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अर्थव्यवस्था में सुधार मगर नहीं अपेक्षित तेज रफ्तार

नितिन देसाई /  January 23, 2018

वित्त मंत्री को आधी अधूरी योजनाओं और खराब ढंग से तैयार की गई योजनाओं की घोषणा से बचना चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

 
क्या अर्थव्यवस्था में बदलाव आया है और वृद्घि की प्रक्रिया दोबारा पटरी पर आ गई है? सरकारी सांख्यिकीविद कह रहे हैं कि चालू वित्त वर्ष में 6.5 फीसदी की वृद्घि दर हासिल होगी। यह दर भारतीय रिजर्व बैंक, नीति आयोग और वित्त मंत्रालय द्वारा जताए गए 6.7 फीसदी-7.5 फीसदी के अनुमान से कम है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) का 6.5 फीसदी का अनुमान पहला अग्रिम अनुमान है जिसमें आने वाले महीनों में कई बार संशोधन किया जाएगा। माना जा रहा है कि अगला संशोधन फरवरी के अंत में देखने को मिल सकता है। वित्त मंत्रालय और आरबीआई सही भी साबित हो सकते हैं। परंतु जब असंगठित क्षेत्र के आंकड़े सामने होंगे तब संशोधन के बाद कमी देखने को मिलेगी। 
 
शुरुआती दो तिमाहियों के बारे में अनुमान लगाया जाए तो यह बात स्पष्टï नजर आती है कि सीएसओ को उम्मीद है कि मामूली वृद्घि देखने को मिल सकती है। अगर सीएसओ का आकलन सही है तो कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है लेकिन अब तक उसने वह गति नहीं प्रस्तुत की है जो 8.5 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करने के लिए जरूरी है। गौरतलब है कि नीति आयोग द्वारा वर्ष 2031-32 तक प्रति व्यक्ति आय तीन गुना करने के लिए जो लक्ष्य तय किया गया है उसे हासिल करने के लिए यह दर आवश्यक है। 
 
असली समस्या है निवेश में आया ठहराव। मौजूदा मूल्य निवेश अनुपात में बीती 10 तिमाहियों के दौरान लगातार कमी आई है। वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही के 30.4 फीसदी से घटकर वर्ष 2017-18 की दूसरी तिमाही में यह 26.4 फीसदी हो गया। सीएसओ को उम्मीद है कि इस पूरे वर्ष यह कमोबेश इसी स्तर पर रहेगा। यानी साल की दूसरी छमाही में इसमें कोई सुधार नहीं होगा। सीएमआईई के नई परियोजनाओं से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2017 तिमाही के 3.9 लाख करोड़ रुपये से घटकर यह दिसंबर तिमाही 2017 में 0.86 लाख करोड़ रुपये रह गई। सीएमआईई के अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2017-18 में शुरू होने वाली परियोजनाएं वर्ष 2004-05 के बाद सबसे कम होंगी। 
 
निवेशक केवल नई परियोजनाओं से ही दूरी नहीं बनाए हैं बल्कि पहले से चालू परियोजनाओं का क्रियान्वयन भी प्रभावित हो रहा है क्योंकि शुरुआती तेजी के दौरे में अनुमानित मांग में अब कमी आ रही है। ऐसे में 8.5 फीसदी की वृद्धि हासिल करने के लिए 30-35 फीसदी की निवेश दर की आवश्यकता है। सीएमआईई का मानना है कि करीब 100 लाख करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाएं अभी निर्माणाधीन हैं और निवेश में इजाफा करने का एक तरीका यह भी होगा कि कुछ राजकोषीय प्रोत्साहन घोषित किए जाएं। यह उपलब्धता दो साल तक की सीमित अवधि के लिए होनी चाहिए। ऐसा करके क्रियान्वयन में इजाफा किया जा सकता है। निवेश की घटती दर के लिए आंशिक तौर पर बैंकिंग क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज की बढ़ी हुई तादाद भी शामिल है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक यह अब 9.9 फीसदी तक जा पहुंचा है। कई कंपनियां ऐसी हैं जो नया निवेश करने की स्थिति में नहीं हैं जबकि बैंक भी नया ऋण नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि उनको पुरानी फंसी हुई परिसंपत्ति से निपटने के लिए प्रावधान करने हैं। इन हालात से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इनमें दो-तीन साल या उससे अधिक वक्त लगेगा। हाल ही में एक अदालती फैसले के बाद एक ही समूह की कमजोर कंपनी के मजबूत कंपनी में विलय को मंजूरी दी गई यह एक उत्साह बढ़ाने वाली बात है। चूंकि वित्त मंत्री कंपनी मामलों के मंत्रालय के भी प्रभारी हैं इसलिए वह इस विकल्प पर विचार कर सकते हैं।
 
क्या वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय लक्ष्य शिथिल किए जाएंगे? अगर प्राथमिक वृद्धि बढ़े हुए सार्वजनिक निवेश से आना है तो यह मायने रखता है। हमने कुछ साल पहले यह तरीका आजमाया था लेकिन सफलता नहीं मिली। अब इसका जवाब प्रत्यक्ष निजी निवेश के प्रयास में है। कुछ निर्णय ऐसे हैं जहां चयन करना आवश्यक है। मिसाल के तौर पर सरकारी क्षेत्र के उद्यमों को लाभांश भुगतान बढ़ाने के लिए मजबूर करने की बात। ऐसा किया जा रहा है ताकि राजकोषीय घाटे को सीमित रखा जाए लेकिन इसका असर उनकी निवेश क्षमता पर होगा। 
 
फिलहाल जहां भी ऐसा कोई चयन करना हो वित्त मंत्री को वृद्धि को ही चुनना चाहिए, बशर्ते कि राजकोषीय शिथिलता लक्ष्य से 10 फीसदी तक ही शिथिल हो। ऐसा इसलिए क्योंकि चालू खाते और बजट को लेकर चुनौती उभर रही है। ऐसा कच्चे तेल की कीमतें बढऩे की वजह से हो रहा है। विदेशी निवेश पर निर्भरता के चलते हमें अपनी क्रेडिट रेटिंग भी बरकरार रखनी होगी। क्षेत्रवार स्तर पर कृषि की हालत खस्ता बनी हुई है। इस वर्ष समस्या मौसम से नहीं बल्कि बाजार से जुड़ी रही। किसानों को अधिकांश उत्पादों के लिए मिले दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम थे। ऐसा इसलिए क्योंकि चावल और गेहूं जैसी फसलों के अलावा उनको मूल्य समर्थन दिलाने की कोई व्यवस्था ही नहीं है। केवल इन्हीं फसलों के लिए ही एमएसपी पर खरीद की उचित व्यवस्था है। वह भी केवल प्रमुख उत्पादक राज्यों में जो कुल उपज के चौथाई के उत्तरदायी हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष किसानों को मुक्त बाजार से मिलने वाले दाम में एमएसपी से होने वाली मूल्य प्राप्ति की तुलना में औसतन पांच फीसदी तक का नुकसान उठाना पड़ा।
 
दूध जैसा उत्पाद जिसका समेकित उत्पादन गेहूं और चावल के मिलेजुले उत्पादन से भी ज्यादा है, वहां एक सहकारी समर्थन ढांचा होने के बावजूद किसानों और पशुपालकों को कई बाजारों में 20 फीसदी तक कम दाम मिले। किसानों को राहत देने के लिए अल्पकाल में कर्ज माफी से बेहतर कुछ सोचना होगा। मध्य प्रदेश ने किसानों को औसत बाजार मूल्य से कमी की भरपाई के लिए जो भावांतर योजना प्रस्तुत की है वह एक बेहतर अंतरिम उपाय है जबकि मध्यम अवधि में गहन कृषि बाजार सुधारों की आवश्यकता होगी।
 
जिस अन्य क्षेत्र को सहायता की आवश्यकता है वह है एमएसएमई और हस्तकला उत्पाद। नोटबंदी और जीएसटी ने इनको बुरी तरह प्रभावित किया है। सस्ते मकान, छोटे उत्पादकोंं को लॉजिस्टिक संबंधी मदद तथा अनुषंगी उद्योगों को राजकोषीय रियायत देने से वृद्धि को भी मदद मिलेगी और यह लोकलुभावन कदम भी माना जाएगा। वित्त मंत्री को किस तरह के दबावों से बचना चाहिए? इस संबंध में मेरा मानना है कि कृपया आधी अधूरी तैयारी वाले सुधार या योजना न पेश की जाए, खासतौर पर चुनाव को ध्यान में रखते हुए। आम चुनाव महज 18 महीने दूर हैं। ऐसे में काफी संभव है कि सरकार राजनीतिक रणनीतिकार ऐसा करने की कोशिश करें। अभी हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि क्या होता है।
Keyword: india, economy, IIP, GDP,,
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