।
 
बजट में सार्वजनिक क्षेत्र के बुनियादी निवेश में इजाफा करने और 250 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली फर्म के लिए 25 फीसदी कॉर्पोरेट कर दर की बात कही गई है। इसका छोटी फर्म के निवेश पर सकारात्मक असर हो सकता है। परंतु बजट में दीर्घावधि पर 10 फीसदी कर भी लगाया गया है। सूचीबद्घ शेयरों पर पूंजीगत लाभ बचत की भावना को चोट पहुंचा सकता है और अधिमूल्यित शेयर बाजार में झुंझलाहट पैदा कर सकता है। विकसित देशों में बढ़ती ब्याज दरों के चलते विदेशी पोर्टफोलियो में भगदड़ मच सकती है। इससे 80,000 करोड़ रुपये के महत्त्वाकांक्षी विनिवेश लक्ष्य को झटका लग सकता है।
 
कृषि क्षेत्र पर काफी दबाव है। व्यापक किसान आंदोलन और आत्महत्याओं से संकेत मिलता है कि यह एक बड़ी चुनौती है। बीते चार साल से कृषि मूल्यवर्धन ठिठका हुआ है। इस वर्ष किसानों की बड़ी समस्या यह रही कि उन्हें बाजार में फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत मिली। वैसे भी चावल, गेहूं, कपास और गन्ने के अलावा अन्य फसलों की सरकारी खरीद की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। बजट में प्रस्ताव रखा गया है कि राज्यों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसानों को स्थानीय मंडी के भाव और एमएसपी के बीच का अंतर मिले या एमएसपी का सही प्रवर्तन हो। परंतु इसके लिए बजट प्रावधान सामने नहीं आया। टमाटर, आलू और प्याज जैसी खराब होने वाली फसलों के लिए कृषि उपज संगठनों को प्रसंस्करण और विपणन सुविधाओं से जोडऩे की पहल स्वागतयोग्य है। क्योंकि इन उपजों की कीमत अक्सर ऊपर-नीचे होती है। 22,000 ग्राम बाजार विकसित कर किसानों को उपभोक्ताओं और थोक खरीदारों से सीधे जोडऩे का प्रस्ताव भी मौजूदा बिचौलिया नियंत्रित कृषि विपणन व्यवस्था को सीधी चोट होगी। 
 
रोजगार निर्माण के बारे में कोई उल्लेखनीय बात नहीं कही गई है हालांकि बजट में महिला श्रमिकों के कम भविष्य निधि अंशदान संबंधी मसलों के जरिये लिंग भेद की समस्या का निराकरण किया गया है। वृहद आर्थिक स्थिरता और वृद्घि पर केंद्रित नीति में समता के लिए कुछ खास करना संभव भी नहीं है। देश के करोड़ों गरीब परिवारों को चिकित्सा सुविधा से जुड़ी लागत को लेकर एक महत्त्वाकांक्षी योजना की घोषणा की गई लेकिन व्यय बजट में इसका कोई प्रावधान नहीं नजर आया।  कुलमिलाकर यह ऐसा बजट है जिसमें राजकोषीय लक्ष्यों को शिथिल हो जाने दिया गया है जबकि निवेश के लिए जरूरी प्रोत्साहन या महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के लिए अहम प्रावधान भी नजर नहीं आते। हां, कृषि क्षेत्र के लिए कुछ उम्मीद अवश्य है।
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