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अर्थव्यवस्था में दोबारा दिखने लगे हैं रफ्तार के संकेत

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  January 30, 2018

भारतीय अर्थव्यवस्था फिर रफ्तार पकड़ती नजर आ रही है लेकिन राजकोषीय सशक्तीकरण और मुद्रास्फीति के मोर्चे पर चिंता बनी हुई है। अब सबकी नजरें आगामी आम बजट पर जा टिकी हैं। बजट में होने वाली घोषणाओं के अलावा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में कर बदलावों को लेकर कई विरोधाभासी अटकलें सुनाई दे रही हैं।  अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के नतीजों से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आर्थिक गतिविधियों के फिर जोर पकडऩे का सिलसिला न केवल जारी है बल्कि उसका दायरा भी बढ़ा है। एचडीएफसी बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) जैसी कंपनियों के नतीजे अपेक्षा से बेहतर रहे हैं। इन्फोसिस के भी लाभ में तेजी देखी गई है और वह इस वित्त वर्ष के लिए अपने पूर्वानुमान की दिशा में बढ़ रही है।

 
इस तिमाही में एचयूएल के शुद्ध लाभ में 28 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है। एचडीएफसी बैंक ने इस तिमाही में 20 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर हासिल की है जबकि उसका बाजार पूंजीकरण पांच लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया है। लेकिन उसकी गैर-निष्पादित आस्तियों में 57 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन्फोसिस ने तीसरी तिमाही में 37.5 फीसदी का शुद्ध लाभ अर्जित किया है लेकिन 1,430 करोड़ रुपये कर प्रावधानों में बदलाव के चलते आए हैं। इसके बावजूद इस कंपनी ने भविष्य का अपना नजरिया बरकरार रखा है। वहीं टीसीएस काफी हद तक बाजार की अपेक्षाओं पर खरी उतरी है।
 
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शुद्ध लाभ में 25 फीसदी की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है। सकल रिफाइनिंग मार्जिन बढऩे का सिलसिला जारी होने से कंपनी के मुख्य कारोबार तेलशोधन एवं पेट्रो-रसायन को मजबूती मिल रही है। रिलायंस के दूरसंचार व्यवसाय जियो ने भी पहली बार लाभ दर्ज करते हुए 504 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया है।  जहां तक मुद्रास्फीति का सवाल है तो थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के बीच कुछ हद तक असहमति देखने को मिली। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर दिसंबर में 3.58 फीसदी रही जबकि नवंबर में यह 3.93 फीसदी रही थी। वहीं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दिसंबर में 5.21 फीसदी और नवंबर में 4.88 फीसदी आंकी गई। लेकिन रिजर्व बैंक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को ही बेंचमार्क मानता है, लिहाजा फरवरी में होने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में कटौती के आसार कम ही हैं। थोक मूल्य सूचकांक कम होने का मतलब है कि विनिर्माताओं की क्रय-शक्ति अब भी कम ही है। वैसे यह संभावना दिख रही है कि खाद्य उत्पादों का कम थोक मूल्य होने से खुदरा खाद्य उत्पादों की महंगाई में भी कमी आएगी और इसके चलते जनवरी-फरवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी कम हो सकता है। 
 
महंगाई के नजरिये से चिंता का दूसरा बड़ा विषय तेल के दाम हैं। कच्चे तेल के दाम असुविधाजनक स्तर पर पहुंच चुके हैं। दिसंबर में आयात किए गए कच्चे तेल के भाव 62 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए थे और इसके और ऊपर जाने की ही आशंका है। जनवरी 2017 में कच्चा तेल 54 डॉलर प्रति बैरल पर ही था। तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक का मानना है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का उत्पादन कम ही रहेगा, लिहाजा पूरे साल भाव ऊंचे रह सकते हैं। तेल के ऊंचे भाव होने से न केवल व्यापार संतुलन पर असर पड़ता है बल्कि मौजूदा सीमा शुल्क और राज्यों के बिक्री कर राजस्व को बनाए रख पाने में केंद्र सरकार की काबिलियत पर भी सवाल खड़ा होता है। कच्चे तेल के ऊंचे दाम महंगाई बढ़ा सकते हैं।
 
बजट में लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अगर शेयरों और म्युचुअल फंड पर दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर लगता है तो लाभांश वितरण कर और प्रतिभूति लेनदेन कर या तो खत्म किया जा सकता है या कुछ बदलाव हो सकते हैं। कॉर्पोरेट टैक्स की दरों में कटौती की भी चर्चा है। जीएसटी का स्वरूप अभी तक स्थिर नहीं हो पाने से अप्रत्यक्ष कर संग्रह में गिरावट रहेगी और राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.2 फीसदी पर रहने का बजट लक्ष्य पार कर जाएगा। सरकार को वर्ष 2017-18 में कर्ज लेने की अपनी सीमा भी लांघनी होगी। वैसे सरकार 50,000 करोड़ के बजाय 20,000 करोड़ रुपये ही बाजार से कर्ज लेने जा रही है। राजकोषीय घाटे के नजरिये से 2018-19 के बजट पर बाजार की खास नजर रहेगी। वृद्धि अनुमान के साथ राजकोषीय घाटा लक्ष्य भी काफी अहम है।
 
बॉन्ड बाजार के जानकार भी सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल पर नजर रखे हुए हैं। सीमित अवधि के बॉन्ड और 10 साल की अवधि के बॉन्ड में फर्क कम हुआ है और प्रतिफल भी बढ़ा है। सरकार की तरफ से अधिक उधारी लेने के कारण ऐसा हुआ है। प्रतिफल वक्र का सपाट होना भी आर्थिक गिरावट की शुरुआती चेतावनी होती है, भले ही लोग इसे न मानें।  समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था के वर्ष 2018 में अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना है। पिछली तिमाही में चीन की विकास दर 2010 के बाद सर्वाधिक रही है। यूरोपीय संघ, जापान और अमेरिका में भी तेजी दिख रही है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को भी इस तेजी का फायदा मिल सकता है। हालांकि मौद्रिक हालात थोड़े मुश्किल हो जाएंगे। अमेरिका का फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ा रहा है तो यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान क्यूई कार्यक्रमों में कटौती कर रहा है।
 
वैसे यह वह दौर है जब घरेलू और विदेशी संस्थानों के अलावा खुदरा बाजार भी तेजी पर हैं। कंपनियों के नतीजे अच्छे हैं, बजट से उम्मीदें लगी हुई हैं और विदेशी निवेश का प्रवाह भी बना हुआ है। शेयर बाजार की तेजी में इसकी झलक भी मिल रही है। निफ्टी 11,000 को पार कर चुका है। हालांकि अगर बजट बाजार को निराश करता है तो हमें तीव्र गिरावट के लिए भी तैयार रहना होगा।
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