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सन 1948 से 2018 के बीच आम बजट के कुछ सबक

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 31, 2018

तमाम वित्त मंत्रियों का काम अत्यंत दुष्कर होता है। उनके लक्ष्य परस्पर विरोधाभासी होते हैं। एक तरफ उन्हें पैसा जुटाना होता है और दूसरी ओर पैसे की मांग कर रहे अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को इनकार भी करना होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अच्छे वित्त मंत्रियों को यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक वित्त की सेहत दुरुस्त बनी रहे।  अक्सर राजनीति सरकारी व्यय का रुझान तय करती है। यही वजह है कि गत 70 वर्ष के अनुभव हमें बताते हैं कि जैसे ही किसी वित्त मंत्री को लगता है कि चीजें उसके नियंत्रण में हैं, तभी समस्या सामने आ जाती है। राजनीति, बाहरी झटके, आपदाएं, सूखा आदि इनमें से कोई भी समस्या सामने आ सकती है। 

बीते चार बजट के दौरान अरुण जेटली के साथ भी यही हुआ। सबकुछ ठीक चल रहा था कि तभी नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र को तगड़ा झटका दे दिया। जीएसटी के कमजोर क्रियान्वयन ने भी राजस्व वृद्घि की दर को धीमा कर दिया।  ऐसे में राजकोषीय लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। फंडिंग अच्छी होने की स्थिति में यह बहुत ज्यादा नहीं फिसलेगा लेकिन इसमें फिसलन आएगी जरूर। राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसदी तक रखने का लक्ष्य निर्धारित था।  जेटली पहले ऐसे वित्त मंत्री नहीं हैं जिन्हें ऐसी दुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा हो। देश के पहले वित्त मंत्री आर के षणमुगम चेट्टïी के साथ भी यही हुआ था। चेट्टïी तत्कालीन मद्रास के एक कारोबारी थे और सरकार की वित्त व्यवस्था संभालने की कोई विशेषज्ञता उनमें नहीं थी। उन्होंने 26 नवंबर,1947 को अपना पहला अंतरिम बजट पेश किया। अंतरिम बजट इसलिए क्योंकि जुलाई 2014 के जेटली के अंतरिम बजट की तरह वह भी एक मध्यावधि बजट व्यवस्था थी। ऐसे किसी तरह के बदलाव की गुंजाइश बहुत सीमित थी। 
 
भारत का विभाजन तत्काल हुआ था और पाकिस्तान को धनराशि चुकाने तथा वहां से लाखों शरणार्थियों पर भारी भरकम राशि व्यय करने के कारण राजकोष पर बहुत तगड़ा बोझ था। दूसरा विश्वयुद्घ दो साल पहले ही समाप्त हुआ था और विश्व अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही थी। उस दौर में सरकारी राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा रक्षा सेवाओं के खाते में जा रहा था। षणमुगम ने लोकसभा से कहा कि सरकार के सर्वश्रेष्ठï प्रयासों के बावजूद व्यय और राजस्व के बीच का अंतर दूर नहीं किया जा सका। बहुत संभव है कि 1 फरवरी को बजट प्रस्तुत करते हुए जेटली भी यही कहें। बहरहाल, अगर इतना ही होता तो ठीक था लेकिन आने वाले वर्षों में यह बात तमाम वित्त मंत्रियों का स्थायी बचाव बन गई। 
 
षणमुगम ने कराधान के उच्च स्तर और सरकार द्वारा ली गई सस्ती उधारी के बारे में भी बात की। उन्होंने सवाल उठाया कि इसके अलावा वह क्या कर सकते हैं। उन्होंने एक ओर कर में कोई इजाफा नहीं किया, वहीं 25 करोड़ रुपये का घाटा शेष रहने दिया। यह राशि केवल 25 करोड़ रुपये थी और इस तरह सस्ती सरकारी उधारी को इस आधार पर जारी रहने दिया गया कि यह देश के हित में है। लब्बोलुआब यह कि यह प्रक्रिया भविष्य की सरकारों के लिए नजीर बन गई। बजट निर्माण प्रक्रिया में पहली बार राष्ट्रवाद को जगह दी गई थी। ऐसा इसलिए हुआ था और बाद की सरकारों ने इसे भी जस का तस अपना लिया था। 
 
षणमुगम ने आयात को भी तीन श्रेणियों में बांट दिया था। नि:शुल्क, सीमित और प्रतिबंधित। एक दशक से भी कम समय में पहली श्रेणी लगभग समाप्त हो गई जबकि बाद की दो श्रेणियां बरकरार रहीं। इस तरह आयात लाइसेंसिंग का जन्म हुआ। 
नौकरशाही को यह रास आया और अगले 70 वर्षों तक यह प्रक्रिया जारी रही। अब उम्मीद है कि जीएसटी के आगमन के बाद यह सिलसिला समाप्त हो जाएगा। परंतु जैसा कि ईवे बिल दिखाते हैं, हमें नौकरशाही को कभी कम करके नहीं आंकना चाहिए। 
 
वर्ष 1948-49 में अपने पहले पूर्ण बजट में षणमुगम ने एक नई रवायत की शुरुआत की। वह था रेलवे के अधिशेष पर कब्जा। जी हां, एक दौर ऐसा भी था जब रेलवे के पास अधिशेष राशि रहती थी।  उन्होंने कुछ ऐसा भी किया जिसके बारे में उम्मीद की जा रही है कि जेटली भी वैसा ही करेंगे। उन्होंने कर कम कर दिए। उन्होंने कहा कि बचत दर बढ़ाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। उस वक्त बजट दर जीडीपी के बमुश्किल 4 फीसदी के बराबर थी। यह भी कहा गया कि ऐसा निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। यह भी उस वक्त बेहद कम हुआ करता था।
 
बहरहाल, ऐसा कुछ नहीं हुआ। न तो बचत दर में इजाफा हुआ और न ही निजी निवेश बढ़ा। अन्य वित्त मंत्रियों के साथ भी ऐसा ही हुआ। पी चिदंबरम ने सन 1997 में कर दरों में नाटकीय कटौती की। उन्हें उम्मीद थी कि इससे बचत और निवेश में सुधार होगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका।  जसवंत सिंह ने 2003 में बजट प्रस्तुत करते हुए हर वह कदम उठाया जो पारंपरिक अर्थव्यवस्था में उठाया जा सकता है लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हो सका। अब अगर जेटली के साथ भी यही होता है तो चकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। 
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