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नीतिगत कमियों का खमियाजा

संपादकीय /  January 30, 2018

इन दिनों कृषि क्षेत्र बुरे दौर से गुजर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त निराशा में इसे महसूस भी किया जा सकता है। इस बीच वर्ष 2017-18 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते कृषि क्षेत्र की आय में और कमी आएगी। यह बात परेशान करने वाली है। समीक्षा में जलवायु के रुझान का विश्लेषण करके कहा गया है कि कृषि क्षेत्र की आय में मध्यम अवधि में 15 से 18 फीसदी की कमी आ सकती है। जबकि असिंचित क्षेत्रों में यह कमी 20 से 25 फीसदी तक हो सकती है। यानी कुल रकबे का करीब आधा हिस्सा आय की कमी की चपेट में रहेगा। 

 
एक अनुमान के मुताबिक इसके चलते पहले से संकटग्रस्त कृषक परिवार को सालाना 3,600 रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके बावजूद जलवायु प्रतिरोधी कृषि को बढ़ावा देने और मौजूदा कृषि व्यवहार में सुधार अपनाते हुए उसे मौसम की मार से बचाने की दिशा में प्रयास कमजोर ही रहे हैं। समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि देश के कृषि क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाया जा सके। इसके लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर आधारित सिंचाई तकनीक अपनाने और बिजली तथा उर्वरक क्षेत्र में अलक्षित सब्सिडी को प्रत्यक्ष आय समर्थन से प्रतिस्थापित करने की बात कही गई है।
 
किसानों की चिंताओं की वजह केवल जलवायु परिवर्तन नहीं है। अन्य वजह भी हैं जिनके बारे में समीक्षा में चलताऊ टिप्पणी की गई है। उनमें से कुछ अहम हैं खेती के रकबे में लगातार कमी, प्राकृतिक संसाधनों मसलन जमीन और पानी का संकट, उच्च मूल्य वाली फसलों को लेकर खेती में विविधता का नहीं आ पाना और ग्रामीण युवाओं का खेती में रुचि न लेना। इन सबका असर खेती पर नजर आ रहा है। जैसा कि समीक्षा में कहा गया कृषि क्षेत्र का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद और वास्तविक कृषि राजस्व दोनों पिछले चार साल से ठहरे हुए हैं। 
 
हालांकि समीक्षा में कहा गया है कि लगातार दो साल मॉनसून कमजोर रहने से भी हालत खराब हुई है लेकिन यह सच नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र का संकट केवल वर्ष 2014 और 2015 के सूखे में ही नजर नहीं आया बल्कि बाद के वर्षों में अच्छी पैदावार के बावजूद संकट कम नहीं हुआ। जाहिर सी बात है गलत सरकारी नीतियां भी इसके लिए उत्तरदायी हैं। कृषि मूल्य से जुड़ी नीतियों ने कृषि क्षेत्र को काफी कमजोर किया है। सरकार का मूल्य प्रबंधन खाद्य मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने पर केंद्रित रहा है ताकि उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिल सके। जबकि उसे किसानों के हितों की रक्षा करनी चाहिए थी। तथ्य यह है कि अधिकांश जिंसों की थोक कीमतें इनकी तय सरकारी कीमत से कम रहती हैं। 
 
ऐसे में कोशिश यह होनी चाहिए कि उपभोक्ताओं और किसानों के हितों के बीच संतुलन कायम किया जाए। इसके लिए बेहतर कृषि विपणन व्यवस्था के साथ कृषि उपज वितरण समितियों द्वारा संचालित बाजारों की मौजूदा कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। कृषि व्यापार में बिचौलियों और संघों के दबदबे को दूर करने के लिए जरूरी है कि बाजार को पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाया जाए।  समीक्षा में सरकार की 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की प्रतिबद्धता की सराहना की गई है। इसके लिए कृषि क्षेत्र को वर्ष 2017-18 के लिए अनुमानित 2.1 फीसदी की तुलना में कई गुना तेज गति से विकसित करना होगा। ऐसे में यह सलाह उचित है कि सरकार किसानों को आय बढ़ाने के लिए सलाह दे और कृषि से जुड़े पशुपालन और मत्स्यपालन जैसे कामों की मदद से विविधता लाने को प्रेरित करे। कृषि में विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए कृषि शोध में निवेश बढ़ाना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कृषि क्षेत्र का संकट बरकरार रहेगा।
Keyword: agri, farmer, loan, budget, economic survey,,
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