बिजनेस स्टैंडर्ड - तकनीक विरोधी हैं हम भारतीय?
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तकनीक विरोधी हैं हम भारतीय?

अजित बालकृष्णन /  January 30, 2018

मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमता के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में यह अहम है कि हम प्रौद्योगिकी को लेकर भारतीय मानसिकता का आकलन करें। विस्तार से बता रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
एक वरिष्ठ बैंकर से कुछ दिन पहले मेरी चर्चा हो रही थी। उन्होंने मुझसे कहा कि उन्हें तकनीक समझ में नहीं आती। उन्होंने यह बात उतनी ही बेपरवाही से कही जैसे कि मैं कह सकता हूं कि मुझे तंत्र समझ में नहीं आता। कहने का तात्पर्य यह है कि मैं उसके अस्तित्व को तो स्वीकार करता हूं लेकिन उसे गहराई से समझने में कोई रुचि नहीं रखता।  लाखों डॉलर की पूंजी वाले वेंचर कैपिटल फंड के संस्थापक और प्रमुख ने लगभग झुंझलाहट भरे अंदाज में मुझसे कहा कि अगर आप सोचते हैं कि आप अगले पांच साल में तकनीकी उन्नति का अंदाजा लगा सकते हैं तो आप शायद खुद को ईश्वर समझते हैं। 
 
क्या तकनीक को लेकर ऐसी बेरुखी के चलते ही सन 1980 के दशक के अंत में जब पर्सनल कंप्यूटर क्रांति हुई और कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंचा (ठीक आज के मोबाइल फोन की तरह) तो यह अवसर बॉडी शॉपिंग उद्यम में बदल गया? बॉडी शॉपिंग में विभिन्न फर्म सूचना प्रौद्योगिकी के जानकारों को अनुबंधित करती थीं और उनके माध्यम से सेवाएं देती थीं। इसकी बुनियाद क्या है? उस दौर की शीर्ष कंपनियों से मुकाबला करने की अनिच्छा की वजह से भी ऐसा हो सकता है। माइक्रोसॉफ्ट और ऑरेकल जैसी कंपनियां उस अवधि में खूब पनपीं और वैश्विक स्तर पर उनका रसूख कायम हुआ? या फिर शायद उन्हें लगा होगा कि किसी भारतीय कंपनी के लिए ऐसा प्रयास करना ही बेमानी है क्योंकि उन्हें इसमें सफलता मिलनी ही नहीं है। या फिर क्या कोई बड़ा मुद्दा है जिसके तहत युवा प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए अलग पर्यावास की आवश्यकता है क्योंकि देश में जानकार और धैर्यवान और ग्राहक, धैर्यवान घरेलू वेंचर कैपिटल उद्योग और सबसे बढ़कर तकनीकी नवाचार संपन्न उत्पादों के लिए पर्याप्त घरेलू बाजार मौजूद ही नहीं हैं?
 
दुनिया भर में हुए अध्ययनों के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी प्रौद्योगिकी कंपनी के विकास की राह एकदम स्पष्ट है। सबसे पहले एक उद्यमी सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नए विचार पर काम करता है, उसके बाद वह कुछ अच्छे ग्राहक तलाश करता है क्योंकि एक युवा कंपनी को शुरुआत में कुछ बड़ी तकनीकी समस्याओं को हल करना होता है। यह शुरुआती बढिय़ा ग्राहक अक्सर रक्षा शोध एवं विकास समूह से होते हैं। एक बार अगर नमूना रक्षा क्षेत्र की जरूरतों के मुताबिक हुआ तो उद्यमी अपने देश में और फिर दुनिया भर में उसका कारोबार करता है।
 
कई लोगों को यह बात याद होगी कि कैसे अमेरिकी रक्षा विभाग के चलते आई फोन दुनिया का सबसे लोकप्रिय फोन ब्रांड बन सका। उसका टच स्क्रीन डिस्प्ले, जियोग्राफिक पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और आपकी लोकेशन के हिसाब से आपको जरूरी राह बताने वाला उसका मैप डेटा सबमें उसकी भूमिका रही है। उस लिहाज से सूचना प्रौद्योगिकी युग को हकीकत में बदलने के लिए जरूरी हर चीज को अमेरिकी रक्षा विभाग की फंडिंग का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए। इसमें खुद इंटरनेट, कंप्यूटर को चलाने वाला माइक्रो प्रोसेसर और मोबाइल फोन तथा सेल्युलर तकनीक तक सभी शामिल हैं जिनकी बदौलत आज के मोबाइल फोन बन सके।
 
एक अन्य क्षेत्र जहां भारतीय तकनीक से दूरी दिखाते हैं उसे देश के सॉफ्टवेयर डेवलपर में बहुत बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है। भारतीय डेवलपर 30-35 की उम्र पार करने के बाद कोडिंग से पीछा छुड़ाकर मैनेजर बनने की हर कोशिश करते हैं। यानी वे दूसरों के काम की निगरानी करना चाहते हैं लेकिन खुद प्रोग्राम बनाकर अपने हाथ गंदे करना नहीं चाहते। यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे कि कोई उपन्यासकार खुद लिखना बंद करके किसी प्रकाशन समूह में प्रबंधक बन जाए। यहां फिर समाज के स्तर पर एक प्रश्न उत्पन्न होता है: क्या भारतीय समाज में प्रोग्राम तैयार करने वालों के लिए निगरानीकर्ताओं या प्रबंधकों की तुलना में कम प्रोत्साहन और लाभ हैं?
 
यह अवधारणा कहीं गहन सामाजिक सूत्रों से संचालित है। यह किस्सा मैं पहले भी दोहरा चुका हूं लेकिन शायद वक्त है इसे एक बार और स्मरण करने का। 20 की वय के एक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि वह पारंपरिक विवाह करने के लिए जिन लड़कियों से मिल रहा है उनमें से अधिकांश उससे पूछती हैं कि वह कितने लोगों का बॉस है? वे इसी आधार पर यह अंदाजा लगाती हैं कि वह अपने काम में सफल है अथवा नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्र भारतीय राज्य की स्थापना एक तकनीक विरोधी रुख पर आधारित थी। आजादी की लड़ाई के दौर में कांग्रेस के ध्वज पर चरखा प्रतीक रूप में अंकित रहता था। ऐसा प्रतीत होता है कि कुशल राजनेता के रूप में गांधी जी भारतीय मानस में कपड़ा मशीनरी और स्वचालन के खिलाफ भावना भरना चाहते थे।
 
क्या पारंपरिक कारोबारी घराने जो देश के कारोबारी परिदृश्य पर छाए हुए हैं वे अपने वारिसों को तकनीकी रूप से चुनौती भरे कारोबार अपनाने के लिए हतोत्साहित करते हैं? ऐसे प्रमाण हैं जो बताते हैं कि संभवत: यह सच हो सकता है। क्या वे अपनी तरह की प्रतिस्पर्धा को लेकर अधिक सहज हैं और कोई श्रेष्ठ या कम महंगा उत्पाद तैयार करने के बजाय किसी प्राकृतिक संसाधन (स्पेक्ट्रम, कोयला, लौह अयस्क आदि) तक पहुंच बनाकर, कारोबार के लिए लाइसेंस और पूंजी जुटाकर काम करना चाहते हैं और तकनीकी नवाचार का काम किसी अन्य कंपनी को आउटसोर्स करना बेहतर समझते हैं। 
 
श्रम का यह विभाजन हमारी मानसिकता में इस कदर रचा बसा है कि प्रमुख सरकारी अनुबंधों में भी यही देखने को मिलता है। भारतीय साझेदार जहां सरकारी लाइसेंस और संपर्क जुटाने का काम करता है वहीं विदेशी प्रौद्योगिकी साझेदार का काम होता है तकनीकी पक्ष संभालना।इस समय सूचना प्रौद्योगिकी युग उभार पर है और हमें मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमता के क्षेत्र में तकनीकी नवाचार का उभार देखने को मिल रहा है। ऐसे में यह अहम है कि हम प्रौद्योगिकी को लेकर भारतीय मानसिकता का आकलन करें।
 
(लेखक सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी पुस्तक द वेव राइडर के लेखक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
Keyword: india, tech, machine,,
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