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व्यवहारवादी वित्त मंत्री हैं अरुण जेटली

ए के भट्टाचार्य /  January 31, 2018

बीते वर्षों पर ध्यान दिया जाए तो पता चलता है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली राजकोषीय मसलों को लेकर प्राय: व्यवहारवादी रुख अपनाते हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं ए के भट्टाचार्य 

 
वर्ष 2017-18 की बजटपूर्व आर्थिक समीक्षा इस सप्ताह के आरंभ में संसद में पेश की गई। समीक्षा को देखने के बाद यह अटकल बढ़ी है कि आखिर वित्त मंत्री अरुण जेटली वर्ष 2018-19 के बजट में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को लेकर कौन सी राह अपनाते हैं।  समीक्षा में सलाह दी गई है कि सरकार को अगले वर्ष राजकोषीय विस्तार से बचना चाहिए। साथ ही चुनाव से ऐन पहले वाले साल में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को लेकर अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को लेकर भी चेतावनी जारी की गई है। उसकी अनुशंसा है कि समझदारी दिखाते हुए बीच की राह अपनाई जाए ताकि हल्के सुदृढ़ीकरण की राह अपनाते हुए धीमे लेकिन स्थिर ढंग से राजकोषीय घाटे में कमी का लक्ष्य पूरा किया जा सके।
 
अगले वर्ष राजकोषीय घाटा कम करने की राह पर वापसी का अर्थ यह भी हो सकता है कि चालू वर्ष का 3.2 फीसदी घाटे का लक्ष्य हासिल न किया जा सके। 2018-19 के लिए घाटे में मामूली कमी का लक्ष्य रखा जा सकता है। एक अन्य व्याख्या यह है कि जेटली वर्ष 2017-18 को संशोधित राजकोषीय घाटे वाला बता कर सबको चकित कर सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आर्थिक समीक्षा भी मुख्य आर्थिक सलाहकार द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है और बजट वित्त मंत्री पेश करते हैं। देखना होगा कि बीते चार साल में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर वित्त मंत्री का रिकॉर्ड कैसा रहा है? वह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर कितने गंभीर रहे हैं और वह राजकोषीय मजबूती के सिद्घांत किस कदर अपनाते रहे हैं? 
 
जुलाई 2014 में जेटली ने अपना पहला बजट प्रस्तुत किया था और अपने पूर्ववती और संप्रग सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा अंतरिम बजट में तय तय 4.1 फीसदी के लक्ष्य को बदलते हुए कहा था कि उनके पूर्ववर्ती ने बहुत कठिन लक्ष्य तय किया है और दो साल की धीमी जीडीपी वृद्घि, अप्रत्यक्ष कर में मामूली वृद्घि और सब्सिडी के बोझ को देखते हुए यह लक्ष्य बहुत दुष्कर है। परंतु उन्होंने यह कहते हुए सबको चकित कर दिया कि कठिन होने के बावजूद वह इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा था कि विफलता तभी होती है जब हम प्रयास करना बंद कर देते हैं। उन्होंने न केवल चिदंबरम के लक्ष्य को अपनाया बल्कि खुद भी समावेशन की ऐसी राह तय की जो उन दिनों काफी चुनौतीपूर्ण लगी। तेल कीमतें बढ़ रही थीं, मुद्रास्फीति ज्यादा थी, फंसे हुए कर्ज की समस्या का पूरा असर अभी पता नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने वर्ष 2015-16 के लिए घाटे का लक्ष्य 3.6 फीसदी और 2016-17 के लिए 3 फीसदी तय किया। 
 
जेटली राजकोषीय घाटे की कोई नई दिशा नहीं तय कर रहे थे। वर्ष 2011-12 में इसके जीडीपी के 5.8 फीसदी तक पहुंचने के बाद से यह लगातार कम हुआ। 2012-13 में यह 4.9 फीसदी और 2013-14 में 4.4 फीसदी हो गया। उस वक्त संप्रग का कार्यकाल था और तेल कीमतें भी ऊंची थीं। बाद के तीन साल में राजग के अधीन बतौर वित्त मंत्री जेटली ने घाटे को क्रमश: 4.1 फीसदी, 3.9 फीसदी और 3.5 फीसदी किया। इस दौरान तेल कीमतों से मदद मिली लेकिन यह घटता स्तर इस बात का संकेत था कि जेटली बतौर वित्त मंत्री राजकोषीय सुदृढ़ीकरण में यकीन करते हैं। 
 
बहरहाल यह पूरी तस्वीर नहीं थी। हकीकत कहीं अलग थी। फरवरी 2015 में अपना दूसरा बजट प्रस्तुत करते हुए जेटली ने माना कि लक्ष्य तय करने की महत्त्वाकांक्षा की एक सीमा है। उन पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाने का दबाव था और सातवें वेतन आयोग का भी। उन्होंने कहा भी कि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के पहले से तय लक्ष्य को पूरा करने का प्रयास करना मेरे विचार में वृद्घि को मदद पहुंचाने वाला कदम नहीं है। इसके बाद उन्होंने राजकोषीय लक्ष्य हासिल करने के एक क्रमबद्घ खाके की घोषणा की। 
 
उन्होंने घाटे के स्तर को दो साल में 3 फीसदी तक लाने के बजाय इसके लिए तीन साल की अवधि चुनी। राजकोषीय घाटे के संशोधित लक्ष्य के मुताबिक 2015-16 के लिए 3.9 फीसदी, 2016-17 के लिए 3.5 फीसदी और 2017-18 के लिए 3 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और इसके चलते घाटा कम करने का दबाव भी कम हो गया है। इसके चलते ही खाके में बदलाव किया गया। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि जो अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश बनी है उसका इस्तेमाल बुनियादी निवेश में किया जाएगा। 
 
अपने तीसरे बजट में फरवरी 2016 में उन्होंने अपना रुख बदला। उस वर्ष कम आक्रामक राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को लेकर बड़ी बहस छिड़ी थी। उन्होंने कहा था, 'मैंने नीतिगत विकल्पों पर जोर दिया है और यह तय किया है कि राजकोषीय लक्ष्यों पर टिके रहना ही समझदारी है।Ó यही वजह है कि वर्ष 2015-16 के संशोधित लक्ष्य को 3.9 फीसदी पर रहने दिया गया और अगले वर्ष के लिए जीडीपी के 3.5 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया। यह भी कहा गया कि ऐसा करते समय विकास से समझौता नहीं होगा। परंतु 2017-18 के लिए 3 फीसदी के लक्ष्य का जिक्र नहीं किया गया जबकि शुरुआती खाके में इसका उल्लेख था। 
 
जेटली ने अपना चौथा बजट फरवरी 2017 में प्रस्तुत किया था। इसमें एक बार पुन: उनके रुख में बदलाव नजर आया। उन्होंने एफआरबीएम समीक्षा समिति द्वारा किए गए उस प्रावधान की आवश्यकता नहीं समझी जो ढांचागत सुधारों के दूरगामी आर्थिक प्रभाव के कारण लक्ष्य में आधा फीसदी तक के संशोधन की गुंजाइश देता था। इसके बजाय उन्होंने उच्च सार्वजनिक निवेश के लिए वर्ष 2017-18 के लक्ष्य को 3.2 फीसदी करने की घोषणा की और कहा कि वर्ष 2018-19 के बजट में वह इसे जीडीपी के 3 फीसदी के स्तर पर ले आएंगे। 
 
बीते चार सालों में जेटली ने एक बार स्वीकार किया कि उनके पूर्ववर्ती ने घाटे में कमी का दुष्कर लक्ष्य तय किया था। एक अन्य मौके पर उन्होंने अपने ऊपर कम राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को  लेकर आक्रामक होने के लिए पड़ रहे दबाव का प्रतिरोध किया। जाहिर सी बात है जेटली राजकोषीय लक्ष्यों को लेकर यथार्थवादी हैं। अगर हालात की मांग होगी तो वह एक बार फिर राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के खाके में संशोधन करने से पीछे नहीं हटेंगे।
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